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ग़ज़ल .........;;;गुमनाम पिथौरागढ़ी

2122 2122 212

पढ़ चुके जब से किताबें चार हम

भूल बैठे आपसी सब प्यार हम

बादलों ने ढक लिया सूरज अगर

मान लें सूरज की कैसे हार हम

उम्र भर कागज़ किये काले मगर

कह न पाए शेर भी दो चार हम

है भरोसा तेरे झूठे वादे पे 

यार दिल के हाथ हैं लाचार हम

जीतना तो चाहते हैं दिल मगर

फिर जमा क्यों कर रहे हथियार हम

बस डकैती लूट हत्या अपहरण 

देखते डरने लगे अखबार हम

मौलिक व…

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Added by gumnaam pithoragarhi on February 22, 2015 at 5:53pm — 5 Comments

ग़ज़ल -- आया था जो भी ज़ेहन में काग़ज़ पे लिख दिया ( बराए इस्लाह )

तरतीब से सजे दर-ओ- दीवार घर नहीं

सुख दुख में जब कि साथ तेरे हमसफ़र नहीं



ऐसा नहीं कि राहे सफ़र में शजर नहीं

आसान फिर भी जिन्दगी की रहगुज़र नहीं



उपदेश दूसरों को सभी लोग दे रहे

खुद उन पे जो अमल करे ऐसा बशर नहीं



रिश्तों की भीड़ में कहीं गुम हो गये सभी

अब रौनकें वो पहले सी, चौपाल पर नहीं



जीवन की भागदौड़, चकाचौंध में बशर

खोया है इस कदर उसे खुद की खबर नहीं



गुटका शराब पीते हैं अब सब के सामने

आया अजीब दौर है बच्चों को ड़र… Continue

Added by दिनेश कुमार on February 22, 2015 at 12:30pm — 11 Comments

घास उगने लगी है मेरी कब्र पर

212 212 212 212

---------------------------------------

जिन्दगी थी बहुत ही सुहानी मेरी

मौज मस्ती कभी थी निशानी मेरी

------

एक ज़लसा हुआ था मेरे गाँव में

मिल गयी उसमें परियों की रानी मेरी

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सिलसिला चल पडा फिर मुलाकात का

मुझको लगने लगी जिन्दगानी मेरी

------

बात अबकी नहीं है मेरे दोस्तो

ये कहानी बहुत ही पुरानी मेरी

------

एक साज़िश रची थी रक़ीबों ने फिर

और साज़िश में शामिल दिवानी मेरी

------

मैं तो मरने लगा…

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Added by umesh katara on February 22, 2015 at 10:30am — 16 Comments

कौन सा साहित्य रचते हो (1)--डॉo विजय शंकर

क्या करते हो,

कौन सा साहित्य रचते हो,

क्यों रचते हो ,

किसके लिए रचते हो ?

स्वान्तः सुखाय ,

कोई पढ़ता है ,

ऐसा लिख देते हो ,

अर्थ ढूंढना पड़ता है ,

जो है ही नहीं वो

निकालना पड़ता है ,

गाय है , घास है,

गाय घास खा चुकी ,

गाय जा चुकी ,

अब कुछ नहीं ,

सब अदृश्य है, पर है ,

समझ से परे है, पर है ,

क्योंकि लिखा है तुमने ,

जिनको दिख जाए , चक्षुवान।

बाकी ,

बाकी के लिए कहाँ लिखते हो तुम ,

तुम तो अपने लिए… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 22, 2015 at 9:52am — 17 Comments

कौन कब किसको रोक पाता है -- डॉo उषा चौधरी साहनी

 
न जाने ऐसा क्यों लगता है , 
किसी एक पल कि सबकुछ 
अपना है, अपने हाथों में है, 
बस , हाथ उठाऊं और ले लूँ , 
समेट लूँ , अपनी बाँहों  में ,
रख लूँ ,सहेज कर अपने पास । 
कितनी खुशियाँ हैं दुनियाँ में , 
सब मेरे लिए , कितनी अपनी हैं ,
पर, दूसरे ही क्षण लगता है…
Continue

Added by Usha Choudhary Sawhney on February 22, 2015 at 9:35am — 9 Comments

टिकट (लघु कथा )

‘दो टिकट बछरावां के लिए’ –मैंने सौ का नोट देते हुए बस कंडक्टर से कहा I

‘टूटे दीजिये, मेरे पास चेंज नहीं है I’

‘कितने दूं ?’

‘बीस रुपये ‘

   मैंने उसे बीस रूपए दे दिये और पर्स सँभालने में व्यस्त हो गया I वह रुपये लेकर आगे बढ़ गया I

-'क्या कंडक्टर ने टिकट दिया ?'- सहसा मैंने पत्नी से पूछा i

‘नहीं तो ‘ उसने चौंक कर कहा I  तभी बगल की सीट पर बैठा एक अधेड़ बोल उठा –‘टिकट भूल जाइये साहेब , बछरावां के दो टिकट तीस रुपये के हुए उसने आपसे बीस ही तो लिए i दस का…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 21, 2015 at 8:39pm — 19 Comments

ग़ज़ल-झील सा शीतल चाँद से सुन्दर लिख्खा है |

झील सा शीतल चाँद से सुन्दर लिख्खा है

हमने जो देखा है मंज़र लिख्खा है



अबजद हव्वज़ का भी जिन को इल्म नहीं

दुनिया ने उन को भी सुख़नवर लिख्खा है



आज उसी पर फूल वफ़ा के खिलते हैं

तुमने जिस धरती को बंजर लिख्खा है



पढ़कर देखो मेरी इन तहरीरों को

तुमको ही उन्वान बनाकर लिख्खा है



कुछ लोगों ने दौर-ए-ख़िज़ाँ के बारे में

कमरे में फूलों को सजाकर लिख्खा है



हमने बग़ावत करके सारी दुनिया से

महरूमी का नाम सिकन्दर लिख्खा है



"समर… Continue

Added by Samar kabeer on February 20, 2015 at 11:14pm — 42 Comments

मुहब्बत खुदा है ~ गजल

122 122 122 122

सुना था किसी से मुहब्बत खुदा है ।
हुयी तो ये जाना कोई हादसा है ।

थे तनहा कभी फिर भी अच्छे भले थे ,
सिवा दर्द के उसकी यादोँ मेँ क्या है ।

भला किस से कह दूँ भला कौन समझे ,
के जिसको लगी है वही जानता है ।

गये अपने दिल से गये अपनी जाँ से ,
ये है मर्ज ऐसी न जिसकी दवा है ।

अजब जिन्दगी के ये हालात समझो ,
वो ही वो है दिल मेँ जो दिल से जुदा है ।

मौलिक व अप्रकाशित
नीरज मिश्रा

Added by Neeraj Nishchal on February 20, 2015 at 8:00pm — 22 Comments

आवाज़ का रहस्य (कहानी )

आवाज़ का रहस्य (कहानी )

प्रशिक्षु चिकित्सक के रूप में दिनेश और मुझे कानपुर देहात के अमरौली गाँव में भेजा गया था |नया होने के कारण हमारी किसी से जान-पहचान ना थी इसलिए हमने अस्पताल के इंचार्ज से हमारे लिए आस-पास किराए पर कमरा दिलाने को कहा |उसने हमे गाँव के मुखिया से मिलवाया |

“ किराए पे तो यहाँ कमरा मिलने से रहा |तुम अजनबी भी हो और जवान भी | परिवार भी नहीं है !ऐसे में कोई गाँव वाला - - - “

“ ऐसे में ये लड़के चले जाएंगे |फिर गाँव वालों का ईलाज - - - - कितनी बार लिखने…

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Added by somesh kumar on February 20, 2015 at 11:12am — 4 Comments

ग़ज़ल -- सुब्ह से शाम हम कमाते हैं

सुब्ह से शाम हम कमाते हैं

तब भी मुश्किल से घर चलाते हैं



ये विरासत में हमको सीख मिली

हम तो मेहनत की रोटी खाते हैं



शाम होते ही हम परिन्दों से

लौट कर अपने घर को आते हैं



जिनके सर पर खुदा का हाथ है वो

आँधियों में दिये जलाते हैं



रोज़-ए-महशर की छोड़ कर चिन्ता

रिन्द मयखाने रोज़ जाते हैं



मुझको दुनिया सराय लगती है

लोग आते हैं लोग जाते हैं



हम तो फुरसत में दिल के छालों को

शे'र के पर्दों में छुपाते… Continue

Added by दिनेश कुमार on February 20, 2015 at 7:04am — 27 Comments

उद्घाटन : लघुकथा (हरि प्रकाश दुबे)

“मंत्री जी, शानदार पुल बनकर तैयार है, आपके नाम की शिला भी रखवा दी है, बस जल्दी से उद्घाटन कर दीजिये !”

 “अरे यार देख रहे हो कितना व्यस्त चल रहा हूँ आजकल, लेन-देन तो हो गया है न, फिर तुम्हे उद्घाटन की इतनी चिंता क्यों है ?”

“साहब, चिंता उद्घाटन की नहीं है, बारिश की है !” 

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित”     

Added by Hari Prakash Dubey on February 20, 2015 at 3:13am — 31 Comments

पीछे मेरी दुआ है |

वो आज है नही मेरी दुनिया में 

फिर भी बसती है मेरे जिया में 

लगता है आज भी याद करती है 

मुझे पाने की फ़रियाद करती है

शायद  खुश है ,जिन्दा है

क्यूंकि उसे कुछ हुआ है

वो आज जो है, जैसी है ,पीछे मेरी दुआ है |

मन करता है फिर से पाऊं उसे

दर्द भरी दुनिया से चुराऊं उसे

वो चली गयी पर कुछ कशिश तो है

चिराग न सही ,पर माचिस तो है

एहसास हो रहा है , उसने ख़त छुआ है

 वो आज जो है, जैसी है ,पीछे मेरी दुआ है…

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Added by maharshi tripathi on February 19, 2015 at 10:30pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - ' मौन को भी जवाब ही समझें ' -- गिरिराज भंडारी

' मौन को भी जवाब ही समझें '

2122   1212    112  /  22

***************************

जिन्दगी को हुबाब ही समझें

संग काँटे, गुलाब ही समझें

 

बदलियों ने चमक चुरा ली है

पर उसे माहताब ही समझें

 

शर्म आखों में है अगर बाक़ी

क्यों न उसको नक़ाब ही समझें  

 

इक दिया भी जला दिखे घर में

तो उसे आफ़ताब ही समझें

 

ठीक है , टूटता बिखरता है

पर उसे आप ख़्वाब ही समझें

 

दस्ते रस से अगर है दूर…

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Added by गिरिराज भंडारी on February 19, 2015 at 10:25am — 42 Comments

नाम के बहाने (कहानी )

“शुभम|”

“यस सर|”

“ज्ञानू|”

“यस सर|”

“दुर्योधन|”

“हाजिर सSड़|”

यूँ तो पंचम ब वर्ग का ये अंतिम नाम था |परंतु परम्परा से परे प्राचीन महाकाव्य खलनायक का स्मरण

कर और हाजिरी देने के उसके लहजे से ध्यान बरबस ही उसकी तरफ टिक गया |

“दुर्योधन मेरे पास आओ|” मैंने आदेशात्मक लहजे में कहा |

लंबे चेहरे वाला वो लड़का सकुचाता सा मेरे सामने खड़ा हो गया |मैंने अपनी तीसरी कक्षा और पंचम के छात्रों को कार्य दिया |इस बीच वो गर्दन झुकाए ,जमीन को देखता…

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Added by somesh kumar on February 19, 2015 at 10:00am — 12 Comments

आचरण से ध्यान जादा डील में - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122   2122      212

****************************

दोष  ऐसा  आ  गया  अब  शील में

फासले  कदमों  के  बदले  मील में

***

भर लिया तम से मनों को इस कदर

रोशनी   भी   कम   लगे  कंदील  में

****

देह  होकर   देह   सा   रहते  नहीं

टाँगते  खुद  को वसन से कील में

****

युग  नया  है  रीत भी  इसकी नई

आचरण  से  ध्यान  जादा डील में  /       डील-दैहिक विस्तार

****

अब  बचे  पावन  न  रिश्ते दोस्तो

तत तक बदले है खुद को चील में

***

भय सताता क्या …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 19, 2015 at 7:00am — 25 Comments

सज़ा--

" बाई , कल से काम पर मत आना "|

" लेकिन मेमसाब , मैंने तो कुछ नहीं किया "|

कहना तो चाहती थी " हाँ , तुमने तो कुछ नहीं किया लेकिन साहब को तो नहीं कह सकती मैं ", लेकिन जुबाँ ने साथ नहीं दिया |

बाई हिकारत से देखती हुई चली गयी , उसके अंदर कुछ दरक सा गया |

मौलिक एवम अप्रकाशित  

Added by विनय कुमार on February 18, 2015 at 10:17pm — 20 Comments

मिले जब कामयाबी लोग मिलकर साथ चलते हैं |

१२२२   १२२२  १२२२ १२२२ 
नज़र  के फेर में कितने  फ़साने रोज  बनते हैं |

कहीं राधा कहीं  मोहन बने   लाचार  जलते हैं |

नज़ारा  और होता है  खिले जब  फूल डाली में  ,

कहीं खुशबू…

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Added by Shyam Narain Verma on February 18, 2015 at 5:30pm — 13 Comments

गीतिका .....8 + 8---निगाहें

आँज गगन का नील निगाहें

लगती गहरी झील  निगाहें

 

माँस बदन पर दिख जाये तो

बन जाती है चील निगाहें

 

आन टिकी है मुझ पर सबकी

चुभती पैनी कील निगाहें

 

बंद गली के उस नुक्कड़ पर

करती है क्या डील निगाहें

 

इक पल में तय कर लेती है

यार हज़ारों मील निगाहें

 

बाँध सकेगा मन क्या इनको

देती मन को ढील निगाहें

 

दिखने दे ‘खुरशीद’ नज़ारे

किरणों से मत छील निगाहें 

मौलिक व…

Continue

Added by khursheed khairadi on February 18, 2015 at 3:30pm — 18 Comments

आज़ादी --- डॉ o विजय शंकर

उड़ता वो आज़ाद परिंदा

नभ छू लेने की कोशिश

करता है,

ऊंचा , ऊंचा उड़ता है |

बीच बीच में धरती छूने ,

लौट , लौट कर आता है ,

कुछ चुंगता है, कुछ खाता है,

इठलाता है, कुछ गाता है ,

फिर , फुर्र से उड़ जाता है ,

दूर, बहुत दूर , ओझल हो ,

क्षितिज तरफ वो जाता है ,

क्षितिज तरफ वो जाता है ||

यूँ आते - जाते हमको वो

अपने हौसले दिखलाता है ,

और हमको यह बतलाता है,

हौसलों से क्या नहीं हो जाता है,

हौसलों से क्या नहीं हो जाता है… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 18, 2015 at 1:32pm — 25 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
विश्व पुस्तक मेला-2015

विश्व पुस्तक मेला-2015

मेट्रो की घड़घड़ाहट

और ज़िंदगी की फड़फड़ाहट के बीच

कुछ शब्द उभरकर आते हैं

जब-

वरिष्ठ नागरिकों के लिए

आरक्षित आसन पर

नए युग का प्रेमी युगल

चुहल करता है

और-

अतीत की झुर्रियों का फ़ेशियल लिए

लड़खड़ाती हड्डियों का

बेचारा ढाँचा

अवज्ञा की उंगली पकड़कर

अपने गौरवमय यौवन का

सौरभ लेता हुआ

कुछ पल के लिए खो जाता है;

मेट्रो की घड़घड़ाहट थमने लगती है

हड्डियों का ढाँचा

हड़बड़ाहट में चौकन्ना होता…

Continue

Added by sharadindu mukerji on February 18, 2015 at 12:00pm — 19 Comments

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