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आचरण से ध्यान जादा डील में - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122   2122      212
****************************
दोष  ऐसा  आ  गया  अब  शील में
फासले  कदमों  के  बदले  मील में
***
भर लिया तम से मनों को इस कदर
रोशनी   भी   कम   लगे  कंदील  में
****
देह  होकर   देह   सा   रहते  नहीं
टाँगते  खुद  को वसन से कील में
****
युग  नया  है  रीत भी  इसकी नई
आचरण  से  ध्यान  जादा डील में  /       डील-दैहिक विस्तार
****
अब  बचे  पावन  न  रिश्ते दोस्तो
तत तक बदले है खुद को चील में
***
भय सताता क्या  तुम्हें भी दाग का
श्वेत  चादर  जो   डुबोते   नील  में
***
देखता  हूँ  दुर्जनों   को  भय नहीं
राज  गहरा  शासकों  की ढील में
***
चह तो थी वो  सिखाए  शील कुछ
संत  ही पर  रम गए अश्लील में
***
छटपटाता  जब  वनों  पर  चोट हो
हमसे  जादा  सभ्यता  है  भील में
***


मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 21, 2015 at 11:45am

आ0 भाई आषुतोष जी प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 21, 2015 at 11:44am

आ0 प्रतिभा बहन उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 21, 2015 at 11:44am

आ0 भाई समर जी, प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 21, 2015 at 11:44am

आ0 भाई महर्षि जी आपको गजल अच्छी लगी यह मेरे लिए हर्ष का विषय है । हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 21, 2015 at 11:44am

आ0 भाई कंवर करतार जी उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 21, 2015 at 11:43am

आ0 भाई सोमेश जी प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 21, 2015 at 11:43am

आ0 भाई मिथिलेश जी , अपकी प्रतिक्रियाओं से निरंतर बेहतर लिखने का प्रयास करने की प्ररणा मिलती है । निरंतर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए कोटि कोटि धन्यवाद । आपने सही फरमाया टंकण त्रुटिया अवश्य ध्यान भटका रही होंगी । प्रयास रहेगा कि इस तरह की त्रुटियां न छूटें । सादर ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 21, 2015 at 11:43am

आ0 भाई सुशील जी उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 21, 2015 at 11:43am

आ0 भाई गोपालनारायण जी लगातार उपस्थिति से उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद । तत तक बदले को तात तक बदले पढें यहां पर टंकण की त्रुटि रह गयी है ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 21, 2015 at 11:21am

आ0 भाई परि एम श्लोक जी, प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

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