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आवाज़ का रहस्य (कहानी )

आवाज़ का रहस्य (कहानी )

प्रशिक्षु चिकित्सक के रूप में दिनेश और मुझे कानपुर देहात के अमरौली गाँव में भेजा गया था |नया होने के कारण हमारी किसी से जान-पहचान ना थी इसलिए हमने अस्पताल के इंचार्ज से हमारे लिए आस-पास किराए पर कमरा दिलाने को कहा |उसने हमे गाँव के मुखिया से मिलवाया |

“ किराए पे तो यहाँ कमरा मिलने से रहा |तुम अजनबी भी हो और जवान भी | परिवार भी नहीं है !ऐसे में कोई गाँव वाला - - - “

“ ऐसे में ये लड़के चले जाएंगे |फिर गाँव वालों का ईलाज - - - - कितनी बार लिखने पर मेडिकल कालेज ने इन्हें यहाँ - - -“ इन्चार्ज ने चेताया

“ एक काम हो सकता है |” मुखिया ने कुछ सोचकर कहा |

“ गाँव के दक्षिणी छोर पर मेरा जानवरों का तबेला है |तबेले के ऊपर एक रूम-सैट है |ये अगर रह सकते हैं तो मुझे कोई आपत्ति नहीं|मैं इसका किराया भी ना लूँगा |”

“हाँ-हाँ हाँ - -हम रह लेंगे|” हम दोनों ने एक स्वर में कहा |

सर्दियों का मौसम था,अँधेरा जल्दी घिर आता था |ऊपर से वहाँ बिजली भी नहीं पहुंची थी |

गोधूलि की बेला पर हम मुखिया के साथ तबेले पर पहुँचे |गाय-भैंस समेवत स्वर में गायन की प्रतिस्पर्धा कर रहीं थी |झींगुर झन-झना रहे थे और रह-रहकर छन-छन खन-खन टsन –टsन गाय और भैंसों के गले में बंधी छोटी घंटियाँ बज उठती |मच्छर भी रह-रहकर झनs s कर रहे थे |मानों कह रहे थे मियां ये हमारा बसेरा है तुम कैसे !

ऊपर कमरे में पहुँचे तो पाया कि 16-18 के बीच की मध्यम काठी और हल्के गेहूँए वर्ण की एक लड़की कमरे को बुहार रही थी |वो थोड़ा आगे बढ़ी तो–“छन-छन “ शायद उसने पायल पहनी थी |मेरी नज़र उस पर पड़ी और उसने हल्की सी पलके उठाई और फिर तुरंत झुका लीं |झाड़ू लगाकर वो जाने लगी |मन हुआ उसका नाम पूछूँ पर संकोच और शिष्टता के चलते चुप रहा |

मुखिया ने उसे पुकार कर कहा-“मंगला,काकी से कहियो की चाय-पानी भिजवा दें |”और छन-छन छन की आवज़ धीमी होती चली गई |

“बेचारी,3 साल की थी तभी माँ सामने वाले तालाब में पैर फिसलने से डूब गई ,बाप 2 साल पहले सड़क-हादसे में गुजर गया तब से हमारे यहाँ ही रहती है |जात से कुम्हार है |”अलगनी पर खड़े मुखिया ने तालाब से मुँह हमारी तरफ फेरते हुए कहा |

चाय-पानी पीते हुए सारी औपचारिक बाते होती रही |बीच-बीच में मुखिया हमें गाँव के किस्से सुनाता रहा और ये भी बताता रहा कि गाँव की कौन सी जगहें भुतिया हैं और कहाँ रात में जाने से बचना है |बीच-बीच में खन-खन छन-छन तबेले के जानवरों की गति से उनके गले की घंटिया बज उठती थी |

मुखिया हमें अपने घर भोजन के लिए ले गए |खाना परोसने का काम मंगला कर रही थी उसके कदमों के साथ उसकी पायल छनक उठती |एकाध बार जब मैनें चावल मांगते हुए उसकी तरफ देखा तो उसने शर्माहट भरी हल्की मुस्कान के साथ खूब सारा चावल परोस दिया |

भोजन के बाद मुखिया हमें तबेले तक छोड़ने आया और लगभग चेतावनी के स्वर में कहा “ध्यान रखना!रात को बाहर मत निकलना |यहाँ कई तरह के खतरे हैं| ”

मुखिया के जाते ही हमने दरवाजा भेडा ,लालटेन बंद की और एक-एक चारपाई पे लेट गए और मुँह ढक लिया |लगभग 8 बज रहे थे पर सर्दी और दूर-दूर तक अँधेरा होने से मध्य-रात्रि का अनुभव हो रहा था |

मैं मुँह ढके अपनी रजाई का तापमान बढ़ा रहा था |

“विजय !”लगभग 11 बजे के आसपास किसी की हल्की सी पुकार सुनाई दी |नींद में होने और सर्दी के कारण मैंने अनसुना कर दिया |

“अरे विजय !”उसने जोर से कहा और लगभग कूदता हुआ मेरी रजाई में आ घुसा |

”क्या हुआ ठंड ज़्यादा लग रही है ?” मैंने मजाकिया लहजे में पूछा |

“तुम्हें कुछ सुनाई दिया |” उसने कुछ आशंका से कहा |

“छुs न ,छुs न ,छुsन “रह-रहकर मृदुल पायलों सी ध्वनि सुनाई पड़ी |

भss उ ,हूआँ-हूआँ s,कुत्तों और सियारों में संगीत प्रतिस्पर्धा चल रही थी |

“काss य-2” शायद नींद में खलल पड़ने से किसी ग्रामीण ने ग्वइए को खदेड़ा था |

“सो जा यार ,ये गाँव है ,यहाँ ये सब नार्मल है |”

लगभग बीस मिनट बाद वो फिर बिस्तर में चला आता है |

“मुझे वो आवाज़ फिर सुनाई दे रही हैं,तू भी सुन- -  “ दिनेश ने बिस्तर में घुसते हुए कहा |

“ छsन ,छुsन ,छुsन ,- - “

“अरे नीचे तबेले के जानवरों को घंटिया बज रही होंगी,जा,सो जा |”

तभी –“छूs नs”

सुना तुमनें वो आवाज़ घंटियों की आवाज़ से अलग है |तभी –“भाँs ,माँs”

“कुछ नहीं यार तू वहम पाल रहा है ,जा,सो जा |”

तभी- “छुन –छुन ,छनss”

“सुना ऐसा लगता है कोई आस-पास पायल पहने टहल रहा है |”वो डरते-डरते बोला |

धड़कने मेरी भी तेज़ हो गई| अब शंका ने जन्म ले लिया था |तभी मंगला का ख्याल आया |मैं झट से उठा और दरवाज़ा खोल दिया |

दिनेश ने घबराते हुए कहा –“क्या कर रहे हो ?”

उसकी बात काटते हुए मैंने आसपास और पूरे आहाते में टार्च मारी |

“कौन है –कौन है ?”पर वहाँ जवाब देने वाला कोई ना था |

मैंने दरवाज़ा लगाया और रजाई में घुसा ही था कि-“छुन –छुन ,छनss “

अब तो मेरी घबराहट भी बढ़ने लगी थी पर मैंने देखा कि दिनेश पसीने से तरबतर है और उसका चेहरा भय से पीला पड़ गया है |

“डरों मत यार !इससे समस्या हल नहीं होने वाली |ये आवाज़ जिस वजह से भी हो इसका पता तो लगाना ही होगा |” मैंने ज़ोर देते हुए कहा और अंगुली के इशारे से उसे चुप्प रहने का संकेत कर अपना ध्यान आवाज़ की दिशा पर केन्द्रित किया|

“सुनों,ये छत की दूसरी तरफ से आ रही है |” मैंने बहुत धीमे से कहा |

“जय हनुमान ज्ञान गुण सागर - - -“दिनेश ज़ोर-ज़ोर से बुदबुदाने लगा |मैंने उसे डाटा और टार्च लेकर आवाज़ की दिशा में बढ़ने लगा|दिनेश रजाई में खुद को छुपाए हनुमान जाप करता रहा |मैंने कमरे का छत की तरफ वाला दरवाज़ा आहिस्ते से खोला पर लकड़ी का दरवाज़ा चरर्रS करते हुए खुला और तभी –“छुन-छुन-छुन्नS”

“बाप रे !बचाओं रे !”चिल्लाता हुआ दिनेश मुझसे आकर लिपट गया |और तभी –

“हुआँ-हुआँ,भुउ -भुउ ओ,झन्न-झन्न, टर्र-टर्र |”

रात के 12 बज चुके थे |खुला ग्रामीण इलाका होने के कारण वातावरण में हल्का धुंधलका था |आसमान साफ़ था और असंख्य तारे आँखों को अभिभूत कर रहे थे ,जुगनू इधर-उधर भ्रमण कर रहे थे और हवा का स्पर्श पाकर पत्ते खड़-खड़ कर उठते |हवा से ठंड और बढ़ गई थी पर डर के मारे हृदय धौकनी हुआ जाता था |

“टर्र-टर्र “ टार्च मारी तो तबेले से कुछ दूर स्थित तालाब का पानी और मेंढकों की आँखे चमकी |दिनेश ने उधर से मुँह फेर लिया और तभी –“भौSऊS”

शायद टार्च की रोशनी से आसपास का कोई कुत्ता चौकन्ना हो गया था |हमने छत पर बने बाथरूम और टायलेट को चेअक किया पर कुछ नहीं मिला |

हम वापस कमरे का दरवाज़ा बंद करने को मुड़े ही थे कि- “छुन –छुन ,छनss”

“भाई वो प्रधान जी ने,मंगला की माँ के बारे में - - - - “

“चुप्प,बेकार की बात मत कर ,डाक्टर होकर ऐसी बात करता है |”

“आ,मेरे साथ - - - - अब पता लगाकर ही दम लूँगा|”

तभी-“छुन –छुन ,छनss”

हम दबे पाँव बाहर आते हैं पर कुछ नज़र नहीं आता |हम फिर से आसपास का मुआयना करते हैं पर रिजल्ट सिफ़र तभी –“छुन –छुन ,छनss”

मैं बाथरूम पर टार्च मारता हूँ पर कुछ नहीं |

तुमने गौर किया ये आवाज़ पायल की नहीं लगती |वो तो नीचे की तरफ से उठती है - - - “

“चुड़ैले कहीं भी आ जा सकती हैं |”

“अब अगर तू कुछ भी बोला तो,तुझे यहीं बाहर छोड़ अंदर कमरे में सो जाऊँगा |”

वो चुप्प हो गया |मैंने बाथरूम की छत की तरफ टार्च मारी |उसकी दक्षिणी दीवार में ईटों की जाली का रोशनदान बना था |पर टार्च की लाईट मद्धम पड़ जाने के कारण कुछ साफ़ नहीं दिखता था |

मैं जल्दी से दूसरी टार्च उठाकर लाया और हम चुपचाप बाथरूम के गेट पर खड़े हो गए |कुछ देर बाद-“छुन –छुन ,छनss”

मैंने आवाज़ की तरफ टार्च मारी और नन्ही चिड़िया से एक छोटी आकृति नज़र आई |संदेह मिटाने के लिए हम खड़े रहे और जैसे ही “छु न S “ मैंने अपनी टार्च चिड़िया की तरफ कर दी |वो एक छोटा हमिंग बर्ड था |कलरव करते समय उसकी गर्दन लट्टू सी नाचती थी |दिनेश उसे देखकर हैरान था और वहम में भी |ना चाहते हुए भी मैंने चिड़िया को उड़ा दिया |

अगली शाम को जब अस्पताल से लौटे तो –“छन-छन –छन “ मंगला झाड़ू लगा रही थी |

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by somesh kumar on February 24, 2015 at 9:46pm

भाई हरि प्रकाश जी रचना को समय देने के लिए शुक्रिया ,आ.गोपाल नारायण जी एवं गिरिराज सर जी हौसलाअफजाई एवं मार्गदर्शन के लिए तहे दिल से आभारी हूँ |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 23, 2015 at 9:42pm

आदरनीय सोमेश भाई , आपकी कहानी बहुत अच्छी लगी , हार्दिक बधाई आपको !! आदरणीय गोपाल भाई जी की बातों का संज्ञान ज़रूर लें ॥

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 21, 2015 at 4:53pm

सोमेश जी

कहानी अच्छी लगी i

टिप- कहानी  सुनने और लिखने में फर्क है  i कहानी present नहीं होती  आपने   present indefinite  tense का प्रयोग संवाद से इतर किया i संवाद में संभव है पर इतर नहीं i------ मैं बाथरूम पर टार्च मारता हूँ पर कुछ नहीं |--------- मैंने बाथरूम  के अन्दर टार्च  मारी पर कुछ दिखाई न दिया

ध्वन्यार्थक शब्दों का प्रयोग कम से कम करे शब्द को सहज रखे i i सियारों की हुआ हुआ  की आवाजे आ रही थे i इनकी प्रतिक्रिया में कुत्ते भौंक रहे थे i

सस्नेह i

Comment by Hari Prakash Dubey on February 20, 2015 at 9:43pm

सोमेश भाई ,सुन्दर रचना ,बधाई आपको !

कृपया ध्यान दे...

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