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गीतिका .....8 + 8---निगाहें

आँज गगन का नील निगाहें

लगती गहरी झील  निगाहें

 

माँस बदन पर दिख जाये तो

बन जाती है चील निगाहें

 

आन टिकी है मुझ पर सबकी

चुभती पैनी कील निगाहें

 

बंद गली के उस नुक्कड़ पर

करती है क्या डील निगाहें

 

इक पल में तय कर लेती है

यार हज़ारों मील निगाहें

 

बाँध सकेगा मन क्या इनको

देती मन को ढील निगाहें

 

दिखने दे ‘खुरशीद’ नज़ारे

किरणों से मत छील निगाहें 

मौलिक व अप्रकाशित 

Views: 809

Comment

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Comment by khursheed khairadi on February 23, 2015 at 10:36am

आदरणीय गोपालनारायण सर ,आदरणीय गिरिराज सर , आदरणीया परी जी ,आदरणीया प्रतिभा जी ,आदरनिये सुशील सर जी,आदरणीय दिनेश जी ,आप सभी का हार्दिक आभार |दिनेश भाई  नील=नीला रंग (संस्कृत\पुर्लिंग), आँजना=अंजन लगाना ,,मेरा भाव यह था कि ''नायिका की आँखें गगन का नीला रंग आँज कर किसी गहरी झील के सदृश्य हो गई है "  कुछ अच्छे शेर पहले हुये थे बाद में मतला कहा  गया था, इस कारण प्रयास में कुछ कमी रही हो |एक बार  पुनः स्नेह बरसाए |सादर आभार | 

Comment by दिनेश कुमार on February 22, 2015 at 7:17am
बेहतरीन ग़ज़ल हुई हैआदरणीय खुर्शीद भाई जी, सिर्फ पहला मिसरा मुझे नहीं समझ आया, बाकी सभी Top class...वाह वाह वाह
Comment by Sushil Sarna on February 19, 2015 at 7:31pm

आँज गगन का नील निगाहें
लगती गहरी झील निगाहें

माँस बदन पर दिख जाये तो
बन जाती है चील निगाहें

नमन आपकी लेखनी को आदरणीय .... हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 19, 2015 at 1:21pm

आ० खैरादी जी

इतनी उम्दा गजल कौन लिख सकता  है i मतले ने ही मन मोह लिया- आँज गगन का नील निगाहें i   शायद  'का ' शब्द में   टंकन त्रुटि  है i  पूरी गजल लाजवाब i शानदार i पुरअसर i  सादर i

Comment by Pari M Shlok on February 19, 2015 at 12:00pm
माँस बदन पर दिख जाये तो

बन जाती है चील निगाहें

बंद गली के उस नुक्कड़ पर

करती है क्या डील निगाहें
निगाहों का सुन्दर विश्लेषण ... नज़रो को कितने रंगो में ढाल पेश किया आपने ..कमाल लिखा वाह

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 19, 2015 at 10:32am

आदरणीय खुर्शीद भाई , बहुत सुन्दर गज़ल हुई है , काफिया भी बड़ा कठिन  लगा मुझे , पर आपने खूबसूरती से  निबाह लिया है ॥ आपकओ हार्दिक बधाइयाँ ॥

माँस बदन पर दिख जाये तो

बन जाती है चील निगाहें

 

आन टिकी है मुझ पर सबकी

चुभती पैनी कील निगाहें  --- दोनो अशार  बेहद पसंद आये ॥ बधाई , आदरणीय ।

 

Comment by khursheed khairadi on February 19, 2015 at 10:01am

आदरणीय विजयशंकर सर ,आदरणीय हरिप्रकाश सर ,आप महानुभवों का स्नेह सतत अच्छा लिखने को प्रेरित करता है |सादर आभार |

Comment by khursheed khairadi on February 19, 2015 at 9:59am

आदरणीय मिथिलेश जी ,सराहना के लिए हृदय से आभार |आपकी तरही ग़ज़ल काफ़ी सुन्दर बनी है |मूल ग़ज़ल को भावों को अधिक विस्तार देती हुई है |तरही मिसरा कील के अर्थ को अधिक मर्म के साथ प्रस्तुत कर रहा है |हार्दिक बधाई |सादर आभार |

कोमल दिल को रोज डराती 

"चुभती पैनी कील निगाहें"

Comment by khursheed khairadi on February 19, 2015 at 9:54am

आदरणीय कबीर साहब ,गीतिका आपको भायी ,इसके लिए हृदय से आभार |मतला वाकई ढीला लग रहा है ,अगर इसे यूं रखूं 

आँज गगन का नील निगाहें 

लगती गहरी झील निगाहें 

इस मतले पर आपका आशीर्वाद चाहूँगा |सादर |

Comment by khursheed khairadi on February 19, 2015 at 9:51am

आदरणीया राजेश कुमारी जी ,गीतिका आपको पसंद आयी इसके लिए हृदय से आभार ,स्नेह बनाय रखियेगा |सादर |

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