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गीतिका --8+8+8 .....फिर आऊँगा

मातृधरा को शीश नवाने फिर आऊँगा

जननी तेरा कर्ज़ चुकाने फिर आऊँगा

 

चंदन जैसी महक रही है जो साँसों में

उस माटी से तिलक लगाने फिर आऊँगा

 

आँसू पीकर खार जमा जिनके सीनों में

उन खेतों में धान उगाने फिर आऊँगा

 

इक दिन तजकर परदेशों का बेगानापन

आखिर अपने ठौर ठिकाने फिर आऊँगा

 

गोपालों के हँसी ठहाके यादों में हैं

चौपालों की शाम सजाने फिर आऊँगा

 

खाट मूँज की छाँव नीम की थका हुआ तन

जेठ दुपहरी में सुस्ताने फिर आऊँगा

 

वन्य फलों की देसी लज़्ज़त होठों पर है

बोर मतीरे तेंदू खाने फिर आऊँगा

 

ताऊ चाचा बाबा खेले जिस आँगन में

उस आँगन में दोड़ लगाने फिर आऊँगा

 

सुख का सहरा जब इस मन को झुलसायेगा

अमराई में राहत पाने फिर आऊँगा

 

भेद खुलेगा मृगतृष्णाओं का भी इक दिन

पनघट पर ही प्यास बुझाने फिर आऊँगा

 

छोर गगन का छू पायेगी क्या परवाज़ें

फुनगी पर ही नीड़ बनाने फिर आऊँगा

 

शहरी बाना तन पर लेकिन मन देहाती

तन मन का यह भेद मिटाने फिर आऊँगा

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by khursheed khairadi on February 23, 2015 at 10:26am

आदरणीया वंदना जी ,सादर आभार |

Comment by vandana on February 20, 2015 at 8:42pm

वाह इतनी खूबसूरत प्रस्तुति सादर नमन आदरणीय 

Comment by khursheed khairadi on February 20, 2015 at 8:28pm

आदरणीय गोपाल नारायण सर ,आपके आशीर्वाद से पंक्तियाँ संवर गई है |सादर आभार |

Comment by khursheed khairadi on February 20, 2015 at 8:27pm

आदरणीय आशुतोष सर ,बहुत बहुत आभार|स्नेह बनाये रखियेगा |सादर   

Comment by khursheed khairadi on February 20, 2015 at 8:26pm

आदरणीया सविता जी ,आदरणीया राजेश कुमारी जी ,हार्दिक आभार |सादर |

Comment by khursheed khairadi on February 20, 2015 at 8:24pm

आदरणीय सौरभ सर . छंद और ग़ज़ल संबधी आपकी पूर्व शंकाओं और अपने अल्पज्ञान के चलते मैंने इस ग़ज़ल को गीतिका नाम दिया है |किन्तु आपके इस आशीर्वचन "सौ-सौ ग़ज़लें क़ुर्बान " ने मेरे उत्साह को सौ सौ पर लगा दिए है |

आशीषों की छाँव सुहानी तव चरणों में 

ग़ज़लें लेकर शीश झुकाने फिर आऊँगा |सादर |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 14, 2015 at 1:38am

प्रस्तुति पर सदा की तरह नम हूँ. आपके शब्द-शब्द से मेरा गाँव रुपायित हो रहा है जो बस स्मृतियों में ज़िन्दा है. फफनती हूक को मिलता हर शब्द आग्रही है, आदरणीय.

सोंधे-सोंधे शब्द तुम्हारे नम करते हैं  
शेर-शेर पर दाद लुटाने फिर आऊँगा
सौ-सौ ग़ज़लें क़ुर्बान !

Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 13, 2015 at 4:49pm

आदरणीय खुर्शीद जी आपकी रचनाओं को पढने से पढने के आनंद के साथ ज्ञान समृद्धि में भी बृद्धि होती है इस सुंदर रचना के लिए तहे दिल बधाई सादे 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 12, 2015 at 8:12pm
फिर फिर पढ़ रहा हूँ। बड़ी सोंधी सोंधी महक है इसे गुनगुनाते हुए बस भुला बिसरा याद आ रहा है तेंदू की मिठास महसूस हो रही है कच्चे बेर की मिठास कसैली वाली।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 12, 2015 at 7:14pm

आदरणीय खैरादी जी

जी चाहता है आपकी कलम चूम लूं i वाह---

 खाट मूँज की छाँव नीम की थका हुआ तन----इस पंक्ति में प्रवाह कुछ कम लगता हैi यदि ऐसा कहें --खाट मूँज की छाँव नीम की गंध पवन की

सुख का सहरा जब इस मन को झुलसायेगा i यदि ऐसा कहें -झुलसायेगा सुख का सहरा जब इस मन को

   उक्त सुझाव मेरा मनोरंजन है i आप पर बाध्यकारी नहीं i बहुत ही सुन्दर रचना के लिया आपको फिर से बधाई i

कृपया ध्यान दे...

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