For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts

धूप -कविता

धूप 



 

जिधर देखो आज

धुन्धलाइ सी है धूप. 

 

न जाने आज क्यों?

कुम्हलाई सी है धूप. 

 

आसमाँ के बादलों से

भरमाई सी है धूप. 

 

पखेरूओं की चहचाहट से

क्यों बौराई सी है धूप? 

 

पेड़ों की छाँव तले

क्यों अलसाई सी है धूप? 

चैत के माह में भी

बेहद तमतामाई सी है धूप. 

 

हवाओं की कश्ती पर सवार

क्यों आज लरज़ाई सी है धूप?

"मौलिक व…

Continue

Added by Veena Sethi on July 24, 2014 at 5:30pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - कभी दोश अश्कों से तर रहा ( गिरिराज भंडारी )

11212     11212      11212       11212  

न तो आँधियाँ ही डरा सकीं , न ही ज़लजलों का वो डर रहा

तेरे नाम का लिये आसरा , सभी मुश्किलों से गुजर रहा

 

न तो एक सा रहा वक़्त ही , न ही एक सी रही क़िस्मतें

कभी कहकहे मिले राह में , कभी दोश अश्कों से तर रहा

 

कोई अर्श पे जिये शान से , कहीं फर्श भी न नसीब हो 

कहीं फूल फूल हैं पाँव में , कोई आग से है गुज़र रहा

 

तेरी ज़िन्दगी मेरी ज़िन्दगी , हुआ मौत से जहाँ सामना

हुआ हासिलों…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on July 24, 2014 at 2:30pm — 22 Comments

वह राज तंत्र था --डा० विजय शंकर

वह एक राजतंत्र था

एक द्रौपदी थी , एक ही ,

वह भी थी उसी कुल की .

पिता तुल्य राजा था वह ,

सचमुच पूरा अंधा था वह .

पितामह भी थे, अंध नहीं

पर अंध स्वामिभक्त थे,

सत्ता नहीं सत्ताधारियों के

प्रति समर्पित, आसक्त थे .

चीर हरण था , वह भी

संकेतात्मक , विफल .

पर ले डूबा कुल वंश ,

अंध स्वामिभक्त बड़े

अधिष्ठाता भी नहीं बचे ,

बड़े कष्ट से मुक्त हुए .

हुए नष्ट पाप के सब सहभागी

सती जस माता रही अभागी .

बचा संग अंधा राजा ,… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on July 24, 2014 at 10:55am — 14 Comments

सावन के झूलों ने मुझको बुलाया

सावन के झूलों ने मुझको बुलाया

डॉ० ह्रदेश चौधरी

मदमस्त चलती हवाएँ, और कार में एफएम पर मल्हार सुनकर पास बैठी मेरी सखी साथ में गाने लगती है “सावन के झूलों ने मुझको बुलाया, मैं परदेशी घर वापिस आया”। गाते गाते उसका स्वर धीमा होता गया और फिर अचानक वो खामोश हो गयी, उसको खामोश देखकर मुझसे पूछे बिना नहीं रहा गया। वो पुरानी यादों में खोयी हुयी सी मुझसे कहती है कहाँ गुम हो गए सावन में पड़ने वाले झूले, एक…

Continue

Added by DR. HIRDESH CHAUDHARY on July 23, 2014 at 7:30pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
चुभें ये अगर साफ़ बातें मेरी (ग़ज़ल 'राज')

१२२  १२२  १२२  १२

 

जहाँ  गलतियाँ हों बता दें मेरी

चुभें  ये  अगर साफ़ बातें मेरी

 

तुम्हें जिन्दगी दी तो हक़ भी मिला

तुम्हारे कदम पे निगाहें  मेरी

 

हर इक मोड़ पर तुम मुझे पाओगे

नहीं हैं जुदा तुमसे राहें  मेरी

 

तुम्हें नींद आती नहीं है अगर

कहाँ फिर कटेंगी ये रातें मेरी

 

छुपा क्या सकोगे जबीं की शिकन

हमेशा पढ़ेंगी ये आँखें मेरी

 

तुम्हारी हिफ़ाज़त करूँ जब तलक

चलेंगी तभी तक…

Continue

Added by rajesh kumari on July 23, 2014 at 11:30am — 17 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : महाचोर

"अरे जरा पता तो कर, इस एरिआ में स्साला कौन पैदा हो गया जो मेरे घर में चोरी कर गया." नेताजी गरजते हुए बोले । 
"भईया जी, पता चल गया है, इ काम कल्लुआ गिरोह का है, चोरी के माल के साथ बड़का गाँव में छुपा हुआ है, आप कहें तो पुलिस भेज कर उसे चोरी के माल के साथ गिरफ्तार करवा दें ?"
"अबे पगला गया है क्या ? जीते जी मरवायेगा !!! उ कल्लुआ को खबर करवा दे,…
Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 23, 2014 at 9:30am — 18 Comments

स्वाद

"ये क्या मम्मी , फिर आपने इस ठेले वाले से सब्ज़ी खरीद ली । कितनी बार कहा है की सामने वाले शॉपिंग माल से ले लिया करो । सब्ज़ियाँ ताज़ी भी मिलती हैं और अच्छी भी । क्या मिलता है आपको इसके पास"।

"बेटा , इसकी सब्ज़ी में अपनापन है और उसमे जो स्वाद मिलता है न वो और कहीं नहीं मिलता"।

मौलिक एवँ अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on July 23, 2014 at 3:00am — 12 Comments

वह लड़की

वह लड़की!

मैं उसे बदलना चाहती थी

उसे पुराने खोह से निकालकर

पहनाना चाहती थी एक नया आवरण.

उसके बाल लम्बे होते थे

अरण्डी के तेल से चुपड़ी

भारी गंध से बोझिल

वह ढीली-ढाली सलवार पहनती थी

वह उस में नाड़ा लगाती थी

उसके नाखून होते थे मेँहदी से काले

एकाध बार सफ़ेद किनारा भी दिख जाता.

वह चलती थी सर झुकाये.

वह चुप रहती

मगर....उसके मन में सागर की लहरों

का सा होता घोर गर्जन.

आँखों में हरदम एक तूफ़ान लरजता

उसकी…

Continue

Added by coontee mukerji on July 22, 2014 at 9:12pm — 10 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,गुमनाम पिथौरागढ़

२१२२  १२२२   २

झोपड़ी को डुबाने निकले
सारे बादल दिवाने   निकले

खेत घर हो गए बंजर से
बच्चे बाहर कमाने  निकले

द्रोपदी सी प्रजा है बेबस
जब से राजा ये काने  निकले

आदमी भूल आदम की पर
पाक खुद को बताने  निकले

जब्त गम को किया तब हम भी
इस जहां को हँसाने  निकले

माँ को खोया तो समझा मैंने
हाथ से जो खजाने  निकले

मौलिक व अप्रकाशित

गुमनाम पिथौरागढ़ी

Added by gumnaam pithoragarhi on July 22, 2014 at 7:00pm — 10 Comments

बैसाखियाँ- डा० विजय शंकर

बैसाखियाँ बैसाखियाँ बैसाखियाँ ,

हर तरफ बैसाखियाँ ,

उनके लिए जिन्हें जरुरत है ,

उनकें लिए भी , जिन्हें जरुरत नहीं है .

लोगों को बैसाखियों की जरुरत हो न हो

बैसाखियों को तो सबकी जरुरत है.

सब उन्हें लें , उनके सहारे आगे बढ़ें ,

अन्यथा बिलकुल न बढ़ें , नहीं तो ,

बढ़ना क्या , चलने लायक नहीं रह जायेगें .

फिर हमारे पास , हमको लेने आयेंगें .

हमें समझें , हमारा महत्व समझें ,

क्यों हमारा धंधा खराब करते हैं



मौलिक एवं अप्रकाशित.

डा० विजय… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on July 22, 2014 at 1:16pm — 14 Comments

रीतिरात्मा काव्यस्य - डा0 गोपाल नारायन श्रीवास्तव

रीति संप्रदाय पर चर्चा करने से पूर्व  यह स्पष्ट कर देना समीचीन होगा कि भारतीय हिन्दी साहित्य के रीति-काल में प्रयुक्त ‘रीति’ शब्द से इसका कोई प्रयोजन नहीं है I रीति-काल में लक्षण ग्रंथो के लिखने की एक बाढ़ सी आयी, जिसके महानायक केशव थे और इस स्पर्धा में कवियों के बीच आचार्य बनने की होड़ सी लग गयी I परिणाम यह हुआ कि अधिकांश कवि स्वयंसिद्ध आचार्य बने और कोई –कोई कवि न शुद्ध आचार्य रह पाए और न कवि I इस समय ‘रीति ‘ शब्द का प्रयोग काव्य शास्त्रीय लक्षणों के लिए हुआ I  किन्तु, जिस रीति संप्रदाय की…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 22, 2014 at 11:30am — 17 Comments

आग्रही नयी पीढ़ी

सामाजिक सुरक्षा को तरसे

एकल परिवारों में जो पले,

आर्थिक सुरक्षा और -

स्नेह भाव मिले

संयुक्त परिवार की ही

छाया तले |

घर परिवार में

हर सदस्य का सीर  

बुजुर्ग भी होते भागीदार,

बच्चो की परवरिश हो,

संस्कार या व्यवहार |

 

अभिभावक व माता पिता

जताकर समय का अभाव

नहीं बने

अपराध बोध के शिकार,

संयुक्त परिवार तभी

रहे और चले |

प्रतिस्पर्था से भरी

सुरसा सामान…

Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 22, 2014 at 10:30am — 10 Comments

भुला देना

मरा था मैं तड़प कर वो जमाना भी भुला देना

बसाया था तुझे दिल में फसाना भी भुला देना



जले खुद थे चरागो से बचाया था तुझे हमने

नहीं ये राह फूलो की बताना भी भुला देना



सहे है दर्द हम कितने पता हो तो जरा बोलो

छुपा कर दर्द मेरा  मुस्‍कुराना भी भुला देना



निगााहो में बसाया था तुझे आखे बनाया था

चली जो छोड़ कर अाँसू बहाना भी भुला देना





उड़े आंचल तुम्‍हारे थे सभाला था हवाओं से

कहा था कुछ हवाओं ने बताना भी भुला…

Continue

Added by Akhand Gahmari on July 21, 2014 at 8:00pm — 23 Comments

कौन छोड़ा इस हवस के आदमी ने - गजल ( लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर ’ )



2122    2122    2122

**************************

घाट सौ-सौ  हैं  दिखाए  तिश्नगी  ने

कौन छोड़ा  इस  हवस के आदमी ने

**

करके  वादा   रोशनी  का हमसे यारो

रोज  लूटा  है   हमें   तो   चाँदनी ने

**

राह बिकते मुल्क  के सब रहनुमा अब

क्या किया ये  खादियों  की  सादगी ने

**

रात जैसे  इक  समंदर  तम  भरा  हो

पार जिसको नित  किया आवारगी ने

**

झूठ को जीवन दिया है इसतरह कुछ

यार  मेरे  सत्य को  अपना  ठगी ने

**

पास आना था हमें  यूँ भी…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 21, 2014 at 7:46pm — 10 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : भुट्टे वाली (गणेश जी बागी)

            "भुट्टे ले लो, हरे ताजे भुट्टे ले लो !" हर रोज सुबह-सुबह मैले कुचैले कपडे पहने, सर पर टोकरी लिए भुट्टे वाली कॉलोनी में आ जाती थी, मैं तो उसकी आवाज़ से ही जगता था ।

               …
Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 21, 2014 at 6:30pm — 25 Comments

एक खौफनाक रात

यह बात 24 जून 1989 की है मेरे पिता जी जनपद देवरिया के पडरौना में तैनात थे। हम लोग वही से अपनी कार यू0पी0के0 4038 से पडरौना से अपनी मौसी की शादी में भाग लेने धरहरा मुँगेर जा रहे थे। हमारे साथ हमारी माता जी, दो भाई, मामा और वह मौसी जिनकी शादी थी और उनकी एक मित्र रूबी थी। हम लोग सुबह 6 बजे पडरौना से निकल कर 12 बजे गोपालगंज बिहार के पास पहुँचे थे उसी समय हम लोगो की कार खराब हो गयी हमारे मामा गोपालगंज बिहार से लाये मगर शा वह कार किसी तरह को गोपालगंज के अपने गैरेज में लाया मगर वह कार को पूरी तरह…

Continue

Added by Akhand Gahmari on July 20, 2014 at 4:17pm — 12 Comments

ग़ज़ल : ज्ञान थोड़ा बयान ज़्यादा है

बह्र : २१२२ १२१२ २२

आजकल ये रुझान ज़्यादा है

ज्ञान थोड़ा बयान ज़्यादा है

 

है मिलावट, फ़रेब, लूट यहाँ

धर्म कम है दुकान ज्यादा है

 

चोट दिल पर लगी, चलो, लेकिन

देश अब सावधान ज़्यादा है

 

दूध पानी से मिल गया जब से

झाग थोड़ा उफ़ान ज़्यादा है

 

पाँव भर ही ज़मीं मिली मुझको

पर मेरा आसमान ज़्यादा है

 

ये नई राजनीति है ‘सज्जन’

काम थोड़ा बखान ज़्यादा है

---------

(मौलिक एवं…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 20, 2014 at 3:35pm — 21 Comments

गंगा के फ़ूल (लघु कथा) // --शुभ्रांशु पाण्डेय

छपाक्… ! 

मन्नू ने गंगा में कूद कर यात्रियों के चढ़ाये नारियल और फूल छान लिये. 

“अरे ये क्या किया.. जाने देते.. ”, एक यात्री डपटता हुआ चिल्लाया, “..फ़िर किसी और को बेच दोगे.. साले पूजा की चीजें भी नहीं छोडते हैं ये..” 

“जब पूजा करना तो बोलना.. वर्ना सरकार ने अब गंगा को गंदा करने वालों को जेल भेजना शुरु कर दिया है..”, एक तिरछी मुस्कान के साथ मन्नू ने आँख…

Continue

Added by Shubhranshu Pandey on July 20, 2014 at 11:30am — 19 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
‘महिला उत्थान’ (लघु कथा )

‘महिला उत्थान’ मुद्दे पर संगोष्ठी से घर लौटते  ही कुमुद से उसके पति ने कहा... “अभी थोड़ी देर पहले ही दीपा आई थी मिठाई लेकर वो  बहुत अच्छे नम्बरों से पास हुई है  कंप्यूटर कोर्स तो उसका पूरा हो ही गया था,तुम्हारी प्रेरणा और  मार्ग दर्शन से कितना कुछ कर लिया इस लड़की ने हमारे घर में काम करते-करते....  अब सोचता हूँ अपने ऑफिस में एक वेकेंसी निकली है इसको रखवा दूँ “

 कुमुद कुछ सोच कर बोली”अजी इतनी भी क्या जल्दी, वैसे भी सोचो इतनी अच्छी काम वाली फिर कहाँ मिलेगी, फिर तो ये काम करेगी…

Continue

Added by rajesh kumari on July 20, 2014 at 11:00am — 28 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - अदावत भी हमी से, हमदमी भी ( गिरिराज भन्डारी )

1222     1222      122  ---  

कभी महसूस कर मेरी कमी भी

तेरी आँखों में हो थोड़ी नमी भी

 

नदी की धार सी पीड़ा बही, पर

किनारों के दिलों में क्या जमी भी ?

 

खुशी तो है उजालों की, मगर क्यों

कहीं बाक़ी दिखी है बरहमी* भी     ( खिन्नता )

 

उड़ाने आसमानी भी रखो पर

तुम्हे महसूस होती हो ज़मी भी

 

ये रिश्ता किस तरह का है बताओ ?

अदावत* भी हमी से, हमदमी भी       ( दुश्मनी )

 

उफ़क पे देख लाली है खुशी…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on July 20, 2014 at 10:39am — 22 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Jul 26
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Jul 24
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
Jul 21

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय अशोक भाईजी, वर्षा ऋतु, विशेषकर सावन मास, के नम क्षणों का रागात्मक वर्णन रोचक बन पड़ा है.…"
Jul 20
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुंदर चौपाइयों की रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
Jul 18
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Jul 14

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service