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बाल मज़दूरी -हमारी मज़बूरी .

”बचपन आज देखो किस कदर है खो रहा खुद को ,

उठे न बोझ खुद का भी उठाये रोड़ी ,सीमेंट को .”

........................................................................

”लोहा ,प्लास्टिक ,रद्दी आकर बेच लो हमको ,

हमारे देश के सपने कबाड़ी कहते हैं खुद को .”

.......................................................................

”खड़े हैं सुनते आवाज़ें ,कहें जो मालिक ले आएं ,

दुकानों पर इन्हीं हाथों ने थामा बढ़के ग्राहक को .”…

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Added by shalini kaushik on June 15, 2014 at 11:30pm — 3 Comments

बेटियाँ

पिता

गर बेटियाँ है  तुम्हारा  स्वाभिमान

फिर क्यों

समाज के  विद्रूपताओं से  भयभीत होकर

रोकते  हो  उसकी हर  उड़ान

बनाने क्यों नहीं देते  उसकी

स्वयं की साहसी  पहचान

असुरक्षा के  डर से

देना  चाहते  हो उसको

किसी का साथ

खर्च  कर लाखोँ  लाते हो

छान बिन कर एक जोड़ी  अदद हाथ

जो  बनेगा  तुम्हारी बेटी का आजीवन रक्षक

पर क्या  होता  है सही ये फैसला

हर बार

वक्त के साथ देख  बेटियों की  दुर्दशा

क्या…

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Added by MAHIMA SHREE on June 15, 2014 at 3:00pm — 8 Comments

वेदना -निग्रही

माँ
मान भरे ममता का आँचल
तो पिता
सर पर नीलाभ आसमान है
दोनों का स्नेह एक सामान है.
माँ
बच्चों के दर्द से बिलबिला जाती है
तो पिता की चिंता
दर्द की दवा बन जाती है.
माँ कोमलता से भरी है
तो पिता के परुष से
विपत्तियाँ भी डरी है.
बच्चों के लिए
दोनों का स्नेह ही
वेदना -निग्रही है.

डॉ.विजय प्रकाश शर्मा
(मौलिक और अप्रकाशित)

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 15, 2014 at 12:05pm — 10 Comments

जिंदगी तू भी अजीब है -- डॉo विजय शंकर

जिंदगी भी अजीब है

जब भी उदास होती है ,

बेहद पास होती है |

खुश होती है तो ,

हमीं से दूर होती है ||

खुश हो तो लापरवाह इतनी

कि खुद हमसे नहीं सम्हलती ,

उदास होती है तो हमें ही

नहीं संभाल पाती है ||

जिंदगी अपनी होते हुये भी

क्यों अंजानी सी लगती है

दूसरे की जिंदगी क्यों अच्छी ,

जानी पहचानी सी लगती है ||

साथ बैठें तेरे कभी आ

कुछ बात करें, तुझी से

आ जिंदगी तुझको

थोड़ा देंखें करीब से |

इक हम हैं जो जीते हैं

सिर्फ… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on June 15, 2014 at 11:57am — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मेरा ग़म लगता है हमसाया मुझे

2122/ 2122/ 212

मेरा ग़म लगता है हमसाया मुझे

जीने का फन ग़म ने सिखलाया मुझे

 

ये हवा मेरे मुताबिक तो नहीं

कौन तेरे शह्र में लाया मुझे

 

मुश्किलों में सिर्फ मेरी जाँ नहीं

खौफ़ में हर इक नज़र आया मुझे

 

हौसला, हिम्मत, दुआएँ, दोस्ती

तज़्रिबे ने बख़्शा सरमाया मुझे

 

धूप की शिद्दत बहुत थी राह में

माँ के आँचल से मिली छाया मुझे

 

कौन सा मैं रंग दूँ तुझको ग़ज़ल

ज़ीस्त के रंगों ने…

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Added by शिज्जु "शकूर" on June 15, 2014 at 8:00am — 6 Comments

खोने नही़ं देती

1222   1222  1222   1222



किसी की याद रातो मे हमें सोने नहीं देती

कसम उसने दिया था जो हमे रोने नहीं देती



चली थी साथ मेरे जो कभी इक हमसफर बन कर

न जाने पास अपने क्‍यों हमें होने नहीं देती



सिखाया था हमें जिसने जमाने में रहें कैसे

वही अब प्‍यार भी हमको वहाँ बोने नहीं देती



नहीं है प्‍यार मुझसे अब मगर नफरत जरा देखो

किसी को लाश भी मेरी वो अब ढोने नहीं देती



हमारे गीत में छुपकर हमेशा जो चली आती

बने आवाज दिल की वो हमें खोने…

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Added by Akhand Gahmari on June 15, 2014 at 1:30am — 5 Comments

छपास

जब से "छपास" का

रोग लगा है.

लिखना रुकता ही नहीं ,

कविता अतुकांत,

कहानी अनगढ़ी ,

बिना यात्रा किये

यात्रा वृतांत,

बिना मिले

विरह वर्णन,

बिना प्यार किये,

रोमांच का सच.

वृद्ध हाथों में

क्रांति की मशाल,

बिना सच जाने

चेतावनी!

क्या मजाल,

कि आप कुछ बोल दें.

जरा सा सच का पर्दा खोल दें

चैनलों पर रात-दिन देखिए,

 पूरे देश में,

"नपुंसक बवाल".

डॉ. विजय प्रकाश शर्मा

(मौलिक व् अप्रकाशित…

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Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 15, 2014 at 12:30am — 14 Comments

वफादारी (लघुकथा) रवि प्रभाकर

मालिक और महा प्रबंधक कंपनी में चल रही हड़ताल को लेकर कुछ गंभीर विचार विमर्श कर रहे थे कि अचानक कुछ आवारा कुत्ते बंगले के अंदर आ घुसे। साहिब का खूंखार पालतू कुत्ता बड़ी फुर्ती से उन आवारा कुत्तों पर झपटा और उन्हें दूर तक खदेड़ आया, तभी एक नौकर धीरे से मालिक के कान में आकर फुसफुसाया

“साहिब,  वो यूनीयन के दूसरी तरफ वाले लीडर आ गए है।”

मालिक के तनावग्रस्त चेहरे पर एकाएक कुटिल मुस्कुराहट आ गई, और उसने मांस का एक बड़ा सा टुकड़ा अपने वफादार कुत्ते के आगे फैंक दिया…

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Added by Ravi Prabhakar on June 14, 2014 at 11:59am — 14 Comments

एक लघु वार्ता --- डॉ ० विजय शंकर

प्रिय मित्रों ,

मैं इस सम्मानित मंच के माध्यम से आप सभी से कुछ बातें शेयर करना चाहता हूँ , आज लाइव महोत्सव का जो विषय है, ये बातें कहीं न कहीं उस से जुडी हुई हैं . थोड़ा देखें दुनिया में और लोगों का नज़रिया उन बातों पर जो हम सभी को घेरे रहती हैं . गत तीन-चार वर्षों से वर्ष में कुछ समय मेरा अमेरिका में रहना होता है , इस प्रवास में बहुत कुछ देखने को मिलता है। कुछ इत्मीनान से , कुछ सोच समझ के साथ। जैसे , स्वतंत्रता की देवी ( statue of liberty ) की मूर्ति वाले इस विशाल देश में लोग वास्तव में… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on June 14, 2014 at 10:44am — 18 Comments

कायर हैं वे लोग यहाँ , नारी को आँख दिखाते हैं

कायर हैं वे लोग यहाँ

नारी को आँख दिखाते हैं

कमतर कमजोर हैं वे नर भी

नारी को ढाल बनाते हैं

------------------------

कौरव रावण इतिहास बहुत से

अधम नीच नर बदला लेते

अपनी मूंछे ऊंची रखने को

नारी का बलि चढ़ा दिए

अंजाम सदा वे  धूल फांक

मुंह छिपा नरक में वास किये

मानव -दानव का फर्क मिटा

मानवता को बदनाम किये

नाली के कीड़े तुच्छ सदा

खुद को भी फांसी टांग लिए

नारी रोती है विलख आज

क्या पल थे ऐसे…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on June 13, 2014 at 7:00pm — 16 Comments

सबकी ऐसे गुजर गयी

सबकी ऐसे गुजर गयी

हिन्दू देखे ,मुस्लिम देखे इन्सां देख नहीं पाया
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे में आते जाते उम्र गयी

अपना अपना राग लिए सब अपने अपने घेरे में
हर इन्सां की एक कहानी सबकी ऐसे गुजर गयी

अपना हिस्सा पाने को ही सब घर में मशगूल दिखे
इक कोने में माँ दुबकी थी , जब मेरी बहाँ नजर गयी

दुनिया जब मेरी बदली तो बदले बदले यार दिखे
तेरी इकजैसी सच्ची सूरत, दिल में मेरे उतर गयी

मौलिक और अप्रकाशित

मदन मोहन सक्सेना

Added by Madan Mohan saxena on June 13, 2014 at 4:55pm — 7 Comments

ग़ज़ल

मफऊल फ़ायलात मुफ़ाईल फायलुन

आया था लुत्फ़ लेने नवाबों के शह्र में 

हैरतज़दा खड़ा हूँ नक़ाबों के शह्र में 

 

आलूदा है फज़ाए बहाराँ भी इस क़दर 

खुशबू नहीं नसीब गुलाबों के शह्र में 

 

तहज़ीबे कोहना और तमद्दुन नफासतें 

आया हूँ सीखने में नवाबों के शह्र में 

 

ऐसी हसीं वरक़ को यहाँ देखता है कौन 

हर सम्त जाहेलां है किताबों के शह्र में 

 

बेहोश होने का न गुमां हमको हो सका 

हर शख्स होश में है शराबों के…

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Added by Sushil Thakur on June 13, 2014 at 4:00pm — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल ( गिरिरज भंडारी ) --वही चाहतें हैं डरी- मरी

11212      11212       11212     11212 

कई बाग़ सूने हुये यहाँ , कई फूलों में हैं उदासियाँ

कई बेलों को यही फिक्र है , कि कहाँ गईं मेरी तितलियाँ

कभी दूरियाँ बनी कुर्बतें, कभी कुरबतें बनी दूरियाँ

ये दिलों के खेलों ने दी बहुत , हैं अजब गज़ब सी निशानियाँ

कभी आप याद न आ सके, कभी हम ही याद न कर सके

रहे शौक़ में हैं लिखे मिले , कई गम ज़दा सी रुबाइयाँ  

वो हक़ीक़तें बड़ी तल्ख़ थीं, चुभीं खार बनके इधर उधर

सुनो वो चुभन ही…

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Added by गिरिराज भंडारी on June 12, 2014 at 9:30pm — 32 Comments

डगर

वैसे तो मैं
हर डगर से पहुँच जाता हूँ
तेरे पास .
मगर यह
प्रेम डगर बहुत कठिन है.
तुम्ही आ जाओ न
ढलान से होकर.

डॉ. विजय प्रकाश शर्मा
(मौलिक व् अप्रकाशित )

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 12, 2014 at 8:00pm — 17 Comments

वह वृद्ध !! // अतुकांत कविता // अन्नपूर्णा बाजपेई

वह वृद्ध !!

कड़कती चिलचिलाती धूप मे

पानी की बूंद को तरसता

प्यास से विकल होंठो पर

बार बार जीभ फेरता

कदम दर कदम

बोझ सा जीवन, घसीटता

सर पर बंधे गमछे से

शरीर के स्वेद को

सुखाने की कोशिश भर करता 

अड़ियल स्वेद

बार बार मुंह चिढ़ाता

थक कर चूर हुआ

वह वृद्ध !!

कुछ छांव ढूँढता

आ बैठा किसी घर के दरवाजे पर

गृह स्वामी का कर्कश स्वर –

हट ! ए बुड्ढे !!

दरवाजे पर क्यों…

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Added by annapurna bajpai on June 12, 2014 at 7:22pm — 18 Comments

तुम आओगे न

वही रेत

वही घरोंदे

थपथपाते हाथ

सब कुछ वैसा

पर अब लगता

जीवन-सफर

सीलन भरा

शायद इसलिए ...

दिशाओं के पावडों पर

पग रख

समय रथ ने ,

द्रुत गति पकड़ी

और तुम दूर हो गए

पर ये कैसे कहूँ

जबकि हर पल हो पास

मेरी दुआओं में तुम

परछाईयों की तरह



बहुत खुश मैं ,कि

अचानक ...

मेरी पहचान बदलने लगी

कभी मुझसे तुम थे

आज तुम मेरी पहचान बने

यही…

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Added by Deepika Dwivedi on June 12, 2014 at 6:00pm — 11 Comments

न जाने कब चाँद निकलेगा

जब सूरज चला जाता है

अस्ताचल की ओट में

और चाँद नहीं निकलता है.

दिखती है उफक पर

पश्चिम दिशा की ओर

लाल लकीरें.

पूरब में काली आँखों वाला राक्षस

खोलता है मुंह

लेता है जोर की साँसे

चलती है तेज हवाएं.

लाल लकीरें डूब जाती हैं,

फिर सब हो जाता है प्रशांत.

मैं पाता हूँ स्वयं को

एक अंध विवर में

हो जाता हूँ विलीन

तम से एकाकार .

खो जाता है मेरा वजूद.

न जाने कब चाँद निकलेगा.

..नीरज कुमार नीर .

मौलिक एवं…

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Added by Neeraj Neer on June 12, 2014 at 5:10pm — 14 Comments

प्रश्न

प्रश्न यह अश्लील है, पैदा हुई क्यों लड़कियां ?

घर की दीवारें लाँघ कर बाहर गयी क्यों लड़कियां?

वो सांस्कृतिक कार्यक्रमों , में उम्र सीमा बांधते|

खोल कर उनके मुखौटे घर से क्यों भागी लड़कियां?

है किसी की बहन , किसी की बेटी लड़कियां

फिर क्यों चौराहों पर, घूरी जाती हैं लड़कियां ?

वक्त बदला है, वो जल्दी ही उतार फेकेंगी |

चूड़ियों की हथकड़ी और पायलों की बेड़ियाँ |

न जाने कितने रूपों में हैं प्यार लुटाती लड़कियां|

जिंदगी की धूप में , छाँव…

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Added by DIWAS MISHRA on June 12, 2014 at 2:30pm — 19 Comments

3 मुक्तक

3 -मुक्तक

1.

हर रंज़ पे .मुस्कुराता हूँ

तन्हा तुझे गुनगुनाता हूँ

किस रंग पे मैं यकीं करूँ

हर रंग से फ़रेब खाता हूँ

..................................

2.

हर तरफ बाज़ार नज़र आता है

हर रिश्ता लाचार नज़र आता है

अब गुल नहीं महकते बहारों में

हर शाख़ पर ख़ार नज़र आता है

.......................................................

3.

रास्ते बदल जाते हैं ...तूफाँ जब आते हैं

यादों के अब्र में ...अरमाँ पिघल जाते हैं

रुकते नहीं अश्क.…

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Added by Sushil Sarna on June 12, 2014 at 1:00pm — 18 Comments

मोह माया मत समझ संसार को - ग़ज़ल

2122    2122   212

*********************

तन  से  जादा  मन  जरूरी  प्यार को

मन  बिना  आये हो क्या व्यापार को

***

मुक्ति  का  पहला  कदम  है  यार ये

मोह  माया  मत  समझ  संसार को

***

इसमें   शामिल  और  जिम्मेदारियाँ

मत समझ मनमर्जियाँ अधिकार को

***

डूब कर  तम में  गहनतम भोर तक

तेज   करता   रौशनी  की   धार  को

***

तब कहीं  जाकर  उजाला  साँझ तक

बाँटता   है   सूर्य   इस   संसार …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 12, 2014 at 9:42am — 21 Comments

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