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जब से "छपास" का
रोग लगा है.
लिखना रुकता ही नहीं ,
कविता अतुकांत,
कहानी अनगढ़ी ,
बिना यात्रा किये
यात्रा वृतांत,
बिना मिले
विरह वर्णन,
बिना प्यार किये,
रोमांच का सच.
वृद्ध हाथों में
क्रांति की मशाल,
बिना सच जाने
चेतावनी!
क्या मजाल,
कि आप कुछ बोल दें.
जरा सा सच का पर्दा खोल दें
चैनलों पर रात-दिन देखिए,
 पूरे देश में,
"नपुंसक बवाल".

डॉ. विजय प्रकाश शर्मा
(मौलिक व् अप्रकाशित )

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Comment

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Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 5, 2014 at 12:26am

आ० सौरभ पाण्डेय जी,
रचना ने आपको रोमांचित किया और आपने सराहा .
बहुत- बहुत आभार सह अभिनन्दन.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 5, 2014 at 12:01am

क्या बात .. क्या बात ..  क्या बात !!

बधाई  आदरणीय विजय प्रकाशजी..

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 24, 2014 at 6:46pm

बहुत -बहुत आभार लक्ष्मण प्रसाद जी.स्नेहबनाए रखें.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 24, 2014 at 11:24am

छपास के रूप में यथार्थ अभिव्यक्ति हुई है श्री विजय प्रकाश जी | बधाई 

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 24, 2014 at 11:02am

० प्राची सिंह जी, आपके प्रोत्साहन का हमेशा इंतेजार रहता है.
आभारी हूँ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 23, 2014 at 6:01pm

छपास का रोग... या प्रस्तुतियों पर वाहवाही की बेतुक लालसा.... लेखन के पीछे के मकसद को असंयत करती या दरकिनार करती है 

आपका सदिश चिंतन सुन्दरता से प्रस्तुत हुआ है.

तहे दिल से बधाई स्वीकारिये इस प्रस्तुति पर आदरणीय विजय प्रकाश शर्मा जी 

सिर्फ एक आध जगह टंकण त्रुटि रह गयी है..उसे अवश्य ही सही कर लें

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 17, 2014 at 10:23pm

आपका बहुत आभार जवाहर लाल सिंह जी.

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 17, 2014 at 10:20pm

आपको रचना पसंद आई,आपका बहुत आभार डॉ. विजय शंकर जी.

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 17, 2014 at 9:09pm

सोलह आने बात सही है। ।बोले तो झकाश, प्रकाश, छपाश। ।देखें तो आकाश!  

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 17, 2014 at 9:03pm
हम हैं , हम कुछ हैं ,
हम बहुत कुछ हैं ,
यह अहसास कराना है ,
हम क्या हैं , क्यों हैं ,
ये तो हमने भी नहीं जाना है
बहत सुन्दर , बहुत सशक्त और सही पकड़ ,
बधाई ,
सादर.

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