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!!! प्याज मंहगे आ गए !!!

!!! प्याज मंहगे आ गए !!!

बह्र- 2122 2122 2122 212

पत्थरों के शहर में ये जीव कैसे आ गए।

लोभ है सत्ता से इनको होड़ करके आ गए।।1

श्वेत पोशाकों में सजते, खून से लथपथ सने।

रोज मरते सत से राही, कंस जब से आ गए।।2

धर्म बीथीं भी हिली है, भू कपाती हलचलें।

भाई से भाई लड़े हैं, जाति जनने आ गए।।3

नफरतों की आग फैली, द्वेष फलते पीढि़यां।

अम्न जिंदा जल रही है, घी गिराने आ गए।।4

वक्त ने हमको पढ़ाया,…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 18, 2013 at 7:32am — 26 Comments

ग़ज़ल - मैं था टूटा बिखरता रहा रात भर

ग़ज़ल –

 

गिरते गिरते संभलता रहा रात भर ,

मैं था टूटा बिखरता रहा रात भर |

 

उसके रुखसार का चाँद दामन में था ,

चांदनी में निखरता रहा रात भर |

 

मुझको मंजिल नहीं बस सफ़र चाहिए ,

दो कदम चल ठहरता रहा रात भर |

 

गो कि पलकें उठीं आईना हो गयीं ,

आईनों में संवरता रहा रात भर |

 

था हकीकत या सपना यही सोचकर ,

अपनी ऊँगली कुतरता रहा रात भर |

 

अर्श तक मैं चढ़ा उंगलियाँ थामकर…

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Added by Abhinav Arun on August 18, 2013 at 5:30am — 17 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
चंद शब्द ................डॉ० प्राची

फासलों की 

हर पर्त को चीरते 

चंद शब्द...

जिनका चेहरा,

कभी दिखाई ही नहीं देता..

आखिर देखूँ भी तो क्यों ?

लुका छिपी में उलझाते मुखौटे  !

जिनकी आवाज,

कभी सुनायी ही नहीं देती..

आखिर सुनूँ भी तो क्यों ?

कृत्रिमता में गुँथे बंधित अल्फाज़  !

जिनके अर्थ,

कभी बूझने नहीं होते..

आखिर बूझूँ भी तो क्यों ?

सिर्फ भ्रमित करते से दृश्य तात्पर्य !

जबकि,

हृदय गुहा…

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Added by Dr.Prachi Singh on August 18, 2013 at 12:00am — 39 Comments

फ़रियाद [ग़ज़ल ]

सहरा में कहीं खो जायें न हम, आवाज़ हमें देते रहना ।

नयी राहों का नयी मंजिल का, आगाज़ हमें देते रहना ।

माना कि उदासी के सायें कभी हमको घेर भी लेते हैं ,

खुश रहकर जीने का अपना, अन्दाज़ हमें देते रहना ।

जब गिरने लगे ये तनहा मन घनघोर निराशा के तल में,

ऐसे में अपनी उल्फत की, परवाज़ हमें देते रहना ।

भावों की लहर जब उठती है, शब्दों के शहर बह जाते हैं ,

वो प्यार सहेजने को अपने, अल्फ़ाज़ हमें देते रहना ।

जो दिल में हमारे रहती…

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Added by Neeraj Nishchal on August 18, 2013 at 12:00am — 12 Comments

ग़ज़ल : थका तो हूँ मगर हारा नहीं हूँ

बह्र : मुफाईलुन मुफाईलुन फऊलुन

--------------------

न ऐसे देख बेचारा नहीं हूँ

थका तो हूँ मगर हारा नहीं हूँ

 

है मुझमें रौशनी, गर्मी नहीं पर

मैं इक जुगनू हूँ अंगारा नहीं हूँ

 

यकीनन संगदिल भी काट दूँगा

तो क्या जो बूँद हूँ धारा नहीं हूँ

 

सभी को साथ लेकर क्यूँ मिटूँगा?

मैं शबनम हूँ कोई तारा नहीं हूँ

 

हवा भरना तुम्हारा बेअसर है

मैं इक रोटी हूँ गुब्बारा नहीं हूँ

 

मेरी हर बात…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 17, 2013 at 10:08pm — 35 Comments

सरेआम लें लूट, गिरी माँझा बिन गुड्डी--रविकर

मौलिक / अप्रकाशित

गुड्डी-गुड़ी गुमान में, ऊँची भरे उड़ान |
पेंच लड़ाने लग पड़ी, दुष्फल से अन्जान |


दुष्फल से अन्जान, जान जोखिम में डाली |
आये झँझावात, काट दे माँझा-माली |


लग्गी लेकर दौड़, लगाने लगे उजड्डी |
सरेआम लें लूट, गिरी माँझा बिन गुड्डी ||

Added by रविकर on August 17, 2013 at 2:43pm — 5 Comments

'ध्वज'

हो नहीं आक्रांत,

समर्पण भाव पर

सुर्ख आह्लाद की

जो छाप है,

भाव उन्नत उपजते

बुद्धि उर्वर,विवेक में

समृद्ध मनन का निवास है,

ना विकलता,

उर में यदि

धवल शान्ति का

प्रकाश विद्यमान है,

जीवन्तता

निरन्त चक्र सम

चैतन्यता

रग-रग मे तुम्हारे जो व्याप्त है,

तो समझ लो

हे आत्मन्!

ये तुम्हारा ही नहीं

राष्ट्र का उत्थान है।

स्व से उठकर

'पर' पर जो तुम्हारा राग है,

ध्वज तुम्ही हो,आन और...

राष्ट्र-गौरवगान… Continue

Added by Vindu Babu on August 17, 2013 at 9:27am — 17 Comments

प्यार में उनके जो हम [ग़ज़ल ]

प्यार में उनके जो हम सब लुटाने में रहे ।

फिर किसी काबिल नही हम ज़माने में रहे ।



दर्द को बदनाम करना अपनी फितरत में न था ,

तनहा रोये महफ़िलों में मुस्कराने में रहे ।



चोट देने का तरीका ना हमे आया कभी ,

हम हमेशा से ही आगे चोट खाने में रहे ।



पूछो ना मजबूरियों के क्या सितम हमने सहे ,

याद वो ही कर गये जो भुलाने में रहे ।



वो वफ़ा कसमें वो सारी और वादे प्यार के ,

तोड़ने में वो रहे और हम निभाने में रहे ।



ज़िन्दगी के दरमियाँ कुछ और… Continue

Added by Neeraj Nishchal on August 16, 2013 at 8:42pm — 11 Comments

मेरे दिल को न चैन आयेगा

मेरे दिल को न चैन आयेगा,

उम्र सारी मलाल आयेगा।



नूर मुझसे ख़फ़ा है तो फिर,

बस अँधेरा करीब आयेगा।



आसमाँ पर है सूरज अगर,

चाँद कैसे भला आयेगा।



बददुआयें वो देने लगे,

अब मुकद्दर क़हर ढायेगा।



हमनशीं बन गया एक फिर,

देखें कब तक निभा पायेगा।



मुझसे लेता रहा उल्फतें,

तोहमतें वो जो दे जायेगा।



अलविदा ज़िन्दगी को कहें,

जाके तब कुछ क़रार आयेगा।



वो जो सीने से लगते थे अब,

पीठ पर उनका वार… Continue

Added by इमरान खान on August 16, 2013 at 11:55am — 19 Comments

ख्वाबों की परिधि

ख्वाबों की परिधि मे

आलते का इकरार सुनाई देता है

मौन रहती उस मृगनयनी के

आँखों से झंकार सुनाई देता है

कोतूहल के इस कोहरे मे

कस्तुरी संस्कार सुनाई देता है

सम्बोधन के अरुनिम मे

रुनझुन करता गान सुनाई देता है

हृदय के स्निग्ध लबों से

तरुवर का व्याख्यान सुनाई देता है

कोकिला के कुहुक मे

सम्बन्धों मे आन सुनाई देता है

बच्चे की किलकारी मे

माँ के गर्वित मन का भान सुनाई देता है

शिक्षक के सहपाठी बनने मे

विस्तृत होता…

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Added by एल गुनेश्वर राव on August 16, 2013 at 11:17am — 10 Comments

आज़ादी

तिरंगे को लहराता देख

लगता है

हम आज़ाद हैं

 

आज़ादी सापेक्ष होती है

 

आज़ाद हैं अंग्रेजों से

 

जिंदगी तो अब भी वैसी ही है

वही साँसें

वही चीथड़े

वहीं चाँद

टूटता तारा

वही कुआँ खोदना

फटी जेबें

वही बिवाइयाँ।

 

कहाँ बदला कुछ

राजाओं के रंग बदल गये

भाषा वही है

 

सत्ता का चेहरा बदलता है

चरित्र नहीं

आजादी का मतलब

निरंकुशता की समाप्ति तो…

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Added by बृजेश नीरज on August 16, 2013 at 7:00am — 18 Comments

निरर्थक - (रवि प्रकाश)

मरियल गाय सी

आँगन में खड़ी धूप में,

पर-कुतरी चिड़िया की तरह

मुँह के बल लाचार हवा गिरती है,

आधी टूटी अगरबत्ती से सरकते

बेजान धुँए की लकीरों से

ज़बरदस्ती दबाए गए

बीड़ी और शराब के भभके,

बालिश्त भर के रसोईघर में

धुँए से झाँकती दो-चार लपटों पर

निहत्थे तवे की छाती से चिपकी

काली चौकोर रोटी,

पीतल की पुरानी हँडिया

टूटे नल से रिसते पानी को

सँजोने की नाकाम कोशिश में

अक्सर घबड़ा जाती है।

दीवारों की उभरी पसलियों पर

मुँह फुलाए… Continue

Added by Ravi Prakash on August 15, 2013 at 10:18pm — 7 Comments

ग़ज़ल / आज़ादी

अपनी इस ग़ज़ल के साथ सभी को स्वतंत्रता दिवस की बधाई देता हूँ

आये लौट आज़ादी आज अपनी जवानी में ।

के फहरा दो तिरंगा फिर हवाओं की रवानी में ।

उड़ा दो फिर वही बादल आसमाँ में गुलालों के ,

गुलाबी रंग मिल जाए आज फिर आसमानी में ।

हिमालय की पनाहों में शहीदों को सलामी दे ,

कोई तो गीत गूँजेगा आज गंगा के पानी में ।

बनायें उनके सपनों का चलो आज़ाद भारत हम ,

जिन्होंने ख्वाब देखा था ये अपनी जिंदगानी में ।

आँखों…

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Added by Neeraj Nishchal on August 15, 2013 at 2:00pm — 19 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गुमशुदा खुशियां कहां रहने लगी है आज छुप कर

गुमशुदा खुशियाँ कहाँ रहने लगी है आज छुप कर

***************************************

दर्द कैसे कम हुआ ये आंसुओं पूछ लेना

क्या अन्धेरों से डरे थे, तुम दियों से पूछ लेना

खुद जले थे,और कैसे, वो अन्धेरों से लडे थे

जानना चाहो अगर तो,जुगनुओं से पूछ लेना…

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Added by गिरिराज भंडारी on August 15, 2013 at 8:00am — 33 Comments

खनखनाता रुपैया मेरे देश का --

मेरे आजाद देश की  

बेहतरीन खिलाडी

बिना डोपिंग परिक्षण के, 

महंगाई हो गई है

दौड़ती है सबसे आगे

तेज धावक की तरह

मारती है सबसे ऊँची

छलांग

पहुंचना चाहती है

सबसे पहले  

बाहरवें आसमान|

और रुपया बेचारा

मुंह उतारे

लुढ़क रहा है नीचे नीचे

अपना ही बाजार सौतेला हो गया जिसके लिए

जैसे इस मंडी से नाराज  

वह मुंह छुपाना चाहता हो

प्रचलन से बाहर किसी तरह से

निकल आना चाहता हो

वह…

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Added by डॉ नूतन डिमरी गैरोला on August 15, 2013 at 6:00am — 13 Comments

कभी कभी मुझको लगता है जिन्दा जन आधार नहीं है

बार बार हमसे क्यों आकर उलझ उलझ कर

उलझ चुके कितने ही मुद्दे सुलझ सुलझ कर

ऐसे मुद्दे सुलझाने में वक्त करें क्यों जाया

अब तक सुलझा कर, बतला दो क्या पाया

उनको अपना स्वागत सत्कार समझ ना आया

किश्तवाड़ में हमें ईद त्यौहार समझ न आया

इतना सब कुछ हो जाने पर भारत चाहेगा मेल ?

शायद भारत को डर हो, कहीं रुक न जाये खेल। 

रत्ती का व्यापार नहीं है, चिंदी भर आकार नहीं है

भारत के उपकारों का उनको कुछ आभार नहीं है 

कभी कभी मुझको लगता है, भारत…

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Added by Aditya Kumar on August 14, 2013 at 9:46pm — 8 Comments

जन गण मन के अधिनायक

कौन हो तुम ?

जन गण मन के अधिनायक.

कहाँ रहते हो ?

मैं तुम्हारी जय कहना चाहता हूँ.

बरसों से हूँ मैं तुम्हारी खोज में,

तुम शून्य हो या हो सर्वव्यापी,

ईश्वर की तरह .

कौन हो तुम ?

तुम भारत भूमि तो नहीं ,

भारत तो माता है,

माता कभी अधिनायक तो नहीं होती .

तुम हो भारत भाग्य विधाता .

फिर बदला क्यों नहीं भारत का भाग्य.

भारत के भाग्य का ऐसा क्यों लिखा विधान.

कैसे विधाता हो ?

तुम्हारा स्वरुप तुम्हारी…

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Added by Neeraj Neer on August 14, 2013 at 9:11pm — 13 Comments

अनेकता में एकता --अपना भारत

अनेकता में एकता --अपना भारत

प्रिय दोस्तों और  ..मेरे नन्हे मुन्ने मित्रों आप सब को भ्रमर की तरफ से स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएं ...

 

मेरा भारत महान है , हम सब की शान है अपनी जान हैं  गौरव है यह एक  शब्द नहीं है अपितु हर भारतवासी  के दिल की धड़कन  है। ये अपनी पहचान है। हम इस पवित्र भूमि में पैदा हुए हैं। हमारे लिए यह उतना  ही  महत्त्वपूर्ण है जितना कि हमारे माता-पिता हम सब के लिए । भारत केवल  एक भू-भाग का नाम नहीं है बल्कि  यह हो इस  भू-भाग में बसे लोगों, उसकी…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 14, 2013 at 8:30pm — 6 Comments

भाई बहन के प्यार का प्रतीक है रक्षाबंधन ( लेख - कुछ अदृष्ट्य तथ्य )

मनुष्य स्वभावतः उत्सव प्रिय एवं प्रकृति प्रेमी है । ग्रीष्म ऋतु के अवसान के पश्चात जब आषाढ़ और सावन आकाश मे काले काले घुमड़ते बादल झमझमाती बारिश लेकर आते है तब शुष्क और तपती हुई धरा धीरे धीरे तृप्त होती जाती है । सावन का महीना लगते ही हरियाली हरियाली ही दिखाई देती है । इस ऋतु परिवर्तन पर प्रकृति की मन भावन सुषमा एवं सुंदर परिवेश को पाकर मानव मन आन्नादित हो उठता है और ऋतुओं के अनुसार पर्व एवं त्योहार भी आरंभ हो जाते है । सावन के महीने मे ही तीज , नागपंचमी और सावन का अंत श्रावणी पूर्णिमा यानि…

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Added by annapurna bajpai on August 14, 2013 at 7:30pm — 1 Comment

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