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निरर्थक - (रवि प्रकाश)

मरियल गाय सी
आँगन में खड़ी धूप में,
पर-कुतरी चिड़िया की तरह
मुँह के बल लाचार हवा गिरती है,
आधी टूटी अगरबत्ती से सरकते
बेजान धुँए की लकीरों से
ज़बरदस्ती दबाए गए
बीड़ी और शराब के भभके,
बालिश्त भर के रसोईघर में
धुँए से झाँकती दो-चार लपटों पर
निहत्थे तवे की छाती से चिपकी
काली चौकोर रोटी,
पीतल की पुरानी हँडिया
टूटे नल से रिसते पानी को
सँजोने की नाकाम कोशिश में
अक्सर घबड़ा जाती है।
दीवारों की उभरी पसलियों पर
मुँह फुलाए लटके चंद चिथड़े
जो पपड़ियों से गुत्थमगुत्था हो जाते हैं;
बरसाती पानी इसी भीत पर
जाने क्या-कुछ लिखता-मिटाता है।
मुन्ने का इकलौता झुनझुना
आखिरी पुर्ज़े तक बजता है,
मुन्नी की गुड़िया फटा रूमाल ओढ़ कर
रोज़ दुल्हन बनती है,
माँ किसी बल्ब सी
कभी धुँधली,कभी उजली,कभी ख़ामोश
मगर अपनी जगह पर क़ायम,
बाबा जो चेहरा ले कर घर से निकलते हैं
लौटते वक़्त इतना बदल जाता है
कि शिनाख़्त नहीं कर पाता कोई।
रुबीनिया की जड़ों सा
विषाद फैलता चला जाता है,
हर ढलती साँझ के साथ
अवसाद और अधिक गहराता है।
थिगलियों से बनी गुदड़ियाँ
दिन में कुर्सी और रात में बिस्तर हो जाती हैं,
चाँद का मौसम
लाता है रोशनी,
वरना कैरोसीन की पगलाई गन्ध
बावरी सी फिरती है
और नथुनों में जमती कालिख
ढिबरी को ज़्यादा देर जलने नहीं देती।
रात का बेतरतीब फैलाव,
उलझे सपने,सहमी सी कल्पनाएँ,
घुटती ख़ामोशी में
भाँय-भाँय करता सन्नाटा
भौंकते कुत्तों और चीखते घुग्घुओं
के साथ मिल कर
हर रात ख़तरनाक हो जाता है;
फिर भी सुबह की चहक-महक
ज़रा देर से आए तो अच्छा !
सूरज की आँख लग जाए तो अच्छा !
अँधेरा कुछ हल नहीं करता,
मगर उजाले की
कनखियों और कनबत्तियों से
कहीं अच्छा है।
इसी तरह इस घर में बरसों से
बेमतलब पैदा होते है बच्चे
रोटी की जुगत में
ढलती है जवानियाँ
और वक़्त से पहले ही
लील जाता है बुढ़ापा
सब निशानियाँ धड़कनों की
बस यूँ ही.....निरर्थक !!!

मौलिक एवं अप्रकाशित।

Views: 569

Comment

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Comment by Ravi Prakash on September 8, 2013 at 3:31pm
धन्यवाद जी !!!
Comment by rajveer singh chouhan on September 6, 2013 at 1:12pm

कविता नही जेसे हकीकत हो एक एक अल्फाज  एसा लगता है इसे पढ ही नही महसुस भी किया जा सक्त है मानो जिन्दगी पर ये हक़ीकत सर्प सी रेंग कर जिस्म से उतर गयी हो और उसकी सरसराहट अब भी महसुस होती हो । अतिसुन्दर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 25, 2013 at 11:53pm

इस निरर्थक की सार्थकता इसी में है कि इस प्रस्तुति को रचना न कह आजके घोर यथार्थ का सटीक शब्द-चित्र कहना अधिक पसंद करूँगा.

जिस समाज के पहलुओं का वर्णन है, वह मिला हुआ जीवन जीता नहीं, उसे ढोता है, जिसमें घर से लेकर समाज के अक्सर सभी अवयव अपने-अपने हिसाब से इस ढोने पर बोझ बढ़ाते जाते हैं.
एक-एक पंक्ति बिम्ब जीती है.


बहुत-बहुत बधाइयाँ और असीम शुभकामनाएँ.. .

Comment by Ravi Prakash on August 17, 2013 at 5:49pm
thanks
Comment by विजय मिश्र on August 17, 2013 at 12:40pm
अप्रतिम रचना , शब्दों के अद्भुत समायोजन और भाव तो भारत की विचलित आत्मा का दुःख ही है , कुम्भीपाक भोगते ८०% भारतीय परिवारों की आत्मकथा लिख दी आपने . प्रणाम रविजी ! आपको और आपकी इस रचना को भी .
Comment by Ravi Prakash on August 16, 2013 at 9:00pm
thanks Vinita Ji.
Comment by Vinita Shukla on August 16, 2013 at 11:24am

लाचार जिंदगियों की बेचारगी, अत्यंत प्रभावी रूप से उकेरी है- आपकी इस पोस्ट ने. बहुत बहुत बधाई.

कृपया ध्यान दे...

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