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रूप तुम्हारे -(रवि प्रकाश)

मंदिर-मंदिर सजने वाली,
अक्षत,चंदन-सज्जित थाली।
या तुम कोई दीपशिखा हो,
जिस पर जीवन-जोत लिखा हो।
पूजन कोई नमन पुकारे,
जाने कितने रूप तुम्हारे॥

रात का भीगा अश्रु-कण हो,
नव विहान की प्रथम किरण हो।
तपी दोपहर अलसाई सी,
सन्ध्या थोड़ी सकुचाई सी।
चन्द्रलेख हो पंख पसारे,
जाने कितने रूप तुम्हारे॥

फागुन की मादक बयार भी,
पावस की पहली फुहार भी।
कार्तिक की हल्की सी ठिठुरन,
पौष-माघ की ठण्डी सिहरन।
तुझमें खिलते मौसम सारे,
जाने कितने रूप तुम्हारे॥

यौवन की पहली अँगड़ाई,
याद भरी पहली तन्हाई।
सुबह-सुबह की मीठी झपकी,
गालों पर प्यारी सी थपकी।
बचपन के वो सपन दुलारे,
जाने कितने रूप तुम्हारे॥

पूनम या फिर अमानिशा हो,
दिग्दर्शक या स्वयं दिशा हो।
बाधाओं में पाथेय तुम्ही,
निस्सीम कभी परिमेय तुम्ही।
कभी छलावा,कभी सहारे,
जाने कितने रूप तुम्हारे॥

सुर,लय में कितना बहलाऊँ,
गीतों में कितना गा पाऊँ।
मन ही मन कितना साध सकूँ,
छंदों में कितना बाँध सकूँ।
सँवरे को अब कौन सँवारे,
जाने कितने रूप तुम्हारे॥

मौलिक व अप्रकाशित।

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Comment

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Comment by Ravi Prakash on September 30, 2013 at 4:41pm
सराहना तथा उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद॥
Comment by LOON KARAN CHHAJER on September 30, 2013 at 4:11pm

बहुत सुन्दर प्रस्तुति  

"कभी छलावा,कभी सहारे,
जाने कितने रूप तुम्हारे॥" . ….  बधाई 

Comment by Ravi Prakash on September 30, 2013 at 12:58pm
धन्यवाद नयना जी।
Comment by नयना(आरती)कानिटकर on September 29, 2013 at 9:41pm

सुन्दर अभिव्यक्ति 

बहुत बहुत बधाई आ० रवि प्रकाश जी 

Comment by Ravi Prakash on September 25, 2013 at 9:04am
धन्यवाद रमेश जी।
Comment by रमेश कुमार चौहान on September 21, 2013 at 11:23am

अति सुंदर बधाई बधाई

Comment by LOON KARAN CHHAJER on September 16, 2013 at 8:09pm

bahut sundar rachana

Comment by Ravi Prakash on September 15, 2013 at 12:01pm
Thanks a lot..
Comment by Pradeep Kumar Shukla on September 9, 2013 at 1:42pm

behad sundar rachna ..... bahut bahut badhai

Comment by बृजेश नीरज on September 7, 2013 at 11:31pm

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति! आपको हार्दिक बधाई!

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