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अन्वेषण - (रवि प्रकाश)

मंज़िल-मंज़िल ढूँढ़ा जिसको,रस्ते-रस्ते खोजा है;
मस्जिद-मस्जिद रोज़ पुकारा,मंदिर-मंदिर पूजा है।
कभी तलाशा महफ़िल-महफ़िल,परबत-परबत छाना है;
गलियों-गलियों खूब टटोला,नगरी-नगरी माना है।
गर्म सुनहले आतप में भी,खिलती नर्म बहारों में,
बहुतेरे हम भटक चुके हैं,सिकता भरे कछारों में।
सागर-सागर,नदिया-नदिया,कितने गोते खाए हैं;
अंतरिक्ष की सीमाओं का,अतिक्रमण कर आए हैं।
कुछ मझधारों ने भरमाया,कुछ लहरों ने धोया भी;
क्या-क्या पा जाने की धुन में,जाने क्या कुछ खोया भी।
मदिरा की मस्ती में जिसको,अधरों से टकराया था;
डगमग-डगमग उठते पग में,साथ खड़े ही पाया था।
लेकिन बेसुध घड़ियों में भी,प्राणों का विस्तार नहीं;
हर बहलावा एक छलावा,पीड़ा से निस्तार नहीं।
इसका आँचल,उसका दामन,कुछ भी काम नहीं आया;
रूपचन्द्र भी ढलते देखे,मलिन पड़ी कंचन-काया।
आँख मूँद कर करें भरोसा,किसको अपना मन दे दें;
किसको भेंट करें सुख-सपने,मदमाता यौवन दे दें।
प्रश्न यहाँ पर लाखों सच्चे,उत्तर लेकिन झूठे हैं;
सब कुछ पी जाने की इच्छा,प्याले लेकिन टूटे हैं।
संतापों के राजभवन में,पीड़ा ही बस रानी है;
दुख ही सबकी रामकथा है,खुशियाँ आनी-जानी हैं।
भँवर,लहर,माझी,पतवारें,मानो तो अपना मन है;
हँसी,उदासी,सावन,फागुन,अपने ही तो आँगन है।
अपने अंतरतम में आख़िर,जीवन का उपहार मिला;
जिसके पीछे बाहर भटके,धड़कन के ही द्वार मिला।

मौलिक व अप्रकाशित।

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Comment by Ravi Prakash on August 12, 2013 at 6:41am
मैं अनुगृहीत हूँ ।धन्यवाद।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 11, 2013 at 10:02pm

इस अन्वेषण का हेतु और प्राप्य अत्यंत तोषकारी है.  आपकी प्रगल्भता इस बात की साक्षी है, कि सटीक और सहज विन्यास क्या कमाल कर सकता है. आपकी प्रस्तुत रचना इसका सुन्दर उदाहरण है, भाई रविप्रकाश जी .

आपकी रचनाओं का इंतज़ार रहेगा, भाई.

शुभेच्छाएँ

Comment by Ravi Prakash on August 7, 2013 at 10:22pm
धन्यवाद।
Comment by Ravi Prakash on August 7, 2013 at 10:21pm
धन्यवाद।
Comment by Ravi Prakash on August 7, 2013 at 10:20pm
धन्यवाद।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on August 6, 2013 at 11:07pm

वाह !!!!! आदरणीय रवि जी, कलकल - छलछल प्रवाहमयी रचना ने मन को मोह लिया है. बहुत-बहुत बधाइयाँ....


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 6, 2013 at 9:29pm

रवि जी बहुत सुन्दर 

कविता का प्रवाह प्रशंसनीय है| कविता शीर्षक से पूरी तरह से जुडी हुई है और अपने कथ्य को जनमानस तक प्रेषण करने में सक्षम है| हार्दिक बधाई|

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 6, 2013 at 5:32pm

सुंदर व्  प्रभाव शाली रचना पर,हार्दिक बधाई ,आदरणीय रवि जी 

Comment by Shyam Narain Verma on August 6, 2013 at 5:23pm
भावनाओं से ओतप्रोत रचना पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें.... 
Comment by Aditya Kumar on August 6, 2013 at 2:57pm

ह्रदय स्पर्शी ! मार्मिक वर्णन ! बेहतरीन शब्द संयोजन
इतने सुन्दर लेखन के लिए आपको हार्दिक बधाई एवम सुभकामनाये

कृपया ध्यान दे...

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