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सर झुकाना नहीं आता

क्या करें, 

इतनी मुश्किलें हैं फिर भी

उसकी महफ़िल में जाकर मुझको

गिडगिडाना नहीं   भाता.....

 

वो जो चापलूसों से घिरे रहता है

वो जो नित नए रंग-रूप धरता है

वो जो सिर्फ हुक्म दिया करता है

वो जो यातनाएँ दे के हंसता है

मैंने चुन ली हैं सजा की राहें

क्योंकि मुझको हर इक चौखट पे

सर झुकाना नहीं आता...

 

उसके दरबार में रौनक रहती

उसके चारों तरफ सिपाही हैं

हर कोई उसकी इक नज़र का मुरीद

उसके नज़दीक…

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Added by anwar suhail on May 7, 2013 at 8:21pm — 7 Comments

क्या करें ,सरकार की मजबूरी है

कालाबाजारी ,भ्रष्टाचार , दरिंदगी ,व्यभिचार ,

बेशर्मी ,बेहूदगी ,बेचारगी ,बेरहमी ,बेहयाई ,

आतंकवाद ,जातिवाद ,भाई-भतीजावाद ,परिवारवाद ,

सब राजनीति में रास्ते हैं ,

पर क्या करें ,सरकार की मजबूरी है ,इन रास्तों से गुजरना पड़ता है .



हमें पता है पडौसी ,निर्दोष जनता में आतंक फैला रहा है ,…

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Added by Dr Dilip Mittal on May 7, 2013 at 6:39pm — 5 Comments

माँ का पल्लू

माँ का पल्लू



मेरा छोटा भाई हमेशा मेरी माँ का पल्लू थामे रहता .माँ जहाँ भी जाती वह पल्लू पकड़े साथ साथ चलता . कभी कभी तो माँ को जब बाथरूम जाना होता तो और मुश्किल में पड़ जाती. कभी माँ खीज कर कहती – छोड़ो पल्लू बेटा ! इतना अपशकुन क्यों करते हो ? अगर मैं मर गयी तो क्या करोगे ?

अबोध बालक तो कुछ नहीं समझ पाया कि मृत्यु क्या…

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Added by coontee mukerji on May 7, 2013 at 6:00pm — 9 Comments

माँ ... श्रध्दांजलि !

माँ ... श्रध्दांजलि !

(पावन माँ दिवस पर)

मैं प्राण-स्वपन तुम्हारा, तुमने सर्जन किया था मेरा,

कभी मैंने जन्म लिया था तुम्हारे पावन-अंदर,…

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Added by vijay nikore on May 7, 2013 at 3:30pm — 26 Comments

ग़ज़ल - शिवाजी भी यहीं के हैं, नहीं क्यों याद आता है

बहरे हज़ज़ मुसम्मन सालिम

मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन

1222 1222 1222 1222

..............................................................

हुआ पैदा जो अंधा वो खड़ा राहें दिखाता है।

फटी आवाजवाला रोज अब गाने सुनाता…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on May 7, 2013 at 1:11pm — 23 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मशीनी मानव !!

बस पांच मिनट का पड़ाव  

उस स्टेशन पर 
देख रही हूँ उस पार किस तरह 
वो  उस हथौड़े को 
अपने सर के ऊपर तक ले जाकर 
खटाक से वार कर रहा है
 उस लोहे पर जिसको 
चूड़ियों से भरे दो हाथ 
थाम रहे हैं दोनों और से 
कितना आत्म विशवास है 
उन दोनों को अपने उन हाथों पर 
लोहा इच्छित आकार 
लेता जा रहा है धीरे-धीरे
सोच रही…
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Added by rajesh kumari on May 7, 2013 at 11:58am — 18 Comments

जीवन में जिन्दगी का माँ एहसास हो तुम .........

तपती धुप धूप में

छाँव हो तुम

मेरे लिए

बहुत खास हो तुम

तुम्हारे एहसास भर से

दूर हो जाती है हैं मेरी…

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Added by Sonam Saini on May 7, 2013 at 11:00am — 22 Comments

दिल से दिल के बीच जब नज़दीकियाँ आने लगीं

तमाम विसंगतियों के विरोध में एक ताज़ा ग़ज़ल .....



दिल से दिल के बीच जब नज़दीकियाँ आने लगीं 

फैसले को ‘खाप’ की कुछ पगड़ियाँ आने लगीं 



किसको फुर्सत है भला, वो ख़्वाब देखे चाँद का

अब सभी के ख़्वाब में जब रोटियाँ आने लगीं



आरियाँ…

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Added by वीनस केसरी on May 6, 2013 at 9:30pm — 52 Comments

॥ मेरा साथ निभाना तुम ॥ (श्रंगार रस का पहला प्रयास )

 

॥ मेरा साथ निभाना तुम ॥

मै बसंत हूँ , मेरी बहार बन जाना तुम ।

मै सूरज बनूँ तुम्हारा, मेरी किरण बन जाना तुम । …

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Added by बसंत नेमा on May 6, 2013 at 12:30pm — 9 Comments

माँ

मई महीने के दूसरे रविवार को 

"मातृ दिवस" …

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Added by यशोदा दिग्विजय अग्रवाल on May 6, 2013 at 11:00am — 13 Comments

सांप नाथ -नाग नाथ उवाच //कुशवाहा //

सांप नाथ -नाग नाथ उवाच 

---------------------------------

सुनो सांप नाथ जी 

कहो  नागनाथ जी 

बिजली आती है 

हाँ जी आती है 

कैसे आती है 

खून बहे रक्त नली में 

तारे टिमके जैसे जमी पर  

प्रेमियों को भाती है

बिजली आती है 

हाँ जी आती है 

सुनो सांप नाथ जी 

कहो  नागनाथ जी

--------------------

न आये तो क्या हो  करते

रात गुजर  कैसे  करते

जनता त्राहि त्राहि करती 

खेती किसानी करते…

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 6, 2013 at 10:04am — 14 Comments

नर-नारी संवाद



कहता है नर सदियों से

‘’ हे नारी !

पड़े सागर तल में

सीप में जो मोती द्वय

या ‌‌– तुम्हारे दो नयन हैं ! .

तुम रूपजाल हो या –

तुम्हारे अंग – अंग में

प्रकृति अटकी हुई है .’’

नारी कहती है

हे नर !

‘’ मैं ही अक्ष हूँ .

मैं ही आँसू

मोती भी

और सीप भी हूँ -

तुम्हारे लिये ही

मैं रोती हूँ, हँसती हूँ,

सजती हूँ, गाती हूँ

समझो न मुझे तुम रूपजाल

मैं प्रकृति की छाया हूँ

मही मेरी जननी है ‘’

( नर-नारी…

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Added by coontee mukerji on May 6, 2013 at 10:00am — 8 Comments

!!! मेरे घर आई एक नन्हीं परी !!!

!!! मेरे घर आई एक नन्हीं परी !!!


(आ0 गनेशजी सर जी को सादर शुभकामनाओ सहित समर्पित।)


चतुर्दश चन्द्र रूप सुखं। दिव्य तेज मुखारविदं।।
कर क्रीडति किन किन धुनं। किलकत मंद मंद हॅसं।।
सुख पाय तके छवि बलं। रवि रश्मि रति सरस मनं।।
जय हो श्री गनेशजी शुभं। जय हो श्री गनेशजी शुभं।।


के0पी0सत्यमध् मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 6, 2013 at 9:15am — 4 Comments

जिंदगी यूं ही सिखाती रहती है

जिंदगी के सफर में हजारों- लाखों मुसाफिर मिलते है. इन मुसाफिरों में ही आपके दोस्त छिपे होते है. इनमें से जिनकी बातें आपको प्रभावित करती है या आपकी बातें जिनको प्रभावित करती है, वह आपके दोस्त बन जाते है. बाकी फिर वैसे ही छूट जाते है अजनबियों की तरह. यहां पर गौर करने की बात है कि आपके दोस्त भले ही अजनबियों की तरह हजारों-लाखों की भीड़ में छिपे होते है, पर आपका दुश्मन आपके दोस्तों में ही छिपा हुआ होता है. बस जरूरत होती है उसको पहचानने की. अनजाने लोग आपके दोस्त तो हो सकते है, पर आपके दुश्मन नहीं.…

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Added by Harish Bhatt on May 5, 2013 at 8:44pm — 9 Comments

भूल जाऊंगी तुझे.....

एक बीते वक़्त सा

कुछ भूल जाना अच्छा होगा

जिसके दामन में दुःख के सिवा

मन को भिगोते

गलतफहमियो के घने बादल,

शिकायतों की बिजलियां

गरजते - गडगडाते काले

शक के भरे बरसने को

बेकाबू सवालों के मेघ

और कुछ डरावनी रातें होंगी;

भूल जाना कुछ कड़वे शब्द

उनकी तपिश आँखों को

और कभी जो दिल को

जलाती रही ओस से भीगी,

ठंडी रातों में भी और

दर्द देती रही मेरे शांत पड़े

कानो को जो अकसर,

दर्द से कराह…

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Added by Priyanka singh on May 5, 2013 at 5:23pm — 27 Comments

!!! प्यारी बेटी !!!

!!! प्यारी बेटी !!!



बेटी, सुनहरी धूप सी.....!

बेटी, नीम की छांव सी....!

बेटी, धन सी कामना...!

बेटी, कुल को तारना....!

बेटी, जीवन की आदि.अन्त....!

बेटी, मंदिर की साधु-संत....!

बेटी, गृहस्थ की पहली कड़ी.....!

बेटी, आनन्द की बेल चढ़ी......!

बेटी, दो कुटुम्ब की आधार-शान....!

बेटी, मधु-अमृत और सम्मान......!

बेटी सुख-दुःख की छाया.....!

बेटी, श्रृंगार की पेटी-माया...!

बेटी, सतरंगी इन्द्रधनुष...!

बेटी, सास की साजिश......!

बेटी,…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 5, 2013 at 2:13pm — 14 Comments

पारिवारिक सौहार्द

मानव समाज में पारिवारिक इकाई के अंतर्गत बच्चे युवा एवं बुजुर्ग तीन पीढ़ियों के लोग आते हैं। इन तीनों पीढ़ियों में आयु के अंतर के कारण सोंच में भी अंतर होता है। अक्सर सोंच  का यह अंतर आपसी टकराव का कारण बन जाता है।

सोंच में अंतर स्वाभाविक है। हर समय का…

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Added by ASHISH KUMAAR TRIVEDI on May 5, 2013 at 11:00am — 11 Comments

चार क्षणिकाएँ

क्षणिका : नीम चढ़ा करेला

 

नीम चढ़ा करेला

सेहत के लिए सबसे अच्छा होता है

लेकिन चर्बी को सेहत मानने वाले समाज में

ये कहीं नहीं बिकता

 

क्षणिका : हवा की तरह

 

मुझसे प्रेम करो हवा की तरह

ताकि तुम्हारा हर एक अणु

मेरे जिस्म के हर बिन्दु से टकराये

और तुमसे दूर होते ही

मेरी नसों में बह रहा लहू

मुझे फाड़कर रख दे

 

क्षणिका : विकास

 

चिकित्सा कम कर देती है…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 5, 2013 at 9:06am — 8 Comments

कौन कहे क्या..... हास्य

प्रथम प्रयास .....वीर छंद

----

सास बहू से कहे प्रेम से देर भयी सो जाओ 'प्लीज़'

बहू सास से यह कहती है फौरन लाओ आँटा पीस

रणभूमी मे कागा कहता बोटी आज मिली बखशीस

बोटी कहती बच गये शत्रू बस इतनी है मन मे कीस



चोर कहे किसका मुहँ देखा खाली बटुआ लिया चुराय

मूँछ ऐंठ कर कहे सिपाही चुपके हफ्ता दो सरकाय

नेता कहता कसम आपकी सब डारेंगे काम बनाय

वोटर कहता क्षमा कीजिये बहकावे मे आँवै नाय

चापलूस अतिथी ये कहता बच्चे कितने हैं मासूम

गुनगुन…

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Added by manoj shukla on May 5, 2013 at 6:30am — 12 Comments

वीर छन्द,,,(आल्हा छन्द)

वीर छन्द,,,(आल्हा छन्द)

=========================

 

सदा न यॊद्धा रण मॆं जीतॆ, रहॆं न सदा हाँथ हथियार ।

जीना मरना वहीं पड़ॆगा,जिसका जहां लिखा करतार ॥

कई साल तक रहा ज़ॆल मॆं, बाँका सरबजीत सरदार ।

उसॆ छुड़ा ना पायॆ अब तक,सॊतॆ रह गयॆ पाँव पसार ॥

हाय  हमारॆ  मौनी  बाबा, करतॆ  रहॆ  नॆह- सत्कार ।

लूटा खाया इस भारत कॊ,गूँगी …

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on May 5, 2013 at 5:00am — 28 Comments

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