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"मत्तगयंद सवैया"(प्रयास )

पीर उठे नहि कष्ट घटे अरु, लागत रात बड़ी अधियारी !

आँखिन आँसु सुखाइ गया अरु, सेज जले जइसे अगियारी !!

आपन रूप बिगाड़ फिरे वह, ताकत राह खड़ी दुखियारी !

लोग कहे पगलाय गयी यह, लागत हो जइसे विधवारी!!

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"

मौलिक /अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on March 17, 2013 at 12:00pm — 6 Comments

गंगा माँ

हिम शिखर से तू आती हो

गंगा सागर तक जाती हो

सारी नदियाँ तुमसे मिलकर

गंगा बन आगे बढ़ती है

                 गंगा तू सुखदायिनी

स्वर्गलोक से पाप हरने

धरती पर तू सतत बहने

सगर पुत्रों को मोक्ष देने

शिव जटा  से आयी हो

               गंगा तू मोक्ष दायिनी

जड़ी बूटी तू साथ लिए

कल -कल छल -छल बहती हो

जाति -धर्म का भेद न जाने

तत्पर पल -पल रहती हो

               गंगा तू आनंद दायिनी

दूर करो माँ कटुता पशुता

भर आयी जो जन -जन में…

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Added by shubhra sharma on March 17, 2013 at 9:48am — 2 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मैं और तुम

तुम्हारे उपवन के उपेक्षित कोने में

एक नन्हा सा घरौंदा है,

जहाँ मैं और मेरी तन्हाई

साथ-साथ रहते हैं –

क्या तुमने कभी देखा है ?

 

यहाँ तुम्हारे आंचल की सरसराहट

सुनाई नहीं देती,

तुम्हारी खुशी की खिलखिलाहट भी

मंद पड़ जाती है –

पर,

तुम्हारे गजरे का सुबास

स्वयम यहाँ आता है,

हर सुबह एक कोयल

कोई नया राग गाती है ;

हमने ओस की बूंदों को

पलकों का सेज दिया है –

क्या तुमने कभी जाना है…

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Added by sharadindu mukerji on March 17, 2013 at 2:43am — 3 Comments

कैसे चले जांगर

थका तन

थका मन

कैसे चले जांगर

क्या जा पाएंगे घर ?

 

हुक्म देने वाले 

ठाने बैठे हैं जिद

एक काम होता नही खत्म

कि दूजे का हुक्म मिल जाता..

 

पंछी भी लौट आते

घर अपने

नियत समय पर

लेकिन हम पंछी नहीं

 

सूरज भी छिप जाता

क्षितिज पार

नियत समय पर

लेकिन हम सूरज नही

 

तो क्या हम समंदर की लहरें हैं

जो दिन-रात अनथक

आ-आकर टकराती रहतीं किनारों पर

और…

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Added by anwar suhail on March 16, 2013 at 9:00pm — No Comments

नापाक, पाक

नापाक, पाक

हे निर्लज्ज निकर्ष्ठ पडोसी

तुझे कोटि कोटि धिक्कार है

पीठ पर बार करते हो  

यही तुम्हारी हार है

हम सदभावी शांतिदूत

तुम हमें कमजोर आंकते हो

कायर बन चोर की मानद…

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Added by Dr.Ajay Khare on March 16, 2013 at 1:30pm — No Comments

"फूल हो क्या तुम" ????

"फूल हो क्या तुम" ????

तुमसे खूबसूरत कौन होगा

क्या नाज़ुकी है

क्या तराश है

इस दुनिया मैं कोई नही

दूजा तुमसा

भँवरे तुम्हे यूँ भरमाते हैं

और तुम

इठलाने लगती हो

फूल हो क्या तुम ??

पता है

एक कोना होता है

जिस्म में

छोटा सा

जो हम सब को

सच ही बताता है

सच ही दिखाता है

रूको रूको

यूँ मत मुस्कुराओ

तुम जो सोच रही हो न !

दिल नहीं है

वो है दिमाग

जो काम नहीं करता

हाई टेक झूठ…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on March 16, 2013 at 12:29pm — 4 Comments

सुसाइड-नोट

माँ -

बहुत कोशिश की मैंने ,

इन आँसुओं को पीने की,

कुछ और,दिन जीने की।

इस अँधेरे , घर में,

जहाँ मेरा कुछ भी नहीं,

जहाँ मैं अभिशाप हूँ।

तुम्हारा कोई, पाप हूँ।

मगर मैं, अस्तित्वहीन ,

वेदना और दुख से क्षीण ,

आज भी, चुप-चाप हूँ।



यह मांग का सिंदूर,

जो सौभाग्य की निशानी है।

कैद मेरी आत्मा की,

अनकही, कहानी है।

जो कभी दुष्चक्र से,

निकल नहीं सकती।

मजबूर,अपने भाग्य को,

वह बदल नहीं सकती।

हर सुबह,जिसके…

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Added by Kundan Kumar Singh on March 16, 2013 at 12:00pm — 7 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
तोटकाष्टकम् - दुर्मिल वृत छंद का समूह-गायन

सुधीजनो, 

तोटकाचार्य आदिशंकर के प्रथम चार शिष्यों में से थे.  ’आचार्यदेवोभव’ सूत्र के प्रति अगाध भक्ति के माध्यम से समस्त ज्ञान प्राप्त कर आप आदिशंकर के अत्यंत प्रिय हो गये. आगे, आदिशंकर ने बद्रीनाथधाम की स्थापना कर आपको वहीं नियुक्त किया था. 

तोटकाचार्य विरचित तोटकाष्टकम्   --इसे श्रीशंकरदेशिकाष्टकम् भी कहते हैं--   दुर्मिल वृत्त में है. 

तोटकाष्टकम् का आधुनिक वाद्यों के साथ समूह-गान प्रस्तुत…

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Added by Saurabh Pandey on March 16, 2013 at 11:30am — 12 Comments

एक मुक्कमल इन्सां .......

एक मुक्कमल इन्सां .......]

ता उम्र टुकड़ों मे बंटता रहा

क्या मैं पूरा हूँ पूछ पूछ

आईने से लड़ता रहा

एक दिन वो भी सच बोल गया

गिर कर टुकड़ों मे बिखर गया

शांत झील मे पत्थर उछाल…

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Added by pawan amba on March 16, 2013 at 10:00am — 1 Comment

जिंदगी {भाग-१}

मैं जिंदगी हूँ ,मेरा वजूद बहुत हसींन और सौम्य हैं | ताजे खूबसूरत खिलते गुलाब या मुस्कुराते/खिलखिलाते बच्चे सा खूबसूरत मेरा अस्तित्व हैं |वैसे तो मैं दुनिया के हर प्राणी में हूँ ,पर मैं खुद को इस पृथ्वी के सबसे खतरनाक जानवर ....इंसान के माध्यम से खुद को यहाँ व्यक्त कर रही हूँ |ज्यादातर इंसान मुझे ऑटोपायलट मोड पर रखते हैं ,उनकी जिन्दंगी में अगली क्या…

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Added by ajay yadav on March 15, 2013 at 11:30pm — No Comments

ग़ज़ल "खार दामन में रक्खे है गुलाब क्या कहिये"

 

इक ग़ज़ल पेशेखिदमत है

 

 

ये ज़माना अजल से है खराब क्या कहिये

खार दामन में रक्खे है गुलाब क्या कहिये

 

चंद खुशियाँ मिली थी इश्क में हमें लेकिन   

दर्द दिल को मिला है बेहिसाब क्या कहिये 

 

आब की जद में जब रहा वजूद कायम था

आ के बाहर खुदी मिटे हुबाब क्या कहिये

 

गर्दिशों से निकल के रौशनी में आते ही

टूट जाते हैं मेरे सारे ख्वाब क्या कहिये

 

बाद पीने के किसको होश क्या कहे न कहे

बोल…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on March 15, 2013 at 10:34pm — 5 Comments

छन्द : दुर्मिल सवैया

घन घोर घटा जब से बरसो, वन मोर नचावहिं मोर जिया।

बिहॅसे हरषे तन सींच गयो, जगती तल शीतल मो रसिया।।

बिजली घन बीच हॅसी गरजी, छल छन्द कियो बन गाज गिरी।

हिय जार गयी विष सौतन सी, मन त्रास घनी प्रिय नाथ नही।।1

बरखा बरखै असुआॅ टपकै, जिय शूल धंसे तन आग लगै।।

जर जाइ समूल न आश बंधे, कब आव पिया अब चात कहै।।

जर राख बनी उड़ जाइ चली, पिउ राह बिछी यहु चाह भली।

जहॅ पावॅ धरें हम धन्य लगी, पग धूलि बनी सिर मॅाग भरी।।2

कहॅु नीति कुनीति सुनीति नही, पर…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 15, 2013 at 9:00pm — 6 Comments

पिघलता क्षण



जब ढल जाती है रात

कृष्ण-पक्ष की काली गह्वर सी अकेली,

एक सितारा टिमटिमाता हुआ

उलटा लटका सा नज़र आता है.

शय्या पर बैठी उनींदी,

एक सांस खींचती गहरी सी,

खोलती हूँ जब आँखें पूरी

दूर कहीं निगाह भटक जाती है.

निःस्तब्ध रात्रि और मेरा अकेलापन

अपने विचारों को समेटती,

अनगिनत नक्षत्रों को गिनती

रहती हूँ शून्य में खोई सी.

दूर कहीं बादल भटकते,

कुछ यादें शूल से चुभते,

बाग में पत्रहीन वृक्ष भीड़ में…

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Added by coontee mukerji on March 15, 2013 at 8:41pm — 4 Comments

ग़ज़ल - एक मुसलसल जंग सी जारी रहती है

एक मुसलसल जंग सी जारी रहती है --

जाने कैसी मारा मारी रहती है --

 

एक ही दफ़्तर हैं, दोनों की शिफ्ट अलग

सूरज ढलते चाँद की बारी रहती है --

 

भाग नहीं सकते हम यूँ आसानी से

घर के बड़ों पर…

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Added by विवेक मिश्र on March 15, 2013 at 8:00pm — 22 Comments

पश्चिमी राजस्थान में मीठे पानी का स्रोत- जोहङ

(मौलिक व अप्रकाशित)



राजस्थान में जोहङों और कुओं का अपना महत्त्व है। राजस्थान में ही क्यों, पूरे भारतवर्ष में जोहङ मिल जाएँगे और उनकी स्थानिय उपयोगिता भी मिल जाएगी। हाँ नाम आपको अलग अलग मिलेंगे। कहीं ये जोहङ, गिन्नाणी, ताल, तलैया के नाम से जाने जाते हैं तो कहीं इनको डैम, धरण, डेर कहा जाता है।

जोहङों का सबसे ज्यादा महत्त्व राजस्थान में है जहाँ सबसे कम वर्षा होती है और पीने का पानी बहुत कम मात्रा में पाया जाता है। इसलिए बरसाती पानी को एकत्र कर पीने के काम मेँ लाने के लिए गाँव के… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 15, 2013 at 6:45pm — 6 Comments

चलिये शाश्वत गंगा की खोज करें (3)

चलिये शाश्वत गंगा की खोज करें में सब अतिथि  blogers का स्वागत है. आप के पर्संसात्मक comments का धन्यवाद यह एक लम्बी काव्या कथा है कृपया बने रहें. कोशिश करूंगा आप को निराश न करूं. यदि रचना बोर करने लगे तो कह देना. 

Dr. Swaran J. Omcawr

चलिये शाश्वत गंगा की खोज करें (3)

गंगा कहती रहीं- ज्ञानि सुनता रहा

‘तुम इतना ताम-झाम करते हो!



इतनी…

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Added by Dr. Swaran J. Omcawr on March 15, 2013 at 3:00pm — 10 Comments

तात मान एक बात (मनहरण घनाक्षरी)

देश में विदेश के सलाहकार सेनदार,
प्रीति में अनीति रीति, भूल के न लाइये।
नीतिवान बुद्धिमान, राजकाज जानकार,
नेक राज एक बार, देश में बनाइये॥
जाति-पांति भेद-भाव, ऊँच-नीच के दुराव,
हैं समाज कोढ़-घाव, दूर छोड़ आइये।
देवियाँ करें पुकार, तात मान एक बात,
लाज आज नारियों कि, देश में बचाइये॥

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 15, 2013 at 2:41pm — 5 Comments

धप्पा

जब भी मै गयी 

स्टोर में
या अटारी में
या खेत के गोदाम में

उठाने पुरानी यादें
जहाँ कोई नही जाता
मेरे तुम्हारे सिवा
एकदम से तुम आ गये
धीरे से ..और 
जोर से डरा दिया मुझे
धप्पा!!

           - 'वेदिका'

Added by वेदिका on March 15, 2013 at 11:30am — 6 Comments

सत्य सनातन व्याकुल होकर देख रहा अपने उपवन को

सुप्रभात मित्रों , आप सभी के अवलोकन हेतु सत्य सनातन पर लिखी अपनी कुछ पंक्तियाँ | सादर



सत्य सनातन व्याकुल होकर देख रहा अपने उपवन को

खर -पतवार सरीखे मजहब खा जायेंगे सुन्दर वन को ||

मैंने ही सारी वशुधा को एक कुटुंब पुकारा था

मेरी ही साँसों से निकला शांति पाठ का नारा था ||

दया धर्म मानवता जैसी सरल रीत मैंने सिखलाई

परहित धर्म आचरण शिक्षा मैंने ही सबको बतलाई ||

क्या हालत कर दी हे मानव भूल गया क्यूँ अंतर्मन को

खर -पतवार सरीखे मजहब खा जायेंगे सुन्दर…

Continue

Added by Manoj Nautiyal on March 15, 2013 at 9:15am — 3 Comments

दोहा

(आदरणीया डा0 प्राची सिहं जी के सुझाव के बाद पुनः प्रस्तुत)



भ्रष्टाचार जड़ विकट, माया मन परतोष।

कहे सुने बढ़ जात है, अहम काम मद दोष।।1



पंडित वेद कुरान पाठ, करि सब भये मसान।

नेता भ्रष्ट भय आतंक, सब बनगै श्रीमान।।2



भ्रष्टाचार बन जग गुरु, लूटें देश समूल ।

रामदेव अन्ना लड़े , लिये हाथ मा तूल।।3



जनता निरी गाय-भैंस, लठैत है सरकार।

दूध दुहन को वोट है, फिर पीछे मक्कार।।4



नेता सब ज्रागत भये, सोवत सन्सद बीच ।

जनता…

Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 15, 2013 at 6:30am — 5 Comments

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