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जब भी मै गयी 

स्टोर में
या अटारी में
या खेत के गोदाम में

उठाने पुरानी यादें
जहाँ कोई नही जाता
मेरे तुम्हारे सिवा
एकदम से तुम आ गये
धीरे से ..और 
जोर से डरा दिया मुझे
धप्पा!!

           - 'वेदिका'

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Comment by वेदिका on March 18, 2013 at 2:09pm

आदरणीय आशीष नैथानी 'सलिल' जी, आदरणीय विजय निकोर जी! आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी! आपका आभार करती हूँ की आपको भाव पसंद आये ....वरना मै तो बहुत हिचकिचा रही थी रचना को लेकर .....!
बहुत बहुत धन्यवाद! सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 16, 2013 at 11:14pm

वेदिकाजी, आपकी इस क्षणिका ने हृदय में चुपचाप पड़ी यादों को कुरेद कर मानों जगा दिया.  भाव-शब्दों की सरलता और कोमलता के रोमिल स्पर्श से शरीर बार-बार झंकृत हो रहा है. हार्दिक बधाई..

Comment by vijay nikore on March 16, 2013 at 10:40pm

वेदिका जी:

मुझको मार्मिक भाव प्रिय हैं ... कविता अच्छी लगी।

विजय निकोर

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on March 15, 2013 at 11:23pm

धप्पा.... सुन्दर क्षणिका !!!
बचपन के कुछ दिन ताजा हो गये|  :)

Comment by वेदिका on March 15, 2013 at 7:50pm

आभार बृजेश कुमार नीरज जी!

Comment by बृजेश नीरज on March 15, 2013 at 7:38pm

आपकी इस क्षणिका ने कई यादें ताजा कर दीं। बहुत सुन्दर!

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