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ग़ज़ल "खार दामन में रक्खे है गुलाब क्या कहिये"

 

इक ग़ज़ल पेशेखिदमत है

 

 

ये ज़माना अजल से है खराब क्या कहिये
खार दामन में रक्खे है गुलाब क्या कहिये

 

चंद खुशियाँ मिली थी इश्क में हमें लेकिन   

दर्द दिल को मिला है बेहिसाब क्या कहिये 

 

आब की जद में जब रहा वजूद कायम था

आ के बाहर खुदी मिटे हुबाब क्या कहिये

 

गर्दिशों से निकल के रौशनी में आते ही

टूट जाते हैं मेरे सारे ख्वाब क्या कहिये

 

बाद पीने के किसको होश क्या कहे न कहे

बोल पड़ती है मगर ये शराब क्या कहिये

 

मेरा इक शेर ही कभी कभी मुकम्मल हो  

मीर की हर ग़ज़ल है लाजवाब क्या कहिये

 

मैंने पूछा की आप को भी है मुहब्बत क्या

तो झुका पलकों को दिया जबाब क्या कहिये

 

दीप बे आबरू हुए जो तेस में थे गए 

लौट आये भटक के घर जनाब क्या कहिये

           

 

संदीप पटेल “दीप”

Views: 472

Comment

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Comment by ram shiromani pathak on March 17, 2013 at 1:13pm

वाह !!! क्या कहने सन्दीप भाई |
सुन्दर !!!

गर्दिशों से निकल के रौशनी में आते ही

टूट जाते हैं मेरे सारे ख्वाब क्या कहिये

 

बाद पीने के किसको होश क्या कहे न कहे

बोल पड़ती है मगर ये शराब क्या कहिये

 

Comment by वीनस केसरी on March 16, 2013 at 11:23pm

गर्दिशों से निकल के रौशनी में आते ही

टूट जाते हैं मेरे सारे ख्वाब क्या कहिये

वाह भाई क्या ही शेरीयत और पूरी ग़ज़ल को क्या ही खूबसूरती  मतला से मक्ता तक निभा लाए 
ढेरों दाद क़ुबूल फरमाएँ ....

वैसे "मुफाइलुन" "फ़इलातुन" होते देर नहीं लगता,,, आप एक बार फिर से नज़ारे सानी फरमा लें ...


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 16, 2013 at 9:35pm

//दीप बे आबरू हुए जो तेस में थे गए 

लौट आये भटक के घर जनाब क्या कहिये//

यह शेर बढ़िया लगा, उर्दूं शब्दों का हिंदी अर्थ भी देते तो मुझ जैसो को सहूलियत होती । बधाई । 

Comment by बृजेश नीरज on March 16, 2013 at 9:35pm

गर्दिशों से निकल के रौशनी में आते ही

टूट जाते हैं मेरे सारे ख्वाब क्या कहिये

वाह क्या बात! बेहतरीन! 

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on March 16, 2013 at 10:34am

चंद खुशियाँ मिली थी इश्क में हमें लेकिन   

दर्द दिल को मिला है बेहिसाब क्या कहिये |

वाह !!! क्या कहने सन्दीप भाई |
सुन्दर !!!

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