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आग का दरिया

आग का दरिया नंगो पैरों करना पार कहाँ  तक अच्छा 

तन्हाई में सिसकी भरकर रोना यार कहाँ तक अच्छा 
 
माना पुराने पन्नों पर ख्वाहिश ने नयी तारीखें लिख दी 
लेकिन पढना फिर फिर बासी वो अखबार कहाँ तक अच्छा 
 
कच्चे रंगों से मिटटी के घर आँगन रंग कर सोच रहा 
बरसाती मौसम में जिद का ये…
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Added by ajay sharma on November 7, 2012 at 7:00pm — 1 Comment

'' हुज़ूर इस नाचीज़ की गुस्ताखी माफ़ हो ''

हुज़ूर इस नाचीज़ की गुस्ताखी माफ़ हो ,

आज मुंह खोलूँगी हर गुस्ताखी माफ़ हो !



दूँगी सबूत आपको पाकीज़गी का मैं ,

पर पहले करें साबित आप पाक़-साफ़ हो !



मुझ पर लगायें बंदिशें जितनी भी आप चाहें ,

खुद पर लगाये जाने के भी ना खिलाफ हो !



मुझको सिखाना इल्म लियाकत का शबोरोज़ ,

पर पहले याद इसका खुद अलिफ़-काफ़ हो !



खुद को खुदा बनना 'नूतन' का छोड़ दो ,

जल्द दूर आपकी जाबिर ये जाफ़ हो !

            …

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Added by shikha kaushik on November 7, 2012 at 1:00pm — 5 Comments

तय करना है

चाँद-सितारे ,बादल ,सूरज

आँख मिचौली खेल रहें हैं ।

धरती खुश है ,

झूम रही है ।

झूम रहा है प्रहरी कवि-मन ।

समय आ गया नए सृजन का ।

 

खून सनी सड़कों पर-

काँटे उग आएं हैं ।

जीवन भाग रहा है नंगेपांव –

मगर बचना मुश्किल है ।

सन्नाटों का गठबंधन-

अब चीखों से है ।

 

हृदयों के श्रृंगारिक पल में

छत पर चाँद उतर आता है ।

कवि के कन्धे पर सर रखकर

मुस्काता है ।

नीम द्वार का गा उठता…

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Added by Arun Sri on November 7, 2012 at 11:24am — 16 Comments

इश्क का ज्वार

खींचा-खींची कर रहे, इक दूजे की चीज ।

सोम सँभाले स्वयं सब, भूमि रही है खीज ।

भूमि रही है खीज, सभी को रखे पकड़ के ।

पर वारिधि सुत वारि, लफंगा बढ़ा अकड़ के ।

चाह चाँदनी चूम, हरकतें बेहद नीची ।

रत्नाकर आवेश, रोज हो खींचा खींची ।।

Added by रविकर on November 7, 2012 at 9:14am — 3 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
कुछ कह मुकरियाँ

जब वो आते धूम मचाते

मन अंतर पर वो छा जाते

खुशियों के लाते उपहार,

क्या सखी साजन? नहीं त्यौहार.

 

 

रंग गेहुआ कड़कदार वो

बच्चों बूढों सबका यार वो

भटके, फिर भी वो गली गली

क्या सखी साजन? नहीं मूंगफली.

 

 

घुले हवा जब उसकी खुशबू

रहे नहीं तब मन पर काबू

दिल पर छाए उसका जलवा

क्या सखी साजन? नहीं सखी हलवा.

Added by Dr.Prachi Singh on November 6, 2012 at 6:58pm — 22 Comments

पाजी शहजादा | मुश्किल में काजी ।।

आभार आदरणीय सौरभ जी -

2 2 2 2 2

हारे हो बाजी ।

छोड़ो लफ्फाजी ।|

होती है गायब -

वो कविताबाजी ।।

पल में मर जाती

रचनाएं ताज़ी ।।

दिल्ली से लौटे -

होते हैं हाजी ।।

पाजी शहजादा

मुश्किल में काजी ।।

रिश्वत पर आधी ।

रविकर भी राजी ।।

Added by रविकर on November 6, 2012 at 6:52pm — 1 Comment

अभी बच्चा है,देश का भविष्य है

सात साल का मेरा पोता-

 है अभी छोटा 
जिसे चाहिए खिलौना 
नित नया, 
खोलकर या तोड़कर 
देखने को, 
क्या है उसमे नया ।
कंप्यूटर पर जब मै 
थक जाता, पर 
कनेक्ट नहीं कर पाता, 
तो पोता कहता, 
कहता ही क्या- 
झट कनेक्ट कर जाता ।
उसकी टीचर से…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 6, 2012 at 6:24pm — 10 Comments

जिंदगी

जिंदगी इतनी खूबसूरत होगी,

जिंदगी में इतने रंग होंगे,

जिंदगी इतनी खुशहाल होगी,

जिंदगी में इतना प्यार होगा,

ऐसा कभी सोचा न था ।



जिंदगी निस्ठुर भी होगी,

जिंदगी थपेड़े भी मारेगी,

जिंदगी हम पर हँसेगी,

जिंदगी भँवर में फँसायेगी,

ऐसा कभी सोचा न था ।



जिंदगी कर्म का पाठ पढ़ाएगी,

जिंदगी कटु सत्य बताएगी,

जिंदगी सही रास्ता दिखायेगी,

जिंदगी विजय पथ भी बताएगी,

ऐसा कभी सोचा न था ।



जिंदगी में कोमलता होगी,

जिंदगी इतनी नाजुक…

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Added by akhilesh mishra on November 6, 2012 at 4:30pm — 3 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
जिंदगी ने उसे छ्ला होगा

गैस होगी न कोयला होगा

चूल्हा ग़मजदा मिला होगा



पेट रोटी टटोलता हो जब

थाल में अश्रु झिलमिला होगा



भूख की कैंचियों से कटने पर

सिसकियों से उदर सिला होगा



चाँद होगा न चांदनी होगी

ख़्वाब में भी तिमिर मिला होगा



भोर होगी न रौशनी होगी

जिंदगी से बड़ा गिला होगा



लग रहा क्यूँ हुजूम अब सोचूँ

मौत का कोई काफिला होगा



बेबसी की बनी किसी कब्र पर

नफरतों का पुहुप खिला होगा



अब बता "राज"दोष है किस…

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Added by rajesh kumari on November 6, 2012 at 2:00pm — 20 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
जो कर सके तो कर अभी.. . // -- सौरभ

शिथिल मनस पे वार कर, जो कर सके तो कर अभी..

प्रहार बार-बार कर, जो कर सके तो कर अभी.. !



अजस्र श्रोत-विन्दु था मनस कभी बहार का

यही हृदय उदाहरण व पुंज था दुलार का

प्रवाह किंतु रुद्ध अब, विदीर्ण-त्रस्त स्वर…

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Added by Saurabh Pandey on November 6, 2012 at 1:24pm — 25 Comments

ईश्वरल्लाह...

अजब सा शोर है…

मंदिर की घंटियों में भी

मस्ज़िद की अजानों में

मुझको रब नहीं दीखता

धर्म के इन दुकानों में



दिल में बचैनीं हैं...

क्या ख़ाक मिले सुकूं

गीता में कुरानों में

आब हूँ हवा में मिल जाऊँगा

मुझे ना दफनाना तुम

ना जलाना शमशानों में



नहीं जाता किसी दर पर...

खुदा जो है तो मुझसे मिले

कभी मेरे मकानों में

मैं मंदिर में बैठ के पियूँगा

वो तो हर जगह है

पैमानों में मयखानों में



उसे क्या ढूंढते हो तुम…

ज़िन्दगी…

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Added by Ranveer Pratap Singh on November 5, 2012 at 11:30pm — 8 Comments

मेरा बेटा

मेरा बेटा

छोटा है

महज़ छ: साल का

मगर

खिलौने इकट्ठे करने में

माहिर है

और खिलौने भी क्या ?

दिवाली के बुझे हुये दिये

अलग-अलग किस्म की

पिचकारियाँ

हाँ कई रंग भी है

उसके मैंजिक बॉक्स में

लाल, हरे, पीले

मगर रंगों मे फर्क

नहीं जानता

बच्चा है न

नासमझ है

होली में

पूछेगा नहीं

आपको कौन सा रंग पसंद है

बस लगा देगा

बच्चा है न

नासमझ है

हरे और पीले का फर्क

अभी नहीं जानता

उसे तो ये भी नहीं पता

होली का…

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Added by नादिर ख़ान on November 5, 2012 at 3:30pm — 7 Comments

जिन्दगी का सच-विरह

विरह की बेला चुप सी आती

कर्मभूमि और गृहस्ती में

होले होले कदम बढाती

सुख समृधि को, मिटा

अंतर्मन में भेद करा

मन की शांति, भंग कर जाती

काल चक्र सा एक रचा

रह रह कर

भ्रम जाल में हमें फंसाती

ढंग बेढंग के करतब करा

इन्सान से हमको,

पशु बनाती

वक़्त की नजाकत को समझ

नट बना, इंसान नचाती

ऐसा अपना रंग दिखाती

जब तक समझ में

आता कुछ भी

तब तक सब कुछ

धुल में सब कुछ ये मिलाती

पल भर में ये नेत्र भिगो

हमारे अस्तिव का बोध कराती

लहर…

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Added by PHOOL SINGH on November 5, 2012 at 2:30pm — 1 Comment

हरिगीतिका छंद

छम छम करे हरी पाँव पैजनि ,, करधनी कटि साजती

चलते ठुमुक नन्द लाल निरखति,, काम कोटिन लाजती 

यों लाग माखन देखि मुख हरि ,, काग मन लालच भयो 

जूठन मिले जो आज हरि मुख ,, सोच आँगन वह गयो

चिदानन्द शुक्ल "संदोह "

Added by Chidanand Shukla on November 5, 2012 at 1:42pm — 2 Comments

"विरह गीत" - लतीफ़ ख़ान, दल्लीराजहरा.

विरहन का क्या गीत अरे मन |

प्रियतम प्रियतम, साजन साजन ||



जब से हुए पी आँख से ओझल,

प्राण है व्याकुल साँस है बोझल,

किस विध हो अब पी के दर्शन || विरहन का...



प्रीत है झूटी सम्बन्ध झूटा,

सौगंध झूटी अनुबन्ध झूटा,

मिथ्या मन का हर गठबन्धन || विरहन का...



जब दर्पण में रूप सँवारूँ,

अपनी छवि में पी को निहारूँ,

मेरी व्यथा से अनभिज्ञ दर्पण || विरहन का...



दुख विरहन का किस ने जाना,

अपने भी अब मारें…

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Added by लतीफ़ ख़ान on November 5, 2012 at 1:30pm — 5 Comments

कुछ दोहे

कितना कुछ सुलगा बुझा, तेरे-मेरे बीच

ख्‍वाबों में भी हम मिले, अपने जबड़े भींच

कैसे फूलों में लगी, ऐसी भीषण आग

कोयल तो जलकर मरी, शेष बचे बस नाग

जबसे तुम प्रियतम गए, गूंगा है आकाश

तृन-टुनगों पर हैं पड़े, अरमानों की लाश

बिखरा-बिखरा दिन ढला, सूनी-सूनी शाम

तारों पर लिखता रहा, चंदा तेरा नाम

तुम बिन कविता क्‍या लिखूं, दोहा, रोला, छंद

भाव चुराते शब्‍द हैं, लय भी कुंठित, मंद

Added by राजेश 'मृदु' on November 5, 2012 at 12:46pm — 7 Comments

मुक्तछंद कविता सम जीवन...

मुक्तछंद कविता सम जीवन,

तुकबंदी की बात कहाँ है ||

लय, रस, भाव, शिल्प संग प्रीति |

वैचारिक सुप्रवाह की रीति ||

अलंकार से कथ्य चमकता |

उपमानों से शब्द दमकता ||

यगण-तगण जैसे पाशों से,

होता कोई साथ कहाँ है |

मुक्तछंद कविता सम जीवन,

तुकबंदी की बात कहाँ है ||

अनियमित औ स्वच्छंद गति है |

भावानुसार प्रयुक्त यति है ||

अभिव्यक्ति ही प्रधान विषय है |

तनिक नहीं इसमें संशय है ||

ह्रदयचेतना से सिंचित ये,

ऐसा यातायात कहाँ है |

मुक्तछंद…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on November 5, 2012 at 8:38am — 12 Comments

कैसे धर लूं धीर पिया मैं इन आँखों की प्याली में

रो रोकर हार गया काजल

हार गये बिछुए कंगना

समझा दो तुम ही तुम बिन

अब कैसे जिएगा ये अंगना

कैसे आयें प्राण कहो अब नथ,बिंदियाँ और लाली में

कैसे धर लूं धीर पिया मैं इन आँखों की प्याली में



सब देखें छत चढ़ चढ़ चन्दा,

पर मेरा चन्दा रूठ गया

दिल का बसने वाला था जो

कितना पीछे छूट गया

कैसे रंग रहे होली में कैसी चमक दिवाली में

कैसे धर लूं धीर पिया मैं इन आँखों की प्याली में



जनम जनम की कसमें सारी

इक क्षण में ही तोड़ चले

तुम क्या जानो अंखियों से…

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Added by Pushyamitra Upadhyay on November 4, 2012 at 9:44pm — 5 Comments

तृष्णा हर ले साकी

 
 
मुग्ध हुआ देख तेरे चितवन नयनों का प्याला,
मेरे नयनों में लेलु थोड़ी,तेरी मुग्ध…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 4, 2012 at 5:30pm — 5 Comments

ग़ज़ल "बह्र मुजारे मुसम्मन अखरब मक्फूफ़ महजूफ"

===========ग़ज़ल=============

बह्र मुजारे मुसम्मन अखरब मक्फूफ़ महजूफ

वज्न- २ २ १ - २ १ २ १ - १ २ २ १ - २ १ २



चेह्रा है आपका या हसीं माहताब है

ये नाजुकी बदन की बड़ी लाजबाब है



गोरा बदन है ऐसे के छू लें तो सुर्ख हो…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on November 4, 2012 at 4:50pm — 6 Comments

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