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जब वो आते धूम मचाते

मन अंतर पर वो छा जाते

खुशियों के लाते उपहार,

क्या सखी साजन? नहीं त्यौहार.

 

 

रंग गेहुआ कड़कदार वो

बच्चों बूढों सबका यार वो

भटके, फिर भी वो गली गली

क्या सखी साजन? नहीं मूंगफली.

 

 

घुले हवा जब उसकी खुशबू

रहे नहीं तब मन पर काबू

दिल पर छाए उसका जलवा

क्या सखी साजन? नहीं सखी हलवा.

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 25, 2012 at 5:55pm

कह मुकरियों को पसंद करने हेतु आभार आदरणीय प्रदीप जी 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on November 25, 2012 at 4:51pm

मूंगफली हलवा और त्यौहार 

आपस में सबका व्यवहार 

बधाई 

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on November 12, 2012 at 9:19am

रोचक और मजेदार कह मुकरियाँ के लिए आदरणीया प्राची दीदी को हार्दिक बधाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 9, 2012 at 8:39am

हार्दिक आभार आ. नादिर खान जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 9, 2012 at 8:38am

हार्दिक आभार आदरणीया विनीता शुक्ला जी 

Comment by नादिर ख़ान on November 9, 2012 at 12:45am

सुंदर रचना अदरणीय प्राची जी तथा कह-मुकरी के बारे में लाभकारी जानकारी के लिए बहुत धन्यवाद ।

Comment by Vinita Shukla on November 8, 2012 at 5:00am

बहुत खूब डॉ. प्राची जी. रोचक एवं अद्भुत रचना.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 7, 2012 at 6:56pm

आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी 

यह कहमुकरिया आपको रुचिकर लगीं, इस अनुमोदन हेतु हार्दिक आभार. सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 7, 2012 at 6:32pm

कह-मुकरी के आलोक में सटीक कथ्य बन पड़ा है, डॉ. प्राची. मानिये कि  कह-मुकरी का मान्य-भाव निखर-उभर आया है. हार्दिक बधाई स्वीकार करें.

सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on November 7, 2012 at 6:08pm

मुकरियां के शिल्‍प पर जानकारी देने के लिए आभार इसे अपने वॉल पर सहेज रहा हूं कभी कोशिश करूंगा

कृपया ध्यान दे...

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