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All Blog Posts (19,173)

मुक्तक ~~

एक~

*

नफ़रत जितनी उतना प्यार,

इन पर अपना क्या अधिकार,

एक बिंदु पर पड़ा ठहरना 

सरहद को करना मत पार !



दो~

*

ये कैसी इसकी रफ़्तार ,

बहुत प्यार धीमा है यार ,

सीमाएं कुछ उनकी हैं तो 

अपनी भी सीमा है यार !



तीन~

*

नफरत छोडो ,प्यार लुटाओ 

खुशियाँ और सनेह…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on July 1, 2013 at 11:13pm — 9 Comments

"स्त्री विमर्श"_____

"क्या लिखूं? "

ये सोच कर शुब्भु का दिमाग और दिल बहुत तेज  रहा था. वह कॉलेज की जानी मानी वक्ता थी. जब भी कोई फंक्शन होता या कोई भी विचार गोष्ठी, श्ब्भु को अपना नाम नही देना पड़ता था। उसके साथ स्वमेव ही उसका नामांकन करा देते। शुब्भु को घर बैठे गृहकार्य भी मिल जाता, की राजीव का ब्रेक अप हो गया है तो दिल टूटने की कविता लिखनी है। शैलजा, आशुतोष को प्रपोस करना चाहती है तो उसे अपिलिंग लाइन्स लिख के देनी है। और न जाने कितने आयोजन ख़त्म होते तो बिना शुब्भु को बुलाये ये असम्भव ही न…

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Added by शुभांगना सिद्धि on July 1, 2013 at 9:42pm — 10 Comments

आज प्रलय हुंकार करूँ,,,,,,

आज प्रलय हुंकार करूँ,,,,,,

=================

सच ! तू ही अब सब कुछ बतला,मैं क्यॊं ्न तुझसॆ प्यार करूँ ॥



तॆरी कटुता कॊ जग मॆं, कॊई शमन नहीं कर पाता,

तॆरी ग्रीवा मॆं बाहॆं डाल, कॊई भ्रमण नहीं कर पाता,

भाग रहा जग दूर दूर, क्यॊं तुझसॆ कुछ तॊ बतला,

दुविधा का विषय यही, है जग बदला या तू बदला,



दुत्कार रहा सारा जग तुझकॊ,मैं क्यॊं न जग सॆ ्तक़रार करूँ ॥१॥

सच, तू ही अब,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,



फिर तॆरॆ हॊतॆ जग मॆं, कैसॆ असत्य का राज्य…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on July 1, 2013 at 9:00pm — 18 Comments

आधुनिक नेता (घनाक्षरी )

आत्मा देखो मर गयी ,ह्रदय पाषाण हुआ !

मानवता मार चुके ,दिखते कसाई है !!

लूट पाट चोरी डाका ,इनका है काम यही !

लोगों का निचोड़ें खून ,चाटते मलाई हैं !!



भुखमरी से मरते,लोग बिलखाते जहाँ !

लाज शर्म पी चुके हैं ,भेजते दवाई हैं !!

ऐसे पापियों से…

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Added by ram shiromani pathak on July 1, 2013 at 7:52pm — 10 Comments

विपत-प्रबंधन ढील, बहे घर-ग्राम-कबीला-

थोथी-थूल दलील दे, भाँजे लापरवाह |
लीला लाखों जिंदगी, कातिल है नरनाह |
कातिल है नरनाह, दिखाए दुर्गति-लीला |
विपत-प्रबंधन ढील, बहे घर-ग्राम-कबीला |
धरे हाथ पर हाथ, मजे में बाँचे पोथी |
छी छी सत्ता स्वार्थ, थुड़ी थू थोथा-थोथी ||

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on July 1, 2013 at 7:33pm — 12 Comments

तो बंजरों में ही कश्ती चलाना अच्छा है

ग़मों में आपका यूँ मुस्कुराना अच्छा है

हंसी लबों पे रक्खे गम छुपाना अच्छा है  

 

कोई कभी जो पूछे है सबब यूँ हंसने का  

छुपा के चश्मेतर तो खिलखिलाना अच्छा है

 

मुझे तो हर घडी ये गलतियाँ बताता रहा

कोई कहे बुरा चाहे ज़माना अच्छा है

 

ग़ज़ब हैं खेल ये तकदीर के किसे क्या कहें  

खुद अपने आप से ही हार जाना अच्छा है

 

वो जिसकी चोट से दिल जार जार रोया था

उसी की राह से पत्थर उठाना अच्छा है

 

महल न…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 1, 2013 at 6:17pm — 17 Comments

हे ! इस जगदीश

(1)

 

ये ईश का दरबार है ,

खुश रंग गलीचे बिछे है ।

अंबर का है तम्बू तना है ,

रवि चन्द्र तारे जगमगाते ।

कैसी ये मौजे बहार है ॥

 (2)

नदियों मे बहता नीर है ,

वायु का वेग गंभीर है ।

सागर की है अनुपम छटा ,

जहां रत्न का  भरा भंडार है।।

(3)

न्यायकारी निर्विकारी ,

तू जगत करतार है ।

तेरी महिमा अति अगम ,

नहीं जिसका पारावार है ॥

(4)

इकरार नहीं पूरा किया ,

ज्यो किया गर्भ मे…

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Added by annapurna bajpai on July 1, 2013 at 6:00pm — 2 Comments

गजल -- कुछ और करिश्मे गजल के देखते है

मित्रो इस बार नेट व्यवधान के कारन यह मुशायरा अंक में प्रस्तुत नहीं कर सकी थी , एक छोटा सा प्रयास किया था ...आपके समक्ष -- समीक्षा की   अपेक्षा है;



चलो नज़ारे यहाँ आजकल के देखते है

लोग कितने अजब है चल के देखते है



गली गली में यहाँ आज पाप कितना फैला

खुदा के नाम पे ईमान छल के देखते है



ये लोग कितने गिरे है जो आबरू से खेले

झुकी हुई ये निगाहों को मल के देखते है



ये जात पात के मंजर तो कब जहाँ से मिटे  

बनावटी ये जहाँ से निकल के…

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Added by shashi purwar on July 1, 2013 at 3:00pm — 14 Comments

कुण्डलिया छंद [प्रथम प्रयास]

बरखा छम छम आ गई ,लेकर सुखद फुहार

सावन के झूले पड़े ,कोयल करे पुकार

कोयल करे पुकार ,सबहीं का चित चुराए

मीठे मीठे आम ,सभी के मन को भाए

सखि न झूला सोहै ,ना ही चलत है चरखा

आय न सजन हमार,ना भाए रूत बरखा

 ........मौलिक व…

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Added by Sarita Bhatia on July 1, 2013 at 1:00pm — 9 Comments

!! वो कौन था !!

!! वो कौन था !!

 

आये तो कई लोग, ज़िन्दगी मे मेरी मगर ।

वो कौन था जो सीधे, दिल मे समा गया ।।…

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Added by बसंत नेमा on July 1, 2013 at 10:00am — 20 Comments

ग़ज़ल -४

कश्ती को बस इक बार जताना है मुझे भी

जब तैर लिया, पार हो जाना है मुझे भी

 

जो अपने सिवा खास किसी को न समझते

कितना हूँ मैं दुश्वार बताना है मुझे  भी

 

तूफाँ  से यही बात कही, मैंने यहाँ पर

हर हाल चरागा ही जलाना है मुझे भी

 

अब छूट घटाओं को कभी दे नहीं सकता

पानी तो हर एक हाल पिलाना है मुझे भी

 

मत सोच सफ़र, पाँव मेरे बांध के रखना

जब वक्त कहे, लौट के आना है मुझे भी

 

जो आग लगाना ही बड़ा काम…

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Added by Dr Lalit Kumar Singh on July 1, 2013 at 7:00am — 17 Comments

एक बंजर व्योम तो हम पर तना है !

अपरिचय, संवेदना है, भावना है ,

उसे क्या जो पुष्प से पत्थर बना है !



मिले उनको हर्ष के बादल घनेरे ,

एक बंजर-व्योम तो हम पर तना है !



चित्र है उत्कीर्ण कोई चित्त पर ,

ठहर जाती जहां जाकर कल्पना है !



सूर्य की ये रश्मियाँ बंधक बनीं हैं 

एक अंधी कोठरी मे ठहरना है !



रास्ते अब स्वयं ही थकने लगे हैं 

पूछता गंतव्य मन क्यों अनमना है ?



_______________________प्रो. विश्वम्भर…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 30, 2013 at 10:57pm — 22 Comments

कैलकुलेटर

कैलकुलेटर

‘’सुनती हो बेगम! सोने का दाम मार्केट में बहुत गिर गया है’’

‘’तो मैं क्या करूँ मियाँ?’’

‘’अजी बेगम जल्दी से तैयार हो जाओ ,मार्केट चलते हैं आज तुम्हें सोने से लाद दूँगा’’

‘’क्या.....?’’ राधा मुँह बाये हाथ में करछी पकड़े पति के पास आयी जो बरामदे में बैठा अखबार पढ़ रहा था.

‘’क्या कहा आपने? मुझे सोने से लादोगे? एक जोड़े कंगन के लिये तो सारी जिंदगी तरस गयी.’’ इतना कहकर राधा अपनी नाराज़गी जताती हुई दुबारा रसोईघर में चली गयी.

महिपाल पत्नी को मनाने के लिये उसके…

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Added by coontee mukerji on June 30, 2013 at 9:24pm — 16 Comments

जुदाई

जब तू था तो सूनापन नही था

इच्छा थी पर अरमान नही था 

अश्कों में भिगो लिया दामन मैंने 

प्यासी रहूंगी फिर भी सोचा नही था...

तेरी यादों से दिन बनते थे 

और जुदाई से काली रातें

तेरे प्यार से ज़िन्दगी बनी थी

और बेवफाई से उखड़ी सांसे...

तेरे गम से मेरा गम जुदा कब था

तू नही समझा बस यही गम था

छीन लिया समय से पहले रब ने

जुदाई का गम क्या पहले कम था...

"मौलिक व…

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Added by Aarti Sharma on June 30, 2013 at 7:30pm — 16 Comments

दोहे

जल बिन सब बेजान हैं ,धरती कहे पुकार

बरखा देखो आ गई ,लेकर सुखद फुहार

घाव धरा के भर गए , ग्रीष्म हो गया लुप्त

जल फैला चहुँ ओर है ,धरा हो गई तृप्त



बरखा लेकर आ गई ,राहत और सुकून

दिल्ली भी अब बन गई ,देख देहरादून…

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Added by Sarita Bhatia on June 30, 2013 at 6:00pm — 9 Comments

तीन मुक्तक - लक्ष्मण लडीवाला

मुक्तक 
एकाकीपन सांझ का, चंचल मन भटकाय
इस पड़ाव पर उम्र के,बनता कौन सहाय 
सुन्दर हर पल वह घडी,अनुपम सा उपहार 

साँस साँस की हर लड़ी,मुग्ध मुझे करजाय |


(2)
 
बिगड़ न जावे और ये, जीवन के हालात 

वर्षा जल भूजल करे, तभी बनेगी बात |

हरियाली वसुधा रहे, नदियों में जलधार,

पनघट…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 30, 2013 at 12:30pm — 15 Comments

देखो चुपके से रात चली है [नज़्म]

चाँद सितारों संग, महकी बहारों संग,

देखो चुपके से रात चली है ।

गहरी खामोशी में, ऐसी मदहोशी में ,

दिल में फिर तेरी बात चली है ।

चाँद का जब दीदार करूँ तो ।

दिल के झरोखे से प्यार करूँ तो ।

यादों की महकी बारात चली है ।

पूछो ना काटी कैसे तनहाई ।

याद जो आये वो तेरी जुदाई ।

आँखों से मेरे बरसात चली है ।

थाम के बाहें बाहों में ऐसे ।

चले दो राही राहों में ऐसे ।

जैसे संग सारी कायनात चली है ।

प्यार…

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Added by Neeraj Nishchal on June 30, 2013 at 12:00pm — 15 Comments

ग़ज़ल

वेदियों सा तप्त मन अपने लिए

कर रहा सारे हवन अपने लिए



अपनेपन को छोड़ मतलब साधते

दोस्त का होता चयन अपने लिए



मूढ़ मन में मैल ले गंगा नहा

कर रहा है आचमन अपने लिए



तितलियों को हांक कर भंवरे कहें

फूल कलियाँ हैं चमन अपने लिए



देश की है फ़िक्र किस इंसान को

हर कहीं चिंतन मनन अपने लिए



हिंदियों की नाक ऊँची कर रहा

पश्चिमी का ला चलन अपने लिए



आँख दिखलाता है वो माँ बाप को

संस्कृति का कर हनन अपने लिए…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 30, 2013 at 10:30am — 6 Comments

सिर्फ तुम्हारे लिए

तेरे अधरों की मुस्कान,

भरती मेरे तन में प्राण.

जीवन की ऊर्जा हो तुम,

साँसों की सरगम की तान.

मैं सीप तुम मेरा मोती ,

मैं दीपक तुम मेरी ज्योति.

कभी पूर्ण न मैं हो पाता ,

संग मेरे जो…

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Added by Pradeep Bahuguna Darpan on June 30, 2013 at 9:00am — 20 Comments

रविवार ....

कल रविवार था ... 

फिर उदास, सूनी शाम थी ... 

देख रहा था

हल्की बारिश जो 

सब कुछ भिगो रही थी 

सामने पंछी रोशनदान 

मे छिपने का प्रयास कर रहे थे 

हवाएँ तेज चल रहीं थी 

जो आँधी, रुकने के बाद भी 

आँधी चलने का एहसास करा रही थी 

मैं खड़ा अपने आपको खोज रहा था 

सब कुछ फैला हुआ, तितर बितर था 

अतीत के पन्ने अब भी 

हवा मे तैर रहे थे 

कुछ गीले, कुछ फटे 

कुछ बिखरे पड़े थे 

सब कुछ ठहर गया…

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Added by Amod Kumar Srivastava on June 30, 2013 at 8:00am — 10 Comments

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