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!! वो कौन था !!

 

आये तो कई लोग, ज़िन्दगी मे मेरी मगर ।

वो कौन था जो सीधे, दिल मे समा गया ।।

सब तकते रहे राहे, मेरे आने की मगर ।

वो कौन था जो मुझे, इंतजार करा गया ।।

पाने को झलक मेरी, जमाना लडा मगर  ।

वो कौन था जिसकी झलक पे, मै मर गया ॥

चाँद तो आँसमा पे है, सब कहते रहे मगर ।

वो कौन था जो रात, मेरी खिडकी पे आ गया ।।

रखता हू कदम जँमी पर, फूँक फूँक कर मगर ।

वो कौन था जो निगाहो से, मुझे घायल कर गया ।।

बनते है संगेमरमर से, तो बेजान बुत मगर  ।

वो कौन था जो कल मेरी, महफिल मे आ गया ।।

आता हू मै ख्वाबों मे, हसीनाओ के मगर ।

वो कौन था जो कल मेरे, ख्वाबों मे आ गया ।।

पीते है सब लोग तो, मयखानो मे  मगर ।

वो कौन था जो मुझे, आंखो से पिला गया ।।

है फूल हजारो बाँग मे, तेरे माली मगर ।

वो कौन था जो मेरी, रुह को महका गया ।।

 

अब तक तो जिया हू मै, तन्हा जिन्दगी मगर  ।

वो कौन था जो अब, जीना मुहाल कर गया ।।

सुना है की लुटता है इश्क, देख के हुस्न को मगर ।

वो कौन था जो आंखो से मुझको, लूट के ले गया ।।

अब से पहले भी था मौसम, दीवाना बडा मगर ।

वो कौन था जो बसंत को शायर  बना गया ।।

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on July 10, 2013 at 7:46pm

आदरणीय बसंत नेमा जी सादर सुन्दर रचना सादर बधाई स्वीकारें.

बनते है संगेमरमर से, तो बेजान बुत मगर  ।

वो कौन था जो कल मेरी, महफिल मे आ गया ।।..........यह बंद मुझे कुछ अधूरा सा लगा.

Comment by बसंत नेमा on July 3, 2013 at 10:24am

आ0 श्री रविकर  सर बहुत बहुत धन्यवाद आभार आप का , आप ने रचना को समय दिया ........शुक्रिया 

Comment by बसंत नेमा on July 3, 2013 at 10:23am

आ0 श्री विजय सर बहुत बहुत धन्यवाद आभार आप का , आप ने रचना को समय दिया ........शुक्रिया 

Comment by बसंत नेमा on July 3, 2013 at 10:23am

आ0 श्री लक्ष्मण सर बहुत बहुत धन्यवाद आभार आप का , आप ने रचना को समय दिया ........शुक्रिया 

Comment by vijay nikore on July 2, 2013 at 10:19pm

आदरणीय बसंत जी:

 

आपने रचना में भाव अच्छे पिरोए हैं। बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 2, 2013 at 9:46pm

मन को टटोलते रहिये, पता लग ही जाएगा वो कौन था जो मन उद्वेलित कर गया | मन के भावों की सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई 

Comment by रविकर on July 2, 2013 at 9:21pm

शुभकामनायें आदरणीय -


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 2, 2013 at 12:07pm

यह रचना विशेष मनः स्थिति की है. भावुक शब्द के लिहाज से सही है लेकिन काव्य तत्व के लिहाज से कमजोर है
लेकिन भाईजी, आपमें एक सांवेदनशील कवि है जो संभावनाओं से भरा है.. उम्मीद जगाता है..
रचना का भाव पक्ष वैसे तो कई बार इस्तमाल किया जा चुका है .. ऐसा लोग कहते रहे हैं . लेकिन आपके लिखने के ढंग में सचाई है
प्रयासरत रहिये.
शुभकामनाएँ

Comment by Devendra Pandey on July 2, 2013 at 11:40am

Sir bahut Hi Sundar Rachna hai 

Comment by बसंत नेमा on July 2, 2013 at 10:34am

आदरणीय जीतेन्द्र जी  रचना आप को पसन्द आई उसके के लिये बहुत बहुत आभार .. धन्यवाद .

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