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जल बिन सब बेजान हैं ,धरती कहे पुकार
बरखा देखो आ गई ,लेकर सुखद फुहार

घाव धरा के भर गए , ग्रीष्म हो गया लुप्त

जल फैला चहुँ ओर है ,धरा हो गई तृप्त


बरखा लेकर आ गई ,राहत और सुकून
दिल्ली भी अब बन गई ,देख देहरादून

.......मौलिक व अप्रकाशित ........

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 2, 2013 at 7:06pm

आदरणीया सरिता जी, मैं आपकी कोशिशों और सकारात्मकता के आगे नत हूँ. 

आपने कहे का और सुझाए गये विन्दुओं का सार्थक मान रखा है, मैं आभारी हूँ. रचनाकर्म संप्रेषणीयता में शुद्धता की मांग करता है. यह शुद्धता भाव के अनुसार, शब्द चयन के अनुसार, व्याकरण के अनुसार, प्रयुक्त छंद विधान के अनुसार तथा संप्रेषणीयता के अनुसार होनी चाहिये. कोई रचनाकार इसी लिहाज से प्रयास करे तो रचना अवश्य पाठकों के हृदय और मस्तिष्क दोनों को संतुष्ट करेगी. मात्र हृदय को छूने वाली या मात्र मस्तिष्क को संतुष्ट करने वाली एकांगी रचनाएँ संपूर्ण और व्यवस्थित नहीं होतीं. 

आपका पुनः आभार. सतत और दीर्घकालीन प्रयत्न करें

शुभम

Comment by Sarita Bhatia on July 2, 2013 at 6:16pm

 Saurabh Pandey sir maine ismein sudhar kar diya hai kripya janch len 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 2, 2013 at 6:46am

प्रयास पर शुभकामनाएँ आदरणीया

सब के साथ हैं होना था न कि है.  तथा कहित  को आसानी से कहे कहा जा सकता था.

दूसरे, लिंग दोष पर ध्यान दें, आदरणीया. ग्रीष्म की संज्ञा पुल्लिंग है तो दिल्ली सदा रूप बदलती रही है. और.. . जल नहीं घन छाता है.

बहरहाल इस प्रयास और प्रस्तुति पर बधाई.

सादर

Comment by LOON KARAN CHHAJER on July 1, 2013 at 7:44pm

बहुत सुंदर . साधुवाद

Comment by ram shiromani pathak on July 1, 2013 at 7:00pm

आदरणीया सरिता जी,सुंदर//////

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 1, 2013 at 12:44pm

दोहों पर प्रयास हेतु हार्दिक बधाई स्वीकारें आदरणीया सरिता जी प्रयास करते रहिये, जब ओ बी ओ पर आ ही गईं हैं तो फिकर नॉट. धीरे धीरे सब सध जायेगा.

Comment by विजय मिश्र on July 1, 2013 at 12:29pm
वाह वाह , बहुत सुंदर . साधुवाद सरिताजी
Comment by रविकर on July 1, 2013 at 10:21am

आभार आदरणीया-

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 1, 2013 at 1:10am
आदरणीय...सरिता जी, सच में बारिश के मौसम में सारी धरा खुश होकर, चारों तरफ हरियाली बिखेर देती है! साल भर की प्यासी धरती, अपनी प्यास बुझा लेती है, नदियाँ फिर से कलकल बहने लगती है! शहर हो गांव सभी जगह एक रौनक सी छा जाती है! ......सुंदर रचना प्रस्तुति के लिए शुभकामनाऐ

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