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देखो चुपके से रात चली है [नज़्म]

चाँद सितारों संग, महकी बहारों संग,
देखो चुपके से रात चली है ।
गहरी खामोशी में, ऐसी मदहोशी में ,
दिल में फिर तेरी बात चली है ।

चाँद का जब दीदार करूँ तो ।
दिल के झरोखे से प्यार करूँ तो ।
यादों की महकी बारात चली है ।

पूछो ना काटी कैसे तनहाई ।
याद जो आये वो तेरी जुदाई ।
आँखों से मेरे बरसात चली है ।

थाम के बाहें बाहों में ऐसे ।
चले दो राही राहों में ऐसे ।
जैसे संग सारी कायनात चली है ।

प्यार से बढ़के कुछ भी नही है ।
मै भी नही हूँ तू भी नही है ।
रब से हमे ये सौगात मिली है ।

मौलिक व अप्रकाशित
नीरज

Views: 999

Comment

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Comment by Neeraj Nishchal on July 3, 2013 at 10:42am

आदरणीय प्राची जी वैसे मै इन बातों का बहुत ख्याल रखता हूँ ....
पर कभी कभी बात ऐसी हो जाती है की भावनाओं को
प्राथमिकता देनी पड़ती है और शब्दों के साथ समझौता करना पड़ता है ...

बहुत बहुत आभार ।

Comment by Neeraj Nishchal on July 3, 2013 at 10:21am

आदरनीय आदरणीय गीतिका क्यों नही रखते हैं प्यार तो साँसों की
तरह साथ चलता है लोग बदल जाते हैं बस ,,चीजें बदल जाती हैं बस ।

Comment by Neeraj Nishchal on July 3, 2013 at 10:15am

आदरणीय अरुण जी बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by Neeraj Nishchal on July 3, 2013 at 10:12am

जीतेन्द्र भाई बहुत बहुत आभार ।

Comment by Neeraj Nishchal on July 3, 2013 at 10:11am

आदरणीय बब्बन जी बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by Neeraj Nishchal on July 3, 2013 at 10:09am

हरीश भाई आभार ।

Comment by Neeraj Nishchal on July 3, 2013 at 10:08am

कुन्ती जी बहुत बहुत धन्यवाद ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 2, 2013 at 7:34am

जब ह्रदय अपनी हर खुशी के लिए किसी भौतिक प्रेम स्वरुप से ही आश्वस्ति पाता हो तो प्रिय का साथ ही कायनात लगता है... ऐसे ही सांसारिक वैयक्तिक प्रेम को अभिव्यक्त करते ह्रदय के उद्गार..

अब रचना के शिल्प पर एक बात :आख़िरी बंद की आख़िरी पंक्ति में सौगात मिली है...हर बंद के अंत चली है चली है के समान ही साधा जाता तो प्रवाह अंत में कुछ अवरुद्ध होता सा न लगता.

हार्दिक शुभकामनाएं 

Comment by वेदिका on July 1, 2013 at 3:16pm

प्यार से बढ़के कुछ भी नही है ।
मै भी नही हूँ तू भी नही है ।
रब से हमे ये सौगात मिली है ।,,,, बहुत अच्छी बात कही आपने आदरणीय नीरज जी! लेकिन कहाँ लोग रब से मिली इस सौगात को सहेज के रखते है,, जब उनके हाथ से ये सौगात निकल जाती है तो हाथ मलते रह जाते है। 

बधाई इस सुन्दर प्रस्तुति पर!!

  

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 1, 2013 at 1:10pm

बेहतरीन भाई जी बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति बधाई इस सुन्दर प्रस्तुति पर.

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