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जब तू था तो सूनापन नही था

इच्छा थी पर अरमान नही था 

अश्कों में भिगो लिया दामन मैंने 

प्यासी रहूंगी फिर भी सोचा नही था...

तेरी यादों से दिन बनते थे 

और जुदाई से काली रातें

तेरे प्यार से ज़िन्दगी बनी थी

और बेवफाई से उखड़ी सांसे...

तेरे गम से मेरा गम जुदा कब था

तू नही समझा बस यही गम था

छीन लिया समय से पहले रब ने

जुदाई का गम क्या पहले कम था...

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by Abhishek Kumar Jha Abhi on July 4, 2013 at 8:51pm
Swagat Hai Aarti Ji..
Comment by Aarti Sharma on July 4, 2013 at 8:38pm

आपका तहेदिल से शुक्रिया अभिषेक जी..

Comment by Abhishek Kumar Jha Abhi on July 4, 2013 at 11:41am

बहुत सुन्दर जज़्बात

Comment by Aarti Sharma on July 2, 2013 at 9:58am

प्रिय प्राची जी अपनी शुभकामनाओ के साथ इसी तरह मेरा  होसला बडाते रहिये ..धन्यवाद 

Comment by Aarti Sharma on July 2, 2013 at 9:56am

आदरणीय सौरभ सर और विजय भाई रचना सराहने क लिए आपका  तहेदिल से धन्यवाद ..आभार 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 2, 2013 at 7:47am

मन के एकाकीपन  की पीड़ा को और सान्द्रता देते भावों की अभिव्यक्ति 

शुभकामनाएं 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 2, 2013 at 6:39am

भाव विशेष को प्रस्तुत करता प्रयास.. . बधाई.

Comment by vijay nikore on July 2, 2013 at 4:52am

आदरणीया आरती जी:

 

//तेरे गम से मेरा गम जुदा कब था

  तू नही समझा बस यही गम था

  छीन लिया समय से पहले रब ने

  जुदाई का गम क्या पहले कम था...//

जुदाई का दर्द एक रहस्य बन कर रह जाता है ...

जीवन के इस गूढ़ रहस्य की भावना को आपने
कितने सुन्दर तरीके से वर्णित किया है
!

आपको बधाई।

सादर और सस्नेह,

विजय निकोर

Comment by Aarti Sharma on July 1, 2013 at 10:32pm

आपका हार्दिक धन्यवाद आदरणीय पाठक जी ओर जितेंदर जी..आभार 

Comment by ram shiromani pathak on July 1, 2013 at 7:22pm

वाह आदरणीया आरती जी बहुत ही सुन्दर मनोभाव ///  क्या कहने //हार्दिक बधाई आपको 

कृपया ध्यान दे...

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