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माटी - दोहे

गली,कटी, तपकर खिली, माटी की संतान

माटी से मोती बने,          माटी से इंसान

 

माटी से मूरत बने,       मूरत में भगवान

माटी की भक्ति करे,      तर जाये इंसान

 

माटी से उपजें सभी,     माटी में ही   अंत

माटी का घर छोड़ के,   जाये सभी अनंत

 

मौलिक व अप्रकाशित

Added by hemant sharma on September 27, 2013 at 12:00am — 11 Comments

भारत माँ की बड़ी दुलारी हिंदी रानी

भारत माँ की बड़ी दुलारी हिंदी रानी

=================================

सीधी सादी नेक बड़ी हूँ दिल की रानी

भारत माँ की बड़ी दुलारी हिंदी रानी

मै महलो हूँ गाँव बसी हूँ जंगल में भी

आदि काल से जन-जन में हूँ आदिवासी…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on September 26, 2013 at 11:30pm — 12 Comments

धर्म हूँ मैं

नख-दंत के संसार में गुम

ढूंढता निज मर्म हूँ  मैं

ये रूचिर

रूपक तुम्‍हारे

गुंबजों की

पीढि़यां

दंगों के

फूलों से चटकी

कुछ आरती,

कुछ सीढि़यां

थुथकार की सीली धरा पर

सूखता गुण-धर्म हूँ मैं

रंगों की

थोड़ी समझ है

कृष्‍ण तक तो

श्‍वेत था

आह्लाद के

परिपाक में भी

एकसर

समवेत था

युगबोध पर कहता मुझे है

कि नहीं यति-धर्म हूँ…

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Added by राजेश 'मृदु' on September 26, 2013 at 1:29pm — 24 Comments

दुखियारी आँख - एक कुंडली छंद

मोहि दुखियारी आँख को,सुक्ख मिलत है नाहि  

देखत तुम बनते नहीं,बिन देखे अकुलाहि 
बिन देखे अकुलाहि, सजन को कहाँ निहारै  
होवेंगी कब चार , मिलन की राह बुहारै 
कह सागर कविराय,हुयी है अँखियाँ भारी, 
कबहुं मिलोगे मोय,पूछहि मोहि दुखियारी 
.
आशीष ( सागर सुमन ) 
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Ashish Srivastava on September 26, 2013 at 12:00pm — 9 Comments

माँ! शब्द दो!

जन्मा-अजन्मा के भेद से परे

एक सत्य- माँ!

 

तुम ही तो हो

जिसने गढ़ी

ये देह, भाव, विचार,

शब्द!

 

रूप-अरूप-कुरूप में

झूलती देह

गल ही जाएगी

 

भाव, विचार

थिर ही जायेंगे

 

अभिव्यक्ति को तरसते

स्वप्न-चित्र

तिरोहित हो जायेंगे

 

फिर भी चाहना के

उथले-छिछले जल में

डूबते-उतराते

बहक ही जाते हैं  

उस राह पर

जिसके दोनों तरफ हैं…

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Added by बृजेश नीरज on September 25, 2013 at 9:00pm — 26 Comments

गजल

ठीक जगह पर देख भाल के बैठा हूँ।

मैं अपनी कुर्सी संभाल के बैठा हूँ।

तीसमारखाँ बहुत बना फिरता था वो ,

मैं उसकी पगड़ी उछाल के बैठा हूँ।

दुष्मन से बदला लेने की खातिर मैं

आस्तीन में साँप पाल के बैठा हूँ।

संसद की गरिमा से क्या लेना-देना ,

संसद में जूता निकाल के बैठा हूँ।

कौन समस्यायें जनता की रोज सुने ,

अपने कान में रूर्इ डाल के बैठा हूँ।

ऐरा गैरा नत्थू खैरा मत समझो ,

सारी दुनिया मैं खंगाल के बैठा हूँ।

मौलिक अप्राकिषत एवं…

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Added by Ram Awadh VIshwakarma on September 25, 2013 at 8:41pm — 12 Comments

ग़ज़ल .... मयकशी मयकशी नहीं लगती !

ग़ज़ल

....

मयकशी मयकशी नहीं लगती !

रौशनी रौशनी नहीं लगती !!

.....

अब इबादत में दिल नहीं लगता !

बन्दगी बन्दगी नहीं लगती !!

......

हर तरफ भीड़ और मैं तनहा!

बेबसी बेबसी नहीं लगती !!

...

दिल में रखते हैं वोह तो दिल कितने !

आशिकी आशिकी नहीं लगती !!

...

गुफ़्तगू आप से करें कैसे !

आपको तो  कमी नहीं लगती

....

हैं खफा वोह अगर खफा हम है !

दोसती दोसती नहीं लगती !!

....

चाँद तारों के साथ चलता हूँ !…

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Added by राज लाली बटाला on September 25, 2013 at 8:30pm — 26 Comments

आह्वान

ये क्या हो रहा है

ये क्यों हो रहा है

नकली चीज़ें बिक रही हैं

नकली लोग पूजे जा रहे हैं...

नकली सवाल खड़े हो रहे हैं

नकली जवाब तलाशे जा रहे हैं

नकली समस्याएं जगह पा रही हैं

नकली आन्दोलन हो रहे हैं

अरे कोई तो आओ...

आओ आगे बढ़कर 

मेरे यार को समझाओ

उसे आवाज़ देकर बुलाओ...

वो मायूस है

इस क्रूर समय में

वो गमज़दा है निर्मम संसार में...

कोई नही आता भाई..

तो मेरी आवाज़ ही सुन लो 

लौट आओ

यहाँ दुःख बाटने की परंपरा…

Continue

Added by anwar suhail on September 25, 2013 at 7:30pm — 7 Comments

निगाहें फेर लो .........

निगाहें फेर लो , कि पल भर सुकून मेरे तडपते दिल को मिले !

तेरी नजरों की तपिस मुझसे सही नही जाती !

 

मेरी  बेवफाई को हो रहा है शोर जमाने में , की तू भी मुझे बेवफा कहे !

बात सच है मगर लबों पर तेरे  नहीं आती ! 

 

होकर बेसुध सोये थे कभी तेरे बांहों के घेरो में, अब ना तु बांहे फैला !

ये सच है की गुजरी घडी कभी लौटकर नही आती ! 

 

सुना है कि गमजदा है तु बीते पलो की ख्वाईस में, कि अब उनको भुला दे !

मुझे तो पल भर के लिए भी याद तेरी…

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Added by डॉ. अनुराग सैनी on September 25, 2013 at 6:30pm — 4 Comments

माँ [कुण्डलियाँ]

माँ के आंचल में मिले ,ममता की ही छाँव 

शुभाशीष पाओ मधुर, नित्य दबाकर पाँव 

नित्य दबाकर पाँव , आशीर्वाद तुम लेना

माँ से बड़ा न स्वर्ग ,उसे दुख कभी न देना 

मिट जाते दुख-दर्द , पास में माँ के जा के

ममता के ही फूल ,मिलें आंचल में माँ के 

............मौलिक व अप्रकाशित ...........

Added by Sarita Bhatia on September 25, 2013 at 5:30pm — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
जिंदगी तू ही बता जुस्तजू क्या है(ग़ज़ल ) 'राज'

2 1 2 2      2 1 2 2       2 1 2 2    2

"रमल मुसम्मन महजूफ"

.

जिंदगी तू ही बता दे जुस्तजू क्या है

इक निवाले के सिवा अब आर्ज़ू क्या है

 

ख़ास जोरोजर समझते हैं जहाँ …

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Added by rajesh kumari on September 25, 2013 at 2:30pm — 37 Comments

मैं क्या हूँ

मैं क्या हूँ

बहुत सोचा

पर सुलझी न गुत्थी

 

शब्द से पूछा तो वह बोला,

‘मैं ध्वनि हूँ अदृश्य

रूप लेता हूँ

जब उकेरा जाता है

धरातल पर’

 

पेड़ से पूछा तो बोला

‘मैं हूँ बीज का विस्तार’

‘और बीज क्या है?’

‘वह है मेरा छोटा अंश’

 

अजब रहस्य

विस्तार का अंश

अंश का विस्तार

खुलती नहीं रहस्य की पर्तें

एक सतत क्रम-

सूक्ष्म के विस्तार

विस्तार के सूक्ष्म होने…

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Added by बृजेश नीरज on September 25, 2013 at 11:00am — 42 Comments

कुंडलिया छंद

देते है आशीष वे, सर पर रखते हाथ

मन में श्रद्धा भाव हो, तभी श्राद्ध यथार्थ |

तभी श्राद्ध यथार्थ, सभी है उनकी माया

समझों वे है साथ, मिले उनकी ही छाया

मिले सभी संस्कार संज्ञान में जो लेते

माने हम उपकार,  पूर्वज ख़ुशी ही देते |

 …

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 25, 2013 at 10:30am — 17 Comments

सियासती सुपनखा से, सिया-सती अनभिज्ञ -रविकर

कुण्डलियाँ


सियासती सुपनखा से, सिया-सती अनभिज्ञ |
अब क्या आशा राम से, हो रहे स्खलित विज्ञ |


हो रहे स्खलित विज्ञ, बने खरदूषण साले |
घालमेल का खेल, बुराई कुल अपना ले |


नित आगे की होड़, रखेंगे बढ़ा ताजिया |
सिया सती की लाज, बचा ले पकड़ हाँसिया ||

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on September 25, 2013 at 8:58am — 12 Comments

गीत - मूढ़ तू क्या कर सकेगा, अनुभवी जग को पराजित!

मूढ़ तू क्या कर सकेगा, अनुभवी जग को पराजित!

है सदा जिसको अगोचर, प्राण की संवेदना भी,

क्यों करे तू उस जगत से प्रेम-पूरित याचना ही,

तू करेगा यत्न सारे भावना का पक्ष लेकर,

किन्तु तेरे भाग्य में होगी सदा आलोचना…

Continue

Added by अजय कुमार सिंह on September 25, 2013 at 2:00am — 15 Comments

नेता स्वार्थ के अपने (कुंड़ली)

नेता स्वार्थ के अपने, बदल रहे संविधान ।

करने दो जो चाहते, डालो न व्यवधान ।।

डालो न व्यवधान, है अभी उनकी बारी ।

लक्ष्य पर रखो ध्यान, करो अपनी तैयारी ।।

बगुला बाट जोहे, बैठे नदी तट रेता ।

शिकारी बन बैठो, शिकार हो ऐसे नेता ।।

.............................................

मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on September 24, 2013 at 10:49pm — 11 Comments

सत्तइसा के पूत पर, पढ़ते मियाँ मिलाद-रविकर

कुण्डलियाँ छंद


टोपी बुर्के कीमती, सियासती उन्माद |
सत्तइसा के पूत पर, पढ़ते मियाँ मिलाद |


पढ़ते मियाँ मिलाद, तिजारत हो वोटों की |
ढूँढे टोटीदार, जरुरत कुछ लोटों की |


रविकर ऐसा देख, पार्टियां वो ही कोपी |
अब तक उल्लू सीध, करे पहना जो टोपी |

अप्रकाशित/मौलिक

Added by रविकर on September 24, 2013 at 9:37pm — 6 Comments

मिस्टेक न हो जाए

इससे पहले कभी 

कहा नही जाता था 

तो बम के साथ हम 

फट जाते थे कहीं भी

और उड़ा देते थे चीथड़े 

इंसानी जिस्मों के...



अब कहा जा रहा है 

मारे न जायें अपने आदमी 

सो पूछ-पूछ कर 

जवाब से मुतमइन होकर 

मार रहे हैं हम...



बस समस्या भाषा की है 

उन्हें समझ में नही आती

हमारी भाषा 

हमें समझ में नही आती 

उनकी बोली 



हेल्लो हेल्लो 

क्या करें हुज़ूर..

एक तरफ आपका फरमान 

दूजे टारगेट की…

Continue

Added by anwar suhail on September 24, 2013 at 6:30pm — 7 Comments

भोर हो चुकी है

मन की अंतर्वेदना , कहीं बह ना जाए आंसुओ में !

बहुत टुटा हूँ ,समेट लो बाजुओं में !

अपमान के ना जाने कितने घूंट पी चूका !

पर प्यासा हूँ , डूब जाने दो आँखों में !

घना होता जाता है ये अन्धकार क्यों ?

एक दिया तो उम्मीद का जलाओ रातो में !

तिरस्कार किया गया , हिकारत से देखा गया !

ना जाने कैसा भाग्य है मेरे इन हाथो में !

लौट जाओ कि अब रंगीन जवानी गुजर चुकी !

हासिल होगा क्या  अब इन मुलाकातों में…

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Added by डॉ. अनुराग सैनी on September 24, 2013 at 5:00pm — 9 Comments

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