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नेता स्वार्थ के अपने (कुंड़ली)

नेता स्वार्थ के अपने, बदल रहे संविधान ।

करने दो जो चाहते, डालो न व्यवधान ।।

डालो न व्यवधान, है अभी उनकी बारी ।

लक्ष्य पर रखो ध्यान, करो अपनी तैयारी ।।

बगुला बाट जोहे, बैठे नदी तट रेता ।

शिकारी बन बैठो, शिकार हो ऐसे नेता ।।

.............................................

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on September 27, 2013 at 12:19am

डालो न व्यवधान, है अभी उनकी बारी ।

लक्ष्य पर रखो ध्यान, करो अपनी तैयारी ।।

बगुला बाट जोहे, बैठे नदी तट रेता ।

शिकारी बन बैठो, शिकार हो ऐसे नेता ।।

प्रिय रमेश जी अच्छे भाव ..व्यंग्य का पुट लिए सुन्दर कुंडली ..अनन्त जी व् अन्य मित्रों के सुझाव पर गौर करियेगा

आभार
भ्रमर ५
हम तो ऐसे लिख डालते
डालो न व्यवधान, अभी है उनकी बारी ।
लक्ष्य पर रख के ध्यान, करो अपनी तैयारी ।।
बगुला जोहे बाट , बैठ सरिता तट रेता ।
बैठ शिकारी बन , शिकार हो ऐसे नेता ।

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 26, 2013 at 3:37pm

सामयिक मसले पर छंद का सुन्दर प्रयास | मित्रों के सुझाव आपने संज्ञान में लिए है | करत करत अब्यास के ---------

बधाई एवं शुभकामनाए  

Comment by राजेश 'मृदु' on September 26, 2013 at 3:01pm

सुंदर लिखा है आपने, चलते रहें, सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 25, 2013 at 10:18pm

रमेश कुमार जी कुंडलिया पर प्रयास करते देख बहुत अच्छा लगा त्रुटियाँ नीचे मित्रों ने बता ही दी छंद समूह में भी विधान सीख सकते हैं हम सब भी यहाँ एक दूसरे से सीख कर ही आगे बढ़ रहे हैं शुभकामनायें 

Comment by रमेश कुमार चौहान on September 25, 2013 at 8:50pm

आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तवजी, गिरिराजजी, आदरणीय रविकरजी, आ संदीप कुमारजी, आ अरून शर्माजी आप सभी का हार्दिक आभार ।

आ रविकरजी, आ अरून शर्माजी, आपलोगों के मार्गदर्शन के बल पर मैं कुछ सीख पा रहा हू । जैसे बच्चा "अ" लिखना सीख कर उत्सुकता से अपने माता पिता को दिखाने ललायित रहता है कुछ उसी प्रकार मेरी स्थिति हो गई है । आप इसी प्रकार मार्गदर्शन करते रहिगा मुझ मे आपको सुधार निश्चित रूप से दिखेगा ।

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 25, 2013 at 4:20pm

भाई जी नेताओं पर कुण्डलिया छंद के जरिये अच्छा व्यंग कसा है किन्तु आनंद आते आते रह गया. भाई जी श्रम के साथ साथ तनिक ध्यान भी देना शुरू करें प्रवाह और मात्रा गणना पर, भाई जी लिखते समय गुनगुना कर लिखें काफी सरलता होगी. इस प्रयास पर बधाई स्वीकारें.

नेता स्वार्थ के अपने, बदल रहे संविधान । (दोहे के द्वतीय चरण में 12 मात्राएँ)

करने दो जो चाहते, डालो न व्यवधान ।।  ( दोहे के चतुर्थ चरण में 10 मात्राएँ)

डालो न व्यवधान, है अभी उनकी बारी । (

लक्ष्य पर रखो ध्यान, करो अपनी तैयारी ।।

बगुला बाट जोहे, बैठे नदी तट रेता ।

शिकारी बन बैठो, शिकार हो ऐसे नेता ।। ( रोला के अंतिम चरण में 14 मात्राएँ)

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on September 25, 2013 at 4:19pm

आदरणीय भाव बढ़िया लगे उसके लिए बधाई

बाकी आदरणीय रविकर सर का सुझाव जोरदार है

उन्हें भी बहुत बहुत बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 25, 2013 at 1:51pm

आदरणीय रमेश भाई , बहुत अच्छी बात लिखी , कुंडली छन्द मे ! बधाई !!

Comment by रविकर on September 25, 2013 at 11:30am

संविधान और कुटुम्ब के कारण कुछ दिक्कत आ रही है-
सुधारने की कोशिश कर लीजिये-सादर-

Comment by रविकर on September 25, 2013 at 11:29am

बढ़िया भाव-
शुभकामनायें आदरणीय-


दागी का रास्ता रुकना ही चाहिए-

कुछ ऐसे करके देख लीजिये एक बार-

नेता अपने स्वार्थ में, बदल रहे संविधान ।
करने दो जो चाहते, डालो मत व्यवधान ।
डालो मत व्यवधान, आज है उनकी बारी ।
रखो लक्ष्य पर ध्यान, करो वोटर तैयारी ।।
रास्ता जोह रमेश, ठोकना कुटुंब समेता ।
निश्चय होय शिकार, धूर्त अपराधी नेता ।।
.............................................

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