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गली,कटी, तपकर खिली, माटी की संतान

माटी से मोती बने,          माटी से इंसान

 

माटी से मूरत बने,       मूरत में भगवान

माटी की भक्ति करे,      तर जाये इंसान

 

माटी से उपजें सभी,     माटी में ही   अंत

माटी का घर छोड़ के,   जाये सभी अनंत

 

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Neeraj Neer on September 28, 2013 at 9:02am

सुन्दर दोहे 

Comment by annapurna bajpai on September 28, 2013 at 12:16am

आ0 आपको इस सुंदर दोहा वली हेतु बहुत बधाई । 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 27, 2013 at 7:37pm

सुन्दर दोहावली 

हार्दिक शुभकामनाएं 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 27, 2013 at 6:47pm

आदरणीय , माटी पर सुन्दर दोहावली के लिये बधाई !!

Comment by ram shiromani pathak on September 27, 2013 at 5:00pm

सुन्दर दोहे आदरणीय ///

/हार्दिक बधाई आपको //सादर

Comment by Meena Pathak on September 27, 2013 at 3:06pm

सुन्दर दोहे .. बधाई 

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 27, 2013 at 12:53pm

बहुत ही सुन्दर दोहे आदरणीय बधाई स्वीकारें थोड़े हैं थोड़े की जरुरत है.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 27, 2013 at 12:46pm

सुंदर दोहावली, बधाई आदरणीय हेमंत जी

Comment by Saarthi Baidyanath on September 27, 2013 at 12:17pm

बहुत बढ़िया व सार्थक दोहे .....बधाई :)

Comment by रविकर on September 27, 2013 at 11:58am


सटीक निर्दोष दोहे -
शुभकामनायें आदरणीय-

माटी का पुतला पुन:, माटी में मिल जाय |
रविकर माटी डाल मत, कर उत्थान उपाय ||

कृपया ध्यान दे...

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