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ग़ज़ल - दिलबर तुम कब आओगे " सलीम रज़ा

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दिलबर तुम कब आओगे सबआस लगाए बैठे हैं "

देखो  फूलों  से  अपना  घर - बार सजाए बैठे हैं "

.

हम तो उनके प्यार का दीपक दिल में जलाए बैठे हैं " 

जाने  क्यों  वो  हमको  अपने  दिल से भुलाए बैठे हैं "

.

किसको ख़बर थी भूलेंगे वो बचपन की सब यादों को "

उनकी  चाहत आज तलक हम दिल में बसाए बैठे हैं "…

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Added by SALIM RAZA REWA on September 8, 2017 at 10:00pm — 5 Comments

लघु कथा

चिंता



"चलो जल्दी । सब बाहर निकलो । बाँध टूट चुका है। पानी बहुत तेज़ी से इधर की ओर आ रहा है ।" बाहर से कई आवाज़ें आ रही थी । आवाज़ सुनते ही शन्नो रसोई में घुस गई । पूरे घर में घुटने तक पानी भर चुका था । रसोई से दाल,चावल,आटा,नमक जितना कुछ उसके दुपट्टे में बँध सका, उसने बाँध लिया । ऊपर रखे डिब्बे में से गुड़मुड़ाए नोटों को निकलना कैसे भूल सकती थी ? निकालने को वो उचकी ही थी कि तभी "अरे! शन्नो जल्दी चल । सब छोड़ दे।" बाहर रफ़ीक चिल्ला रहे थे। "कहाँ मर गई ? जाने कौन सी कचौड़ी पका रही है… Continue

Added by Uma Vishwakarma on September 8, 2017 at 5:48pm — 6 Comments

घरोंदों को जलाया है किसी ने दोस्ती करके

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२

घरोंदों को जलाया है किसी ने दोस्ती करके 

चिरागों को बुझाया है किसी ने दोस्ती करके 

सुकूं था जिसके जीवन में जिसे आती थी मीठी नींद 

उसे शब् भर जगाया है किसी ने दोस्ती करके 

जो दुश्मन था जमाने से जो प्यासा था लहू का ही 

उसी को अब बचाया है किसी ने दोस्ती करके 

अँधेरे में मेरा साया हुआ कुछ इस तरह से गुम

ज्यूँ रिश्ता हर भुलाया है किसी ने दोस्ती करके 

फकीरों की तरह जीता, था खुश तन्हाई…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on September 8, 2017 at 5:27pm — 5 Comments

मुझे भी कुछ कहना है – लघुकथा -

 मुझे भी कुछ कहना है –  लघुकथा -

 "माँ, मुझे कुछ पल अकेला छोड़ दो। मुझे एकांत चाहिये"।

"ठीक है नीरू, पर तू अंधेरे में क्या कर रही है? तेरे दिमाग में कुछ ऐसा वैसा तो नहीं चल रहा"।

"माँ, आपकी बेटी इतनी कमजोर नहीं है"।

"मैं जानती हूँ। इसीलिये तो डर लगता है। तू यह लिखना छोड़ क्यों नहीं देती"?

"माँ, आप कैसी बात कर रहे हो? वह मेरी गुरू थी। मेरी आदर्श थी। उसे गोलियों से उड़ा दिया।  और मैं चुप हो कर बैठ जाऊँ। असंभव"।

"बेटी, मुझे तेरी जान की चिंता है। जिस काम…

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Added by TEJ VEER SINGH on September 8, 2017 at 11:06am — 10 Comments

है शिकायत दिल को ऐसा क्यूँ नहीं.....{.ग़ज़ल } संतोष

 अरकान : फ़ाइलातून   फ़ाइलातून  फ़ाइलुन  

है शिकायत दिल को ऐसा क्यूँ नहीं

जब तू मेरा है तो लगता क्यूँ नहीं



जब नज़र से मिल नहीं पाती नज़र

ख़्वाब से बाहर निकलता क्यूँ नहीं



लग रही है क्यूँ थमी दुनिया मुझे

तू भी मौसम सा बदलता क्यूँ नहीं



है ज़बाँ चुप और धड़कन तेज़ है

तू इशारों को समझता क्यूँ नहीं



जिस्म ठण्डा पड़ गया'संतोष'…

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Added by santosh khirwadkar on September 7, 2017 at 6:58pm — 14 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ५२

बहरे रमल मुसम्मन सालिम

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन: 2122 2122 2122 2122

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है जिगर में कुछ पहाड़ों सा, पिघलना चाहता है

मौसम-ए-दिल हो चुका कुहना बदलना चाहता है

 

छोड़कर सब ही गये ख़ाली है दिल का आशियाना 

अश्क़ बन कर तू भी आँखों से निकलना चाहता है

 

चोट खाकर दर्द सह कर बेदर-ओ-दीवार होकर

दिल तेरी नज़र-ए-तग़ाफ़ुल में ही जलना…

Continue

Added by राज़ नवादवी on September 7, 2017 at 5:30pm — 19 Comments

रंग बिरंगा हो गया हूँ

रंग बिरंगा हो गया हूँ,

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जैसे

कच्ची दोमट

मिट्टी का धेला

धीरे धीरे घुलता है

बारिस के पानी में

और पानी मटमैला मटमैला हो जाता है

मिट्टी की सोंधी सोंधी महक के साथ

बस ऐसी ही

तुम घुलती हो मुझमे

और घुलता जाता है

तुम्हारी आँखों की पुतली का

ये कत्थई रंग

सिर्फ आँखों का रंग ही क्यूँ

तुम्हारे काजल का गहरा काला

आँचल का आसमानी

गालों का गुलाबी

होंठो का मूँगिया

और तुम्हारी हंसी का दूधिया…

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Added by MUKESH SRIVASTAVA on September 7, 2017 at 4:39pm — 5 Comments

प्रेम-पचीसी-भाग 4 (प्रीत-पगे दोहे)

प्रेम-पचीसी--भाग 4(प्रीत-पगे दोहे)



पाप कहूँ किसको भला, किसको समझूँ पुन्न ।

मैं जानूँ इतनी गणित, तुम बिन जीवन सुन्न ।। ...1



तुम मोहन की बाँसुरी, मैं राधा का हास ।

साथ तुम्हारा जब मिले, जीवन हो इक रास ।। ...2



दर्शन दे दो साँवरे, तरस रहे हैं नैन ।

मर जाऊँ मैं चैन से, जीती हूँ बेचैन ।।...3



सुध-बुध जी की खो गई, जबसे लागा हेत ।

मैं इक मछली साँवरे, विरहा तपती रेत ।।...4



बरजा तो माना नहीं, अब रोवे दिन-रैन ।

नैन मिलाकर खो… Continue

Added by khursheed khairadi on September 7, 2017 at 12:48pm — 3 Comments

रहमतों से फ़ासला हो जाएगा

मत कहो हमसे जुदा हो जाएगा ।

वह मुहब्बत में फ़ना हो जाएगा ।।





इश्क के इस दौर में दिल आपका ।

एक दिन मेरा पता हो जाएगा ।।



धड़कनो के दरमियाँ है जिंदगी ।

धड़कनो का सिलसिला हो जाएगा ।।



इस तरह उसने निभाई है कसम ।

वह हमारा देवता हो जाएगा ।।



ऐ दिले नादां न कर मजबूर तू ।

वो मेरी ज़िद पर ख़फ़ा होजाएगा ।।



पत्थरो को फेंक कर तुम देख लो ।

आब का ये कद बड़ा हो जाएगा ।।



मत निकलिए इस तरह बे पैरहन ।

फिर चमन में हादसा… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 6, 2017 at 11:49pm — 8 Comments

ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/22)

उसको फिर वापस आना है ,
मुझको भी तो समझाना है ।

अब उसकी यादों से हरदम ,
अपने दिल को बहलाना है ।

दूर सदा जो रहते भाई ,
उनको घर वापस लाना है ।

नाम इसी का जीवन देखो ,
हर मुश्क़िल से टकराना है ।

इस दुनिया में सबसे प्यारा ,
अब भारत देश बनाना है ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on September 6, 2017 at 9:55pm — 8 Comments

आज की बेटी (क्षणिकाएं या अतुकान्त) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

पापा की बेटी

या

बाबा की बेटी।



देश की बेटी

या

वेश में बेटी।



स्वतंत्र बेटी

या

क़ैद में बेटी।



हेर-फेर में बेटी

या

डेरे-फेरे में बेटी।



हाथ बंटाती बेटी

या

'हाथ की सफाई' में बेटी।



गौरवशाली बेटी

या

कलंककारी बेटी।



उठती, उड़ती बेटी

या

उठाती, उड़ाती बेटी।



चौंकती बेटी

या

चौंकाती बेटी।



जीतती, जीती बेटी

या

हारती, मरती… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 6, 2017 at 9:09pm — 5 Comments

गैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल..मेरे दीदा ए नम में तू ही तू-बृजेश कुमार 'ब्रज'

गैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल
2122 1212 22
तेरी आँखें ज़हान की खुशबू
मेरे दीदा ए नम में तू ही तू

गीत ग़ज़लों में तू नुमायाँ है
तेरा ही चर्चा नज़्म में हर सू

याद किसकी शुरुर है किसका
किसलिये आँखों से रवां आँसू

तेरी जुल्फों की खुशबुएँ लेकर
कोई झोंका सबा का जाये छू

धर्म मजहब से ये हुआ हासिल
जल रहे हैं बशर यहाँ धू धु

राज है 'ब्रज' तेरी उदासी में
बेसबब आज फिर बहे आँसू
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 6, 2017 at 3:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल

2122 1212 22

अब सुनाओ भी फैसला हमको।
जुर्म की दो कोई सज़ा हमको।

तुमको चाहा गुनाह था भारी,
खूब महँगी पड़ी वफ़ा हमको।

सोचते हैं कि अब किधर जाएँ,
रास्ता तो कोई दिखा हमको।

कुछ मुरव्वत जरा दिखा हम पर,
हर दफा तो न आजमा हमको।

हम वो हैं जो कभी नहीं टूटे,
चाहे जी भर के तू सता हमको।

मंजूषा मन

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by मंजूषा 'मन' on September 6, 2017 at 11:19am — 6 Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल

अब सुनाओ भी फैसला हमको।
जुर्म की दो कोई सज़ा हमको।

तुमको चाहा गुनाह था भारी,
खूब महँगी पड़ी वफ़ा हमको।

सोचते हैं कि अब किधर जाएँ,
रास्ता तो कोई दिखा हमको।

कुछ मुरव्वत जरा दिखा हम पर,
हर दफा तो न आजमा हमको।

हम वो हैं जो कभी नहीं टूटे,
चाहे जी भर के तू सता हमको।

मंजूषा मन

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by मंजूषा 'मन' on September 6, 2017 at 11:17am — 2 Comments

मुझे हिन्दू, उसे मुसलमान रहने दो!

दिल में प्यार

आँखों में सम्मान रहने दो

मंदीर की आरतियों संग

मस्जिद की अज़ान रहने दो

क्यों लड़ना धर्म के नाम पर

क्यों बेकार में खून बहाना

मज़हब के मोहल्लों में

इंसानों के मकान रहने दो

मुझे हिन्दू, उसे मुसलमान रहने दो!

माना सब एक ही हैं

पर थोड़ी अलग पहचान रहने दो

अगरबत्तियों की ख़ुशबू संग

थोडा लोहबान रहने दो

चढाने दो उसको चादरें

मुझे चढाने दो चुनरियाँ

दोनों मज़हब तो सिखाते हैं प्रेम ही

तो थोड़ी गीता थोडा क़ुरान…

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Added by Ranveer Pratap Singh on September 5, 2017 at 10:59pm — 5 Comments

घर के टीचर (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

हल्कू ने बहुत दिनों बाद अपने बेटे कल्लू की पढ़ाई-लिखाई संबंधित पूछताछ करते हुए उससे अगला सवाल किया- "तुम्हारे इंग्लिश टीचर कौन हैं!"



कल्लू : "वो तो हमारे नसीब में नहीं हैं!"



हल्कू : "क्या कहा?"



कल्लू : "सच कहा। हमें केवल इंडियन टीचर ही पढ़ाते हैं!"



हल्कू : "अबे, मैं अंग्रेज़ी के बारे में पूछ रहा हूं!"



कल्लू : "लेकिन मैंने तो आपके हाथ में केवल देसी देखी है, क्या अब आप अंग्रेज़ी भी लेने लगे?"



हल्कू : " अबे, मैं दारू की नहीं,… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 5, 2017 at 7:39pm — 7 Comments

ग़ज़ल ( हाए वो शख़्स निकलता है सितमगर यारो )

ग़ज़ल ( हाए वो शख़्स निकलता है सितमगर यारो )

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(फाइलातुन -फइलातुन -फइलातुन -फेलुन )



मुन्तखिब करता है दिल जिसको भी दिलबर यारो |

हाए वो शख़्स निकलता है सितम गर यारो |

उनके चहरे से नज़र हटती नहीं है मेरी

किस तरह देखूं ज़माने के मैं मंज़र यारो |

कूचए यार से जाएँ तो भला जाएँ कहाँ

राहे उलफत में लुटा बैठे हैं हम घर यारो |

आस्तीनों में जो रखते हैं…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on September 5, 2017 at 6:14pm — 17 Comments

जब तू मिरा है .....,संतोष

जब तू मिरा है तो अपना लगता क्यूँ नहीं

दिल के आइने में साफ़ दिखता क्यूँ नहीं



अब नज़रें मिलती ही नहीं तिरी नज़रों से,

हसीन ख़्वाबों से फिर निकलता क्यूँ नहीं



दुनियाँ मुझे अब क्यूँ थमी सी लगती है

तू भी मौसम सा कुछ बदलता क्यूँ नहीं



ज़बां चुप और धड़कन भी तेज़ है ज़रा

तू नज़रों के इशारे समझता क्यूँ नहीं



ये जिस्म सर्द है बर्फ़ के मानिन्द'संतोष'

तू रगों में गर्म लहू सा दौड़ता क्यूँ नहीं



#संतोष खिरवड़कर

(मौलिक एवं… Continue

Added by santosh khirwadkar on September 5, 2017 at 5:30pm — 6 Comments

तुम ही बताओ न ...

तुम ही बताओ न ...

क्या हुआ

हासिल

फासलों से

आ के ज़रा

तुम ही बताओ न

इक लम्हा

इक उम्र को

जीता है

ख़ामोशियों के

सैलाब पीता है

उल्फ़त के दामन पे

हिज़्र की स्याही से

ये कैसी तन्हाई

लिख डाली

आ के

ज़रा

तुम ही बताओ न

ये किन

आरज़ूओं के अब्र हैं

जो रफ्ता रफ़्ता

पिघल रहे हैं

एक लावे की तरह

चश्मे साहिल से

क्यूँ हर शब्

तेरी…

Continue

Added by Sushil Sarna on September 5, 2017 at 5:30pm — 8 Comments

तुम ही बताओ न ...

तुम ही बताओ न ...

क्या हुआ

हासिल

फासलों से

आ के ज़रा

तुम ही बताओ न

इक लम्हा

इक उम्र को

जीता है

ख़ामोशियों के

सैलाब पीता है

उल्फ़त के दामन पे

हिज़्र की स्याही से

ये कैसी तन्हाई

लिख डाली

आ के

ज़रा

तुम ही बताओ न

ये किन

आरज़ूओं के अब्र हैं

जो रफ्ता रफ़्ता

पिघल रहे हैं

एक लावे की तरह

चश्मे साहिल से

क्यूँ हर शब्

तेरी…

Continue

Added by Sushil Sarna on September 5, 2017 at 5:30pm — No Comments

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