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ग़ज़ल

221 1222 22 221 1222 22

गुज़री है मेरे दिल पर क्या क्या अब हिज्र का आलम पूछ रहे ।।

मालूम तुम्हें जब गम है मेरा क्यूँ आंखों का पुरनम पूछ रहे ।।1

इक आग लगी है जब दिल में चहरे पे अजब सी बेचैनी ।

इकरारे मुहब्बत क्या होगी ये बात वो पैहम पूछ रहे ।।2

कुछ फ़र्ज़ अता कर दे जानां कुछ खास सवालातों पर अब ।

होठों पे तबस्सुम साथ लिए जो वस्ल का आगम पूछ रहे ।।3

हालात मुनासिब कौन कहे जलती है जमीं जलता भी है…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 3, 2019 at 12:30am — 3 Comments

कुण्डलिया छंद-

1-

राह  बताते  और  को, स्वयं  लाँघते  भीत।

जग का यही विधान है,यही आज की रीत।।

यही  आज की  रीत, सभी को प्रवचन देते।

लेकिन  वही  प्रसंग, अमल में कभी न लेते।।

खुद   करते   पाखंड,  दूसरों  को  भरमाते।…

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Added by Hariom Shrivastava on May 2, 2019 at 11:01pm — 6 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
तीन मुक्तक // - सौरभ

सितारे-चाँद, अच्छे दिन, ऋणों की बात जपनी है

सजा कर बेचना है स्वप्न ये पहचान छपनी है

बनाते हम बड़ी बातें तथा जुमले खपाते हैं

सियासत तुम समझते हो मगर दूकान अपनी है 

 

जिन्हें तो चिलचिलाती धूप का अनुभव नहीं होना

कभी हाथों जिन्हें सामान कोई इक नहीं ढोना

जिन्हें ज़ेवर लदी उड़ती-मचलती औरतों का साथ

वही मज़दूर-मेहनत औ’ ग़मों का रो रहे रोना 

 

सियासत की, धमक से औ’ डराया ख़ूब अफ़सर भी

लिखा है पत्रिका में इंकिलाबी लेख जम कर भी

उठा कर…

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Added by Saurabh Pandey on May 2, 2019 at 7:30pm — 14 Comments

मृगतृष्णा-लघुकथा

"देखो आज का अखबार, एक लड़के ने जिसे कोई भी सहूलियत हासिल नहीं थी, राज्य सेवा परीक्षा उत्तीर्ण कर ली. जिसे करना होता है ना, वह लैंप पोस्ट की रौशनी में भी पढ़ लेता है", पिताजी आज फिर उबल रहे थे. इस बार भी राकेश असफल हो गया, वह खुद बहुत उदास था.

"लक्ष्य तो निर्धारित करते नहीं ठीक से, बस साधनों का रोना रोते रहोगे. मुझे लगता था कि मेरे रिटायर होने से पहले मैं भी सुनूंगा कि एक बाबू का लड़का बड़ा अधिकारी बन गया. लेकिन जनाब को तो कोई मतलब ही नहीं है इन सब से", अभी तक उनका बड़बड़ाना जारी था.

पहले…

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Added by विनय कुमार on May 2, 2019 at 5:45pm — 6 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
अभी अभी बस

अभी-अभी 

उतरी आँगन में 

धूप गुनगुनी, 

अभी-अभी 

खोले हैं 

सपनों की तितली ने पर,

अभी-अभी 

खुद सोनपरी नें 

रची रंगोली,

अभी-अभी 

बस ओस 

गुलाबी पंखुड़ियों पर 

आ ठहरी है, 

अभी-अभी 

फूटा है अंकुर 

हरसिंगार का,

अभी-अभी 

सीपी में दमका है इक मोती,

अभी-अभी नन्हे चूजे नें 

पकड़ कवच 

झाँका है अम्बर,

अभी-अभी 

एक नम सी बदली 

संग हवा के बह आई…
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Added by Dr.Prachi Singh on May 2, 2019 at 10:00am — 6 Comments

हस्ताक्षर....एक क्षणिका....

हस्ताक्षर....एक क्षणिका....

स्वरित हो गए
नयन
अंतर्वेदना की वीचियों से
वाचाल हुए
कपोल पर
मूक प्रेम के
खारे
हस्ताक्षर

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशसित

Added by Sushil Sarna on May 1, 2019 at 8:11pm — 4 Comments

महाभुजंगप्रयात छंद में मेरी तृतीय रचना

खड़ा आपके सामने हाथ जोड़े, लिए स्नेह आशीष की कामना को
करूँ शिल्पकारी सदा छंद की मैं, न छोड़ूँ नवाचार की साधना को
लिखूँ फूल को भी लिखूँ शूल को भी, लिखूँ पूर्ण निष्पक्ष हो भावना को
कभी भूल से भी नहीं राह भूलूँ, लिखूँ मैं सदा राष्ट्र की वेदना को

शिल्प -यगण ×8

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by नाथ सोनांचली on May 1, 2019 at 6:38pm — 6 Comments

कस्तूरी यहाँँ, वहाँँ, कहाँ (लघुकथा)

स्थानीय पार्क में शाम की चहल-पहल। सभी उम्र के सभी वर्गो के लोग अपनी-अपनी रुचि और सामर्थ्य की गतिविधियों में संलग्न। मंदिर वाले पीपल के पेड़ के नीचे के चबूतरे पर अशासकीय शिक्षकों का वार्तालाप :

"हम टीचर्ज़ तो कोल्हू के बैल हैं! मज़दूर हैं! यहां आकर थोड़ा सा चैन मिल जाता है, बस!" उनमें से एक ने कहा।

"महीने में हमसे ज़्यादा तो ये अनपढ़ मज़दूर कमा लेते हैं! अपन तो इनसे भी गये गुजरे हैं!" दूसरे ने मंदिर के पास पोटली खोलकर भोजन करते कुछ श्रमिकों को देख कर कहा।

उन दोनों को कोल्ड-ड्रिंक्स…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 1, 2019 at 5:32pm — 3 Comments

ये दिल.....

ये दिल..... 

फिर

धोखा दे गया

धड़क कर

ये दिल

वादा किया था

ख़ुद से

टुकड़े

ख़्वाबों के

न बीनूँगा मैं

सबा ने दी दस्तक

लम्स

यादों के

जिस्म से

सरगोशियाँ करने लगे

भूल गया

खुद से किया वादा

बेख़ुदी में

खा गया धोखा

किसी की करीबी का

भूल गया हर कसम दिल

डूब गया

सफ़ीना यादों का

बेवफ़ा

हो गया साहिल



लाख

पलकें बंद कीं

बुझा दिए चराग़

तारीकियों में…

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Added by Sushil Sarna on May 1, 2019 at 3:53pm — 8 Comments

कुण्डलिया छंद-. [अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के उपलक्ष्य में]

खेती में घाटा हुआ, कृषक हुए मजबूर।

क्षुधा मिटाने के लिए, बने आज मजदूर।।

बने आज मजदूर, हुए खाने के लाले।

चले गाँव को छोड़, घरों में डाले ताले।।

खाली है चौपाल, गाँव में है सन्नाटा।

फाँसी चढ़े किसान, हुआ खेती में घाटा।।

2-

बिकने को बाजार में, खड़ा आज मजदूर।

फिर भी देश महान है, उनको यही गुरूर।।

उनको यही गुरूर,नहीं अब रही गरीबी।

वह खुद हुए धनाड्य,साथ में सभी करीबी।।

नेता शासक वर्ग, सभी लगते घट चिकने।

लेते आँखें मूँद, खड़ा है मानव…

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Added by Hariom Shrivastava on May 1, 2019 at 3:11pm — 8 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ९४

जनाब अहमद फराज़ साहब की ज़मीन पे लिखी ग़ज़ल



221 1221 1221 122



बुझते हुए दीये को जलाने के लिए आ

आ फिर से मेरी नींद चुराने के लिए आ //१



दो पल तुझे देखे बिना है ज़िंदगी मुश्किल

मैं ग़ैर हूँ इतना ही बताने के लिए आ //२



तेरे बिना मैं दौलते दिल का करूँ भी क्या

हाथों से इसे अपने लुटाने के लिए आ //३



तेरा ये करम है जो तू आता…

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Added by राज़ नवादवी on May 1, 2019 at 12:00am — 9 Comments

ग़ज़ल _वो कुछ न इसके सिवा करेंगे

ग़ज़ल _(वो कुछ न इसके सिवा करेंगे)

(मफा इला तुन _मफा इला तुन)

वो कुछ न इसके सिवा करेंगे l

बना के अपना दगा करेंगे l

किसी से हो जाए उनको उलफत

यही ख़ुदा से दुआ करेंगे l

सितम जफ़ा जिनकी ख़ास फितरत

वो कह रहे हैं वफ़ा करेंगे l

कभी हमें आज़मा के देखो

ये दिल है क्या जाँ फिदा करेंगे l

नज़र पे पहरे अगर लगे तो

खयाल में हम मिला करेंगे l

लगा के इलज़ामे बे…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on April 30, 2019 at 1:14pm — 6 Comments

अपनी ज़ुल्फों को धो रही है शब - सलीम रज़ा रीवा

2122 1212 22

अपनी ज़ुल्फों को धो रही है शब

और ख़ुश्बू निचो रही है शब

oo

मेरे ख़ाबों की ओढ़कर चादर

मेरे बिस्तर पे सो रही है शब

oo

अब अंधेरों से जंग की ख़ातिर

कुछ चराग़ों को बो रही है शब

oo

सुब्ह--नौ के क़रीब आते ही

अपना अस्तित्व खो रही है शब

oo

दिन के सदमों को सह रहा है दिन

रात का बोझ ढो रही है शब

___________________

"मौलिक व…

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Added by SALIM RAZA REWA on April 29, 2019 at 10:51am — 6 Comments

सजती चुनाव में यहाँ जब तस्तरी बहुत - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/२२२/१२१२



सजती चुनाव  में  यहाँ  जब  तस्तरी बहुत

फिर भी बढ़े है रोज क्यों ये भुखमरी बहुत।१।



उतरा न मन का मैल जो सियासत ने भर दिया

दे कर  भी  हमने  देख  ली  है  फ़िटकरी बहुत।२।



अब खेल वो दिखाएगी उसको चुनाव में

जनता से जिसने है करी बाज़ीगरी बहुत।३। 



नेता न आया  एक  भी  सेवा  की राह पर

लोगों ने कह के देख ली खोटी खरी बहुत।४।



क्या होगा उनके राज का जनता बतायेगी

करते सदन में जो रहे गत मशखरी बहुत।५।



आता…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 28, 2019 at 7:04pm — 11 Comments

महाभुजंगप्रयात छंद में मेरी दूसरी रचना

धरें वेशभूषा तपस्वी सरीखा, जियें किन्तु जो ऐश की जिंदगानी
सने हाथ हैं खून से भी उन्हीं के, सदा बोलते जो यहाँ छद्म बानी
पता ही नहीं मूल क्या ज़िन्दगी का, लगे एक सा जिन्हें आग पानी
उन्हें आप यूँ ही मनस्वी न बोलो, जुबाँ से भले वे लगें आत्म ज्ञानी।।

शिल्प -यगण ×8

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by नाथ सोनांचली on April 28, 2019 at 2:36pm — 6 Comments

गज़ब करता है अय्यारी.......तरही ग़ज़ल

1222 1222 1222 1222

गज़ब करता है अय्यारी ज़माने से ज़माना भी

हक़ीक़त जो है इस पल में है कल का वो फ़साना भी

न मानो तो सकल संसार है इक शै महज़, लेकिन

हर इक शै ज्ञान का खुद में है अतुलित इक खज़ाना भी

बहुत अलगाव का परचम उठाए फिर लिए यारों

समय कहता है आवश्यक हुआ सबको मिलाना भी

उन्होंने पूछा उसको किस लिए फ़िलवक्त चुप है वो

समंदर हौले से बोला है इक तूफाँ उठाना भी

बहाते नीर हो क्यूँकर, जो बादल से कहा…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 28, 2019 at 2:30pm — 4 Comments

दो क्षणिकाएं : ....

दो क्षणिकाएं : ....

नैन पाश में
सिमट गयी
वो
बनकर एक
एक भटकी सी
खुशबू
और समा गई
मेरी

अदेह देह में

..........................

जल पर पड़ी
जल
सूखने लगा
पेड़ों पर पड़ी
पेड़ सूखने लगा
जीवों पर पड़ी
तो कंठ सूखने लगा
तृप्ती की आस में
अंततः
साँझ की गोद में
तृषित ही
सो गई
धूप

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on April 28, 2019 at 1:58pm — 4 Comments

मौजूँ मत

मौजूँ मत

राजनीति की दूषित दरिया,मिलकर स्वच्छ बनाएं

मतदाता परिपक्व हृदय से,अपना फर्ज निभाएं ll

माननीय बन वीर बहूटी,नित नव रूप दिखाएं

ये बर्राक करें बर्राहट ,इनको सबक सिखाएं ll

किरकिल सा बहुरूप बदलते,झटपट चट कर जाते

ये बरजोर करें बरजोरी, खाकर नहीं अघाते ll

वक्त आ गया समझाने का,अब इनको मत छोड़ो

सेवक नहीं बतोला बनजी, दोखी दंश मरोड़ो.ll

हर मत की कीमत को समझें,है मतदान जरूरी

बूथों पर मौजूँ मत करके, इच्छा…

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Added by डॉ छोटेलाल सिंह on April 28, 2019 at 1:14pm — 5 Comments

ये पब्लिक है? (लघुकथा)

"सच कहूं! मुझे भी पता नहीं था कि मेरी अग्नि से मिट्टी के आधुनिक चूल्हे पर चढ़ी एक साथ चार हांडियों में मनचाही चीज़ें एक साथ पकाई जा सकती हैं!"



"तो तुम्हारा मतलब हमारे मुल्क की मिट्टी में आज़ादी के चूल्हे पर लोकतंत्र के चारों स्तंभों की हांडियां एक साथ चढ़ा कर मनचाही सत्ता चलाने से है ... है न?"



"तो तुम समझ ही गये कि इस नई सदी में तुम्हारे मुल्क में मेरी ही आग कारगर है; फ़िर तुम इसे चाहे जो नाम दो : धर्मांधता, तानाशाही, सामंतवाद, भ्रष्टाचार, भय या तथाकथित हिंदुत्व…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 28, 2019 at 9:36am — 2 Comments

साहिलों पर .... (लघु रचना )

साहिलों पर .... (लघु रचना )

गुफ़्तगू
बेआवाज़ हुई
अफ़लाक से बरसात हुई
तारीकियों में शोर हुआ
सन्नाटे ने दम तोड़ा
तड़प गयी इक मौज़
बह्र-ए-सुकूत में
और
डूब गए सफ़ीने
अहसासों के
लबों के
साहिलों पर

(अफ़लाक=आसमानों )

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on April 27, 2019 at 5:41pm — 4 Comments

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