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लोक कथाएँ "कुछ" कहती हैं

उषा अवस्थी

लोक कथाएँ "कुछ" कहती हैं

भाव भरे, विभिन्न रस सिंचित

वह जीवन को गहती हैं

जुड़े रहें सम्बन्ध आपसी

प्रेम प्रगाढ़ विरचती हैं

परिवारों के रिश्ते-नाते

नेह- स्वरों से भरती हैं

प्रीति- पगे सुन्दर वचनो से

हो उत्फुल्ल गमकती हैं

सामाजिक समरसता के 

शुभ ताने-बाने बुनती हैं

लोक -कथाएँ "कुछ" कहती हैं

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on December 10, 2022 at 7:17pm — 2 Comments

व्यवस्था के नाम पर

कोई रोए, दुःख में हो बेहाल

असहाय, असुरक्षित, अभावग्रस्त

टोटा संगी-साथी, हो कती कंगाल

अत्याचार, अव्यवस्था से त्रस्त

किसी को क्या फर्क पड़ता है ।



यहां-वहां घूमे, दुःख के आंसू पीए

गिड़गिड़ाए, झुके, करे…

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Added by आचार्य शीलक राम on December 8, 2022 at 8:00pm — 1 Comment

ग़ज़ल - मैं अँधेरी रात हूंँ और शम्स के अनवर-से आप

2122 2122 2122 212

मैं अँधेरी रात हूंँ और शम्स के अनवर-से आप

शाम-सी मुझ में उदासी, सुब्ह के मंज़र-से आप

जाने कैसे मिलना होगा अपना इक मे'यार पर

मैं ज़मीं की ख़ाक-सी हूंँ चर्ख़ के मिम्बर-से आप

जो भी आया चल दिया वो मुझ से हो कर आप तक

मैं अधूरी रहगुज़र हूँ और मुकम्मल घर-से आप

क्यों पसंद आये किसी को भी कभी होना मेरा

मैं कि अनचाही सी बेड़ी क़ीमती ज़ेवर-से आप

आपके बिन इस जहांँ में कुछ…

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Added by Anjuman Mansury 'Arzoo' on December 8, 2022 at 6:00pm — 13 Comments

गीत -६ ( लक्ष्मण धामी "मुसाफिर")

रूठ रही नित गौरय्या  भी, देख प्रदूषण गाँव में।

दम घुटता है कह उपवन की, छितरी-छितरी छाँव में।।

*

बीते युग की बात हुए हैं

घास-फूँस औ' माटी के घर।

सूने - सूने, फीके - फीके

खेतों खलिहानों के मञ्जर।।

*

अन्तर जैसे पाट दिया है, आज नगर औ' गाँव में।

दम घुटता है अब उपवन की, छितरी-छितरी छाँव में।।

*

शेष हुए हैं देशी व्यञ्जन,

और  विदेशी  रीत  हुए।

तीजों - त्यौहारों से गायब,

परम्परा  के  गीत हुए।।

*

लगता  जैसे  आन  बसे  हों, किसी  विदेशी …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 8, 2022 at 6:45am — 6 Comments

ग़ज़ल - अभी बस पर ही टूटे हैं अभी अंबर नहीं टूटा

1222 1222 1222 1222

अभी बस पर ही टूटे हैं अभी अंबर नहीं टूटा

परिंदा टूटा है बाहर अभी अंदर नहीं टूटा /1

सितारा यूंँ तो टूटा है मेरी तक़दीर का लेकिन

ख़ुदा का शुक्र है तदबीर का अख़्तर* नहीं टूटा /

हमारे ख़ैर ख़्वाहों ने बहुत चाहा मगर अब तक

हमारे दिल में है उम्मीद का जो घर नहीं टूटा /3

सियासत के सताने पर भी बोला जो हमेशा सच

वो जाने कैसी मिट्टी का है ज़र्रा भर नहीं टूटा /4

कई मख़्लूक़* की है ज़िंदगी…

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Added by Anjuman Mansury 'Arzoo' on December 6, 2022 at 10:13pm — 3 Comments

नर हूँ ना मैं नारी हूँ

नर हूँ ना मैं नारी हूँ, लिंग भेद पर भारी हूँ

पर समाज का हिस्सा हूँ मैं, और जीने का अधिकारी हूँ

 

जो है जैसा भी है रुप मेरा, मैंने ना कोई भेष धरा

अपने सांचें मे कसकर हीं, ईश्वर ने मेरा रुप गढ़ा 

माँ के पेट से जन्म लिया, जब पिता ने मुझको गोद लिया

मेरी शीतल काया पर ही, शीतल मेरा नाम दिया

 

जैसे-जैसे मैं…

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Added by AMAN SINHA on December 5, 2022 at 1:26pm — 1 Comment

तिनका तिनका टूटा मन(गजल) - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२/२२/२२/२



सोचा था हो बच्चा मन

लेकिन पाया  बूढ़ा मन।१।

*

नीड़  सरीखा  आँधी  में

तिनका तिनका टूटा मन।२।

*

किस दामन को भाता है

सारी  रात  बरसता  मन।३।

*

तन की मंजिल पास हुई

मीलों  लम्बा  रस्ता  मन।४।

*

शूल चुभा  सब  कहते हैं

मत रख पत्थर जैसा मन।५।

*

पीर  अगर  नाचे आँगन में

तब किसका घर होगा मन।६।

*

कहकर कितना रोयें अब

दुख में भी मुस्काता मन।७।

*…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 3, 2022 at 8:00am — 9 Comments

ग़ज़ल - हैं ख़ाक फिर भी उठाकर जो सर खड़े हैं पहाड़

1212 1122 1212 22/112

हैं ख़ाक फिर भी उठाकर जो सर खड़े हैं पहाड़

तो हौसला रखो क्या हमसे भी बड़े हैं पहाड़ /1

है इनके दिल में नदी-सी बड़ी नमी लेकिन

मुग़ालता* है कि वालिद-से ही कड़े हैं पहाड़़/2 

पहाड़ कह के कोई तंज़ गर करे इन पर

तो आबशार बने अश्क से झड़े हैं पहाड़ /3

पहाड़ जैसी मुसीबत उठा के हम यूंँ चले

कि हम को देखते ही शर्म से गड़े हैं पहाड़ /4

हम अपने पैर गँवा कर भी चढ़ गए इन पर

हमारे जैसे…

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Added by Anjuman Mansury 'Arzoo' on December 2, 2022 at 8:13pm — 6 Comments

मौन

              मौन

                          आचार्य शीलक राम

सरल-सहज है तुम्हारी सूरत

देवलोक की जैसे कोई मूरत

मूरत होकर भी अमूर्त लगती…

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Added by आचार्य शीलक राम on December 1, 2022 at 9:31pm — 1 Comment

स्वप्न अधूरे

स्वप्न अधूरे, भूखा पेट

होने को है, मटियामेट

कड़ी मेहनत, कड़े प्रयास

फिर भी बची न कोई आस।1

अनगिनत ग्रंथ, आंखें फोड़ी

मम जीवन, सम फूटी कौड़ी

सब कुछ किया, व्यर्थ जा रहा

कौन दुःख, मैंने न सहा । 2

देर तक पढ़ना, ऊंचे अंक

बेरोजगारी के, फंसा हूं पंक

कर्म का नियम, बना है निष्फल

हर पैड़ी पर, हुआ हूं असफल ।3

ऊंची-ऊंची, उपाधि अर्जित

अभिनव किया, बहुत कुछ सृजित

फिर भी यहां, नकारा बना हूं

अभाव, दुःखों से, कती सना हूं । 4

घर बैठा हूं,…

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Added by आचार्य शीलक राम on December 1, 2022 at 9:30pm — No Comments

गजल -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

१२२२/ १२२२/१२२२

*

कठिन जैसे नगर में धूप के दर्शन

हमें  वैसे  तुम्हारे  रूप  के  दर्शन।१।

*

कभी वो नीर का साधन रहा होगा

मगर होते नहीं अब कूप के दर्शन।२।

*

सुना है नृत्य  करते  हैं तेरे आँगन

बहुत दुर्लभ हमें तो भूप के दर्शन।३।

*

कभी थोथा उड़ा कर सार गहते थे

नये युग  में  गुमें  हैं  सूप  के दर्शन।४।

*

जलन दूजे  से  होती  हो  जहाँ बोलो

किसी मुख पर हो कैसे ऊप के दर्शन।५।

*

यहाँ रूठी हुई छत नींव बागी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 1, 2022 at 12:30pm — 6 Comments

"बारहमासा"

"बारहमासा"

"चैत्र" मे चित चिंतित, चंचल चहु चकोर।

प्रिया बिन सब सूना लगे, ना सुझे कौर॥

"वैशाख" वैरी विष समान, वल्लरी बन विलगाय।

दोबारा फूल खिलेंगे तभी, अनुकूल रितु को पाय॥…

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Added by आचार्य शीलक राम on November 30, 2022 at 9:00pm — 4 Comments

दीप कोई तो जलाये शाम के (गजल) - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

2122/2122/212
*
हर तरफ झण्डे गढ़े हैं नाम के
पर नहीं हैं आदमी वो काम के।1।
*
वोट खातिर पैर पकड़े जिसने भी
वो हुए ना  एक  पल भी आम के।2।
*
नाम पर उन के मचाते लूट सब
कौन चलता है यहाँ पथ राम के।3।
*
लोक ने अनमोल आँका था जिन्हें
आज देखो वो बिके बिन दाम के।4।
*
क्या ता भटका हुआ लौटे कोई
दीप  कोई  तो  जलाये  शाम  के।5।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 30, 2022 at 8:12am — 6 Comments

गजल-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२/२१२/२१२/२१२

*

राह में शूल अब  तो  बिछाने लगे

हाथ दुश्मन से साथी मिलाने लगे।१।

*

जो अघाते न थे कह सहारे हमी

गाल वो भी दुखों में बजाने लगे।२।

*

दुश्मनों की जरूरत हमें अब कहाँ

जब स्वयं को स्वयं ही मिटाने लगे।३।

*

हाथ सबका ही तोड़े यहाँ फूल को

सोच माली  भी  काँटे  उगाने लगे।४।

*

बात उसको बता कर्म की साथिया

सेज सपनों की जो भी सजाने लगे।५।

*

वोट पाने की खातिर कभी रोये…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 28, 2022 at 11:30pm — 6 Comments

जा रे-जा रे कारे काग़ा

जा रे-जा रे कारे कागा मेरे छत पर आना ना 

आना है तो आजा पर छत पर शोर मचाना ना 

तू आएगा छत पर मेरे कांव-कांव चिल्लाएगा 

ना जाने किस अतिथि को मेरे घर बुलाएगा 

उल्टी पड़ी पतीली मेरी और चूल्हे में आंच नहीं 

थाल सजाऊँ कैसे मैं घर में…

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Added by AMAN SINHA on November 28, 2022 at 4:44pm — 4 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
अक्सर मुझसे पूछा करती.... डॉ० प्राची

सपनों में भावों के ताने-बाने बुन-बुन

अक्सर मुझसे पूछा करती...

बोलो यदि ऐसा होता तो फिर क्या होता ?... और मौन हो जाता था मैं !

 

उसकी एक हँसी पर जैसे

अपने दोनों पंख पसारे,

ढेरों हंस उड़ा करते थे

बहती निर्मल नदी किनारे,

सतरंगी आँखों में बाँधे पूरा फाल्गुन

अक्सर मुझसे पूछा करती...

अगर न मिल पाते हम-तुम तो फिर क्या होता ?... और कहीं खो जाता था मैं !

 

मन-जीवन की सारी उलझन

यहाँ-वहाँ की अनगिन…

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Added by Dr.Prachi Singh on November 28, 2022 at 2:30am — 7 Comments

3 (गज़ल) रात भर

फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन

बह्र - 212 212 212 212

गीत बुलबुल सुनाती रही रात भर

दिलरुबा को रिझाती रही रात भर

भाव ही नींद खाती रही रात भर

उसको मैं बस मनाती रही रात भर

ज़िंदगी से सुना गीत जो सारा दिन

उसको मैं गुनगुनाती रही रात भर

उनकी दिलकश अदा और दीवानगी

सोच मैं मुस्कुराती रही रात भर

तेरी पहली छुअन याद करके सनम

मन ही मन मैं लजाती रही रात भर

चाँद तकने दिया भूख ने कब…

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Added by Rakhee jain on November 27, 2022 at 3:00pm — 5 Comments

अहसास की ग़ज़ल:मनोज अहसास

2122    2122     2122     212

पीर को,अनुराग को, पछतावे को, संताप को।

छोड़कर कैसे चलूँ, मुश्किल में,अपने आप को।

मन घिरा है वासना में,और मर्यादा में तन,

अर छुपाना भी कठिन है,उबले जल की भाप को

अब यहाँ से वापसी का रास्ता कोई नहीं,

मुश्किलों से पँहुचे हो,समझाओ अपने आपको।

मेघ ऐसे घिर गए हैं सूर्य धूमिल हो गया,

कामनाओं की नदी पर चाहती है ताप को।

हमको खुद को दर्द देने के बहाने चाहिए,

सौ सबब*…

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Added by मनोज अहसास on November 25, 2022 at 5:14pm — 6 Comments

अगर हक़ीक़त में प्यार था तो सनम हमारे मज़ार जाएँ (137)

एक परम्परागत ग़ज़ल ( 121 22 *4 )
अगर हक़ीक़त में प्यार था तो सनम हमारे मज़ार जाएँ
कि आरज़ू है अक़ीदतों का वो सबसे पहले दिया जलाएँ
**
अगर अभी तक है याद बाक़ी तो इल्तज़ा है करें इनायत
हिना लगाकर वो दस्त-ओ-पा पर हमारा रोज़-ए-फ़ना मनाएँ
**
हमारी ख़ातिर दुआ न मांगें कि जन्नतें हों हमें भी हासिल
वतन में अम्न-ओ-सुकूँ की…
Continue

Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on November 24, 2022 at 6:30pm — 4 Comments

गजल -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२२

*

मत कहो अब मन खँगाला जा रहा है

इस वतन से  बस  उजाला जा रहा है ।१।

*

फिर दिखेगा मौत का मन्जर वृहद ही

कह सुधा नित विष उबाला जा रहा है।२।

*

आसमाँ को बाँटने की हो न साजिस

जो भी नारा अब उछाला जा रहा है।३।

*

हस्र क्या होगा उन्हें भी ज्ञात होगा

जानकर जब साँप पाला जा रहा है।४।

*

बँट रहा नित किन्तु सब के पेट खाली

पास किस के फिर निवाला जा रहा है।५।

*

मान मर्दन के…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 23, 2022 at 9:33pm — 4 Comments

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