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दीप कोई तो जलाये शाम के (गजल) - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

2122/2122/212
*
हर तरफ झण्डे गढ़े हैं नाम के
पर नहीं हैं आदमी वो काम के।1।
*
वोट खातिर पैर पकड़े जिसने भी
वो हुए ना  एक  पल भी आम के।2।
*
नाम पर उन के मचाते लूट सब
कौन चलता है यहाँ पथ राम के।3।
*
लोक ने अनमोल आँका था जिन्हें
आज देखो वो बिके बिन दाम के।4।
*
क्या पता भटका हुआ लौटे कोई
दीप  कोई  तो  जलाये  शाम  के।5।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

Views: 359

Comment

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Comment by Ravi Shukla on December 20, 2022 at 1:33pm

आदरणीय लक्ष्मण जी  ग़ज़ल  के लिये बधाई स्वीकार करें I 

Comment by Ravi Shukla on December 20, 2022 at 1:33pm

आदरणीय लक्ष्मण  जी  ग़ज़ल पर बधाई स्वीकार करें I 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 13, 2022 at 7:17am

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार।

Comment by Samar kabeer on December 12, 2022 at 2:13pm

जनाब लक्ष्मण धामी जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें I 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 30, 2022 at 3:52pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार।

Comment by Sushil Sarna on November 30, 2022 at 2:11pm
वाह आदरणीय लक्ष्मण धामी जी बहुत सुंदर और सार्थक प्रस्तुति सर

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