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अ़ज़्म

डरते  हैं  जो मुश्किल से घबराते हैं  ख़तरों से , 

लरज़ीदः क़दम फिर वो मन्ज़िल को नहीं पाते ,, 

गर अ़ज़्म जो पुख़्ता हो लें काम भी हिम्मत से, 

तो  लोग  सितारों  से  आगे  हैं  निकल  जाते ।

                   

'मौलिक व अप्रकाशित' 

Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on March 29, 2020 at 12:19pm — 2 Comments

मेरा सपना

कल नींद में हमने एक सपना देखा।

देखा कि ,मेरा देश बदल गया है।।

जाति ,धर्म का नहीं है रगड़ा

ऊंच-नीच का खत्म है झगड़ा।।

नारी का नहीं है शोषण,

गरीब को भरपूर है पोषण।

सब के, भंडार भरे हैं,

निठल्ले भी काम करें हैं।

ना अपराधों की कही है गंध,

थाना ,कचहरी सब है बंद।

नेता सब सुधर गए हैं,

भ्रष्टाचारी ना जाने किधर गए हैं।

ना रिश्वत है ,ना चित्कार कहीं,

है शांति चहु ओर,

पर जब नींद खुली तो देखा, हकीकत है कुछ और।।



द्वारा भूपेंद्र… Continue

Added by Bhupender singh ranawat on March 29, 2020 at 10:15am — 1 Comment

स्नेह-धारा

स्नेह-धारा

कल्पना-मात्र नहीं है यह स्नेह का बंधन ...

उस स्वप्निल प्रथम मिलन में, प्रिय

कुछ इस तरह लिख दी थीं तुमने

मेरे वसन्त की रातें

मेरी समस्याओं ने

अव्यव्स्थाओं ने, अभिलाषाओं…

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Added by vijay nikore on March 29, 2020 at 8:00am — 3 Comments

तड़प उनकी भी चाहत की इधर जैसी उधर भी क्या ?(७७ )

(1222 1222 1222 1222 )

तड़प उनकी भी चाहत की इधर जैसी उधर भी क्या ?

लगी आतिश मुहब्बत की इधर जैसी उधर भी क्या ?

**

मिलन के बिन तड़पते हैं वो क्या वैसे कि जैसे हम

जो बेचैनी है सोहबत  की इधर जैसी उधर भी क्या ?

**

हुआ है अनमना सा दिल हुई कुछ शाम भी बोझिल

तम्मना आज ख़िलवत की इधर जैसी उधर भी क्या ? 

**

बग़ैर इक दूसरे के जी सकें और मर न पाएँगे

ज़रूरत ऐसी…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 29, 2020 at 12:00am — 7 Comments

दूजा नहीं विकल्प

है मुश्किल आई बड़ी , सारी दुनिया त्रस्त

मिल कर साथ खड़े रहें , कहता है यह वक्त

परमपिता का न्याय तो  सबके लिए समान

अरबों के मालिक भले हों कोई श्रीमान

ईश्वर पर विश्वास का व्यर्थ मुलम्मा ओढ़

कर ना भ्रष्टाचार तू , जीवन यह अनमोल

प्रकृति हमें समझा रही , पर हित लें संकल्प

अन्य बचें तब हम बचें , दूजा नहीं विकल्प

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on March 28, 2020 at 5:30pm — 4 Comments

संदेश समय यह देता है!

प्रभु ने तुम्हें बनाया था जब
साथ तुम्हारे और बहुत कुछ
भी सिरजा था,
तुम अपने मद में भूल गए
किरदार में अपने फूल गए
 
दोहन तो सबका खूब किया
पोषण पर किंतु न ध्यान दिया
सब जीव-जंतु और वृक्ष, नदी
ये सब तुमको कुछ देते हैं
बदले में कुछ ना लेते हैं
 
अस्तित्व से तेरे जुड़े हैं ये
सबके पीछे कुछ कारण हैं
उस कारण को भी भूल…
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Added by Dr Vandana Misra on March 28, 2020 at 5:19pm — 1 Comment

बोल उठी सच हैं लकीरें तेरी पेशानी की(७६ )

(2122 1122 1122 22 /112 )

बोल उठी सच हैं लकीरें तेरी पेशानी की

इस जवानी ने बहुत जिस्म की मेहमानी की

**

क्या दिया कोई किसी अपने को धोका तूने

वज्ह  आख़िर तो कोई होगी पशेमानी की 

**

वक़्त का पहिया लगातार चले मर्ज़ी से

फ़िक्र उसको नहीं दुनिया की परेशानी की

**

आब जिस रूप में हो उसकी बशर है क़ीमत…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 27, 2020 at 11:00pm — 4 Comments

सरकारी राशन



गांव मुहल्लों के लोग कोरोना के कहर के भय से मुक्त अब राहती राशन की आस में खुश हैं।मुखिया, सरपंच और गांव के अगहरिया लोगों के सभी लोग राशन कार्ड धारी हैं ही,लाल कार्ड वाले भी हो गए हैं।भले ही साधन संपन्न हों,तो क्या हुआ?एक बार कुछ ले देकर नाम शामिल हो गए,तो फिर चांदी ही चांदी है।मुफ्त का माल खाते रहिए।पूछता ही कौन है? वातावरण इसी मुआफिक बना हुआ है।कल्लू खेतिहर की बीवी बगल के घर आई है।

" कल अनाज लेने जाना होगा", कल्लू की बहुरिया इतराती हुई बोली।

" कहा से?"अनजान बनती हुई मास्टर भोला…

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Added by Manan Kumar singh on March 27, 2020 at 7:06pm — 2 Comments

ऐ पागल पथिक !

ऐ पागल पथिक ! ठहरो जरा ,

रुको जरा , सांस लो तनिक ,

सम्भलो जरा I

सब कुछ पाने की चाह में ,

कुछ टूट गया उस आशियाने में,

कुछ छूट गया उस हसीं फ़सानें में ,

ठहरों, रुको, उसे सवारों, उसे खोजो जरा I

रुको जरा ........

घर पर नन्हों की आस में ,

और बुजुर्गों की लम्बी प्यास में ,

छूटे किसी साज और रियाज़ में ,

वक्त की चीनी घोलो जरा, कोई सुर ताल छेड़ो जरा I

रुको जरा ........

लूडो की गोटियाँ खोजो ,

शतरंज की बिसात बिछाओ जरा ,

कैरम की धूल…

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Added by Dr. Geeta Chaudhary on March 27, 2020 at 3:32pm — 2 Comments

हिन्दी सी भला मिठास कहाँ?

कोई भी भाषा हो , लेकिन

हिन्दी सी भला मिठास कहाँ ?

जो दिल से भाव निकलते हैं

वह कोमल सा अहसास कहाँ ?

है नर्तन मधुर तरंगों सा

अपना ' प्रणाम ' अन्यान्य कहाँ ?

जिससे झंकृत हृद - तार मृदुल

वह सुन्दरता , उल्लास कहाँ

जब बच्चा ' अम्मा , कहकर के

जा , माँ के गले लिपटता है

इस नैसर्गिक उद्बोधन में

अद्भुत आनन्द , हुलास कहाँ ?

कोई भी भाषा हो , लेकिन

हिन्दी सी भला मिठास कहाँ…

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Added by Usha Awasthi on March 27, 2020 at 9:33am — 10 Comments

कोरोना का तांडव

पंख कटे पंछी हुए ,सीमित हुयी उड़ान

सर पे अम्बर था जहाँ, छत है गगन समान

सारी दुनिया सिमट कर कमरे में है कैद

घर के बाहर है पुलिस, खड़ी हुई मुश्तैद

जिनकी शादी ना हुयी , उनकी मानो खैर

और हुयी जिनकी न लें, घर वाली से बैर

घर के कामो में लगें, हर विपदा लें टाल

साँप छुछूंदर गति न हो, करफ्यू या भूचाल

भागवान से लड़ नहीं, बात ये मेरी मान

भागवान के केस में, चुप रहते भगवान

प्रथम दिवस आखिर कटा, साँसों में थे…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on March 26, 2020 at 7:54pm — 2 Comments

कोरोना पर जीत मंत्र

आप अपने आप को ,कर लो घर में बंद।
फिर खुशियां ही खुशियां है, मुश्किल के दिन चंद।।

सेनीटाइजर या साबुन से, धो लो अपने हाथ।
ज्यादा गर याद आए अपनों की, तो फोन पर कर लो बात।।

हम सबको मिलकर लड़नी है, कोरोना की लड़ाई।।
एक दूजे से दूरी ही ,इसकी है दवाई ।।

कानून तुम मान लो ,सुने कर दो रास्ते ।।
हेलो हाय छोड़ के, बस करो नमस्ते ।।

दाल रोटी से काम चला लो, छोड़ो तुम मेवा ।।
घर पर रहकर कर लो, देश की सेवा।।
द्वारा भूपेन्द्र सिंह राणावत

Added by Bhupender singh ranawat on March 26, 2020 at 7:48pm — 1 Comment

जी हाँ (ग़ज़ल)

हज़ज मुसम्मन महज़ूफ़

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन

1222 / 1222 / 1222 / 122

अभी भी है तुम्हें उस बेवफ़ा से प्यार? जी हाँ

निभाने को ये ग़म ता-उम्र हो तय्यार? जी हाँ [1]

उसे देखे बिना इक पल नहीं था चैन दिल को

उसे फिर देखना चाहोगे तुम इक बार? जी हाँ [2]

सिवा ज़िल्लत मिला कुछ भी नहीं कूचे से उसके

अभी भी क्या तुम्हें जाना है कू-ए-यार? जी हाँ [3]

पता तो है तुम्हें सर माँगती है ये मुहब्बत

तो क्या जाओगे हँसते हँसते…

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Added by रवि भसीन 'शाहिद' on March 26, 2020 at 3:38pm — 5 Comments

सब निरोग सब हों सुखी

कोरोना का संक्रमण सारे देश , जहान

है दुस्साध्य परिस्थिति , मुश्किल में है जान

इस संकट की घड़ी में हमको रहना एक

दृढ़ संकल्पित हों खड़े , भुला सभी मतभेद

सर्व हिताय खड़े हुए डा0 नर्स तमाम

पुलिस महकमे के लिए है आराम हराम

नित सफाई कर्मी करें बिना शिकन के काम

इनके सेवा भाव को शत , शत मेरा प्रणाम

आई है , टल जाएगी , यह जो बड़ी विपत्ति

अनुशासित घर में रहें बिना किसी आपत्ति

सब निरोग , सब हों सुखी , करना यही…

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Added by Usha Awasthi on March 25, 2020 at 5:32pm — 2 Comments

ज़रा  सोचें  अगर इंसान सब लोहा-बदन  होते(७५ )

(1222 1222 1222 1222 )

ज़रा  सोचें  अगर इंसान सब लोहा-बदन  होते

यक़ीनन फिर क़ज़ा आने पे पत्थर के क़फ़न होते

**

निज़ामत ग़ौर करती  गर ग़रीबों की तरक़्क़ी पर

वतन में अब तलक भी लोग क्या नंगे बदन होते ?

**

फ़िरंगी की अगर हम नक़्ल से परहेज़ कर लेते 

नई पीढ़ी के फ़रसूदा भला क्या पैरहन होते ?

**

जूँ  लुटती आज है लुटती इसी मानन्द  गर   क़ुदरत

तो क्या दरिया शजर बचते कहीं पर कोई बन होते ?

**

अगर इन्सां न  मज़हब और फिरकों में बँटा…

Continue

Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 25, 2020 at 5:00pm — 3 Comments

मानव तेरी करनी

विवेक पर जब मन हावी हो जाता है,

तभी तो ऐसा मंजर नजर आता है।

हे मानव, तू अड़ा रहा मनमानी पे,

किया निरंतर खिलवाड़ प्रकृति से।

हे अधम, प्रगति के मद में,

तूने प्रकृति का तिरस्कार किया।

बस, मैं ही मैं हूं ,तू इस खुश फहमी में जिया।

पर, मत भूल, प्रकृति जब विकराल रूप धर लेती है,

फिर वह सांसे भी हर लेती है।

अब भी समय है, हे मानव ,संभल जा,

अपनी हरकतों से बाज आ।



सुन, ए नादान ,गर जीना है सुकून से,

तो प्रकृति की शरण में जा।

वो मां है,… Continue

Added by Bhupender singh ranawat on March 25, 2020 at 2:11pm — 1 Comment

कोरोना का क्या रोना

जितना हो सकता हो दूरियां बनाइये

मुख से न कहके नयन से जताइये


घबराइये न दिल को दिलासा दिलाइये

विपदा की घड़ी में भी बस  मुस्कुराइये


जीभर  के बात अपनी सबको सुनाइये

बस थोड़ा और अपने मुँह को घुमाइये


घर जो आये हाथ  सोप से धुलाइये

पी के नींबू नींद भी गहरी लगाइये


बस प्राणायाम योग  ध्यान आजमाइये

प्रतिरोध…
Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on March 25, 2020 at 1:43am — 3 Comments

कोरोनामय दोहे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

कोरोनामय जग हुआ, फीका पड़ा बसन्त

माँगे खुद की खैर अब, राजा, रंक, महन्त।१।

**

जन्मा चाहे चीन में, लाये अपने लोग

जिससे सारे देश में, फैल रहा यह रोग।२।

**

विकट घड़ी में आपदा, आयी सबके द्वार

घर के बाहर आ मगर, करो नहीं सत्कार।३।

**

घर में बैठो चन्द दिन, ढककर खिड़की द्वार

कोरोना पर  वार  को, यही सफल  हथियार।४।

**

आज चिकित्सक का कहा, थोड़ा मानव मान

घर  में  चुपके  बैठ  कर, होगा  रोग  निदान।५।

**

करो नमस्ते दूर से , नहीं मिलाओ…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 24, 2020 at 8:04pm — 2 Comments

प्रणय-परीक्षा

प्रणय-परीक्षा

सुना है कुछ ऐसा केवल

स्वप्न-लोक में 

या परियों की कहानी में होता है

सात समुद्र पार से आता है

घोड़े पर सवार

सात युगों का प्यार

पर हवा-सी झूमती

शैतानी-भरी हँसी हँसती

भरे आँखों में खुमारी की लालिमा

ऐसी गुड़िया से मिलना

मेरे जीवन के रंग-मंच पर

यह कोई सपना नहीं था

काट रही थी कब से मुझको

समय की तेज़ धार

मिला हवा की लहर-सा…

Continue

Added by vijay nikore on March 23, 2020 at 12:30pm — 2 Comments

क्यों चलते औरों के पथ पर स्वयं बनाओ अपनी राहें |(७४ )

एक ताज़ा गीत

=========

क्यों चलते औरों के पथ पर

स्वयं बनाओ अपनी राहें |

**

माँ की उँगली थाम बहुत तुम

सीख गए पाँवोँ पर चलना |

लेकिन अब काँटों के पथ पर

खुद ही गिरना और सँभलना |

जीवन-रण से बचना मुश्किल

लड़कर करनी जीत सुनिश्चित,

भाग नहीं सकता है कोई

मित्र भागना खुद को छलना |

तुम अपने जीवन के नायक

कोई काम करो अब ऐसा,

जिससे तुम पर दुनिया भर के

सब लोगों की टिके निगाहें…

Continue

Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 23, 2020 at 12:00am — 2 Comments

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