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ग़ज़ल -मतभेद दूर करने’ मकालात चाहिए-कालीपद 'प्रसाद'

काफिया : आत ; रदीफ़ : चाहिए

बहर : २२१  २१२१  १२२१  २१२

 

मतभेद दूर करने’ मकालात चाहिए

कैसे बने हबीब मुलाक़ात चाहिए |

 

वादा निभाने’ में तुझे’ दिन रात चाहिए

हर क्षेत्र में विकास का’ इस्बात चाहिए |

 

आतंकबाद पल रहा’ है सीमा’ पार में

जासूसी’ करने’ एक अविख्यात चाहिए |

 

तू लाख कर प्रयास नही पा सकेगा’ रब

भगवान को विशेष मनाजात चाहिए…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on December 22, 2017 at 9:00am — 5 Comments

हुस्न की कोई परी

212 1212

मिल गई नई नई ।

हुस्न की परी कोई ।।

झुक गई नजर वहीं।

जब नज़र कभी मिली।।

देखकर उसे यहां ।

खिल उठी कली कली ।

हिज्र की वो रात थी ।

लौ रही बुझी बुझी ।।

खा गया मैं रोटियां ।

बिन तेरे जली जली ।।

कुछ तो बात है जो वो।

रह रही कटी…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 21, 2017 at 11:53pm — 5 Comments

कुछ हाइकू

 

सूखी सी शाख

बैठा पंछी अकेला

पतझड़ में ।

 

नयी नवेली

लाजवंती वधू सी

सिमटी धूप ।

 

सूरज जब

अलसाया, चल पड़ा

क्षितिज पार ।

 

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neelam Upadhyaya on December 21, 2017 at 2:34pm — 9 Comments

जुल्फ लहरा के बिखर जाती है

2122 1122 22

जब कभी छत पे नज़र जाती है ।

उनकी सूरत भी निखर जाती है ।।

पा के महबूब के आने की खबर।

वो करीने से सँवर जाती है ।।

कोई उल्फत की हवा है शायद ।

ज़ुल्फ़ लहरा के बिखर जाती है ।।

इक मुहब्बत का इरादा लेकर ।

रोज साहिल पे लहर जाती है ।।

बेसबब इश्क हुआ क्या उस से ।

वो तसव्वुर में ठहर जाती है ।।

अब न चर्चा हो तेरी महफ़िल में ।

चोट फिर से वो उभर जाती है…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 21, 2017 at 1:31am — 12 Comments

कशमकश--लघुकथा

अजीब सी कशमकश में गुजर रहे थे हरी बाबू पिछले एक हफ्ते से, एक तरफ उनके खुद के विचार तो दूसरी तरफ एक छोटी सी चीज पर उनकी असहमति| बेटी अर्पिता पिछले दो साल से नौकरी में थी और उन्होंने कह रखा था कि या तो खुद ही शादी कर लो या जहाँ मन हो बता देना, शादी कर देंगे| लेकिन अपने उदार सोच और प्रगतिशील विचारों के बावजूद एक छोटी सी बात वह चाह कर भी किसी से नहीं कह पाए थे|

वैसे तो उनके सभी मज़हब और जातियों के दोस्त थे और उन्होंने कभी उनमें फ़र्क़ भी नहीं किया| लेकिन पिछले कई वर्षों से धर्म के आधार पर हो…

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Added by विनय कुमार on December 20, 2017 at 6:30pm — 4 Comments

हार का अहसास उसको खा गया- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122   2122    212


जीतने की जिस किसी ने ठान ली
मंजिलों की राह खुद पहचान ली ।1।


हार का अहसास उसको खा गया
पूछ मत अब ये कि क्यों कर जान ली।2।


है वचन शीशा न कोई टूटेगा
पत्थरों की बात चाहे मान ली ।3।


कोयलों ने होंठ अपने सी लिये
झुंड में आ मेंढकों ने तान ली ।4।


भ्रष्ट जब सारी सियासत है यहाँ
क्या है कैसे कितनी राशी दान ली।5। 

मौलिक अप्रकाशित

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 20, 2017 at 1:54pm — 23 Comments

गुज़र रहा हूँ उसी डगर से

121 22 121 22

है  आई खुश्बू तेरी जिधर से ।

गुज़र रहा हूँ उसी डगर से ।।

नशे का आलम न पूछ मुझसे ।

मैं पी रहा  हूँ तेरी  नज़र  से ।।

हयात मेरी भी कर दे रोशन ।

ये इल्तिज़ा है मेरी क़मर से ।।

हजार पलके बिछी हुई हैं ।

गुज़र रहे हैं वो रहगुजर से ।।

खफा हैं वो मुफलिसी से मेरी ।

जो तौलते थे मुझे गुहर से ।।

यूँ तोड़कर तुम वफ़ा के वादे ।

निकल रहे…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 20, 2017 at 3:00am — 17 Comments

ग़ज़ल

212 1222 212 1222

इस तरह मुहब्बत में दिल लुटा के चलते हो ।

हर कली की खुशबू पर बेसबब मचलते हो ।।

मैंकदा है वो चहरा रिन्द भी नशे में हैं ।

बेहिसाब पीकर तुम रात भर सँभलते हो ।।

टूट कर मैं बिखरा हूँ अपने आशियाने में ।

क्या गिला है अब मुझसे रंग क्यूँ बदलते हो ।।

दिल चुरा लिया तुमने हुस्न की नुमाइस में ।

बेनकाब होकर क्यूँ घर से तुम निकलते हो…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 19, 2017 at 9:00pm — 10 Comments

आप अंदाज रखें हँसने हँसाने वाला (ग़ज़ल)

अरकान- फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन

आप अंदाज़ रखें हँसने हँसाने वाला

यही किरदार तो है साथ में जाने वाला।1।

आज क्या बात है, नफ़रत से मुझे देखता है

मेरी तस्वीर को सीने से लगाने वाला।2।

काटने वाले तो हर सिम्त नज़र आते हैं

पर न दिखता है कोई पेड़ लगाने वाला।3।

आख़िरी बार उसे देख ले तू जी भर के

फिर न आएगा कभी लौट के, जाने वाला।4।

आबरू की भी लगा देती है क़ीमत दुनिया

गर चला जाये किसी…

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Added by नाथ सोनांचली on December 19, 2017 at 6:27pm — 16 Comments

रंज -ओ-ग़म ज़िंदगी के भुलाते रहो - सलीम रज़ा रीवा

 212 212 212 212 -

रंज -ओ-ग़म ज़िंदगी के भुलाते रहो

गीत ख़ुशिओं के हर वक़्त गाते रहो

-

मोतियों  की तरह जगमगाते रहो

बुल बुलों की तरह चहचहाते रहो

-

जब तलक आसमां में सितारें रहें

ज़िंदगी में  सदा  मुस्कुराते  रहो

-

इतनी खुशियां मिले ज़िंदगी में तुम्हे

दोनों हांथों से  उनको  लुटाते  रहो

-

सिर्फ़ कल की करो दोस्तों फिक़्र तुम

जो गया वक़्त उसको भुलाते रहो

-

हम भी तो आपके जां  निसारों में हैं

क़िस्सा- ए- दिल हमें भी सुनाते…

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Added by SALIM RAZA REWA on December 19, 2017 at 4:55pm — 21 Comments

ग़ज़ल...तुम्हारी याद का मौसम--बृजेश कुमार 'ब्रज'

1222 1222 1222 1222

हमें जब आज़माता है तुम्हारी याद का मौसम

सुकूँ भी साथ लाता है तुम्हारी याद का मौसम

ग़मों ने कोशिशें तो लाख कीं पलकें भिंगोने की

लबों पर मुस्कुराता है तुम्हारी याद का मौसम

हमारे रूबरू ठहरो कभी पल भर तो समझाएं

हमें कितना सताता है तुम्हारी याद का मौसम

इसे मैं छोड़ आता हूँ कहीं सुनसान सहरा में

मगर फिर लौट आता है तुम्हारी याद का मौसम

वहाँ तुम हो तुम्हारी पुरकशिश कमसिन अदाएं हैं

यहाँ 'ब्रज'…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 18, 2017 at 11:00pm — 26 Comments

जीवन

जीवन

तुम हो 

 एक अबूझ पहेली,

न जाने फिर भी

क्यों लगता है

तुम्हे बूझ ही लूंगी.

पर जितना तुम्हें

हल करने की

कोशिश करती हूँ,

उतना ही तुम

उलझा देते हो.

थका देते हो.

पर मैंने भी ठाना है;

जितना तुम उलझाओगे ,

उतना तुम्हें

हल करने में;

मुझे आनन्द आएगा.

और

इसी तरह देखना;

एक दिन

तुम मेरे

हो जाओगे.…

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Added by Veena Sethi on December 18, 2017 at 8:30pm — 5 Comments

सुंदरता का अहंकार

एक अहंकारी पुष्प

अपनी प्रसिद्धि पर इतरा रहा है,

भॅंवरों का दल भी,

उस पर मंडरा रहा है,

निश्चित ही वह,

राग-रंग-उन्माद में,

झूल गया है,

स्व-अस्तित्व का,

कारण ही भूल गया है,

तभी तो,

बार-बार अवहेलना,

कर रहा है,

उस माली की,

जिसने उसे सुंदरता के,

मुकाम तक पहुचाया,

संभवतः उसे ज्ञात नहीं,

बयारों ने भी,

करवट बदल ली है,

जो संकेत है,

बसंत की समाप्ति…

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Added by Manoj kumar shrivastava on December 18, 2017 at 7:30pm — 12 Comments

तुम्हारा मुस्कुराना और भी बीमार कर देगा

अरकान :1222  1222  1222  1222

अजब सी कश्मकश से यकबयक दो चार कर देगा

तुम्हे पहचानने से वो अगर इनकार कर देगा

ज़माने में जियो खुल के जवानी साथ है जब तक

करोगे क्या बुढ़ापा जब तुम्हे लाचार कर देगा

हक़ीक़त सामने है आज यह जो,  देख लेना कल

सही को भी ग़लत ये सुब्ह का अखबार कर देगा

रखें कुछ भी नहीं दिल में छुपा के आप भी मुझसे

नहीं तो शक खड़ी इक बीच में दीवार कर देगा

समझना मत कभी कमज़ोर, दुश्मन को…

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Added by नाथ सोनांचली on December 18, 2017 at 1:30pm — 20 Comments

ग़ज़ल -सूरते जान जो'रौनक वो, कही' नूर नहीं - कालीपद 'प्रसाद'

सूरते जान जो'रौनक वो, कही' नूर नहीं 

यह अलग बात है दुनिया में' वो मशहूर नहीं 

प्यार करता हूँ’ मैं’ पागल की’ तरह पर क्या’ करूँ

हर समय प्यार जताना उसे’ मंज़ूर नहीं |

सांसदों में अभी’ दागी हैं’ बहुत से नेता

दाग धोना बड़ा’ दू:साध्य है’, नासूर नहीं |

चाह ऐसी कि सज़ा सबको’ मिले जो दोषी

पर सज़ा सबको’ मिले ऐसा’ भी’ दस्तूर नहीं |

लोक सरकार अभी, राज है’ जनता का यह

हैं सभी स्वामी’ यहाँ ,कोई’ भी’ मजदूर नहीं…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on December 18, 2017 at 8:30am — 14 Comments

" नज़रें ज़माने भर की उस इक गुलाब पर हैं "

बहर - 221 2122 221 2122



यूँ मेरी नज़रें ग़ज़लों की हर किताब पर हैं .......

जैसे....... शराबियों की नज़रें शराब पर हैं ....

जब .चल दिया मैं उनकी महफ़िल से तो वो बोले

ठहरो ......कुछेक पल लब मेरे ज़वाब पर हैं .....



हाँ , बेगुनाह होती है अपनी भावनायें

इल्जाम इसलिये तो लगते शबाब पर हैं .....

ऐ - मौला तुम भी रखना अपनी निगाहें उस पर

नज़रें ज़माने भर की उस इक ग़ुलाब पर हैं ......

मैंने चमकने की है जब से यूँ बात…

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Added by पंकजोम " प्रेम " on December 17, 2017 at 9:17pm — 10 Comments

कड़वाहट ....

कड़वाहट ....

जाने कैसे

मैंने जीवन की

सारी कड़वाहट पी ली

धूप की

तपती नदी पी ली

मुस्कुराहटों के पैबन्दों से झांकती

जिस्मों की नंगी सच्चाई पी ली

उल्फ़त की ढलानों पर

नमक के दरिया की

हर बूँद पी ली

रात की सिसकन पी ली

चाँद की उलझन पी ली

ख़्वाबों की कतरन पी ली

आगोश के लम्हों की

हर फिसलन पी ली

जानते हो

क्यूँ

शा.... य... द

मैं

तू.... म्हा ... रे

इ.... .श्......क

की…

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Added by Sushil Sarna on December 17, 2017 at 8:30pm — 6 Comments

नकल (लघु कथा)

'उन्होंने एक लघु कथा लिखी।फेसबुक पर आ गयी।हठात उसपर मेरी नजर पड़ी। शीर्षक,समापन सब मेरे थे।बापू की मूर्त्ति के नीचे ही वार्त्तालाप हुआ था।मैं चकित था।सुबह मैंने लिखी,अपराह्न तक दोस्त ने दुहरा दी।बापू की जयकार बोलने का इससे बढ़िया दूसरा तरीका शायद ही हो।'---
मधुकर जी एक ही साँस में इतना सब कुछ बोल गए।…
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Added by Manan Kumar singh on December 17, 2017 at 8:00pm — 12 Comments

वैध बूचड़खाना (लघुकथा)

सड़क पर एक लड़के को रोटी हाथ में लेकर आते देख अलग-अलग तरफ खड़ीं वे दोनों उसकी तरफ भागीं। दोनों ही समझ रही थीं कि भोजन उनके लिए आया है। कम उम्र का वह लड़का उन्हें भागते हुए आते देख घबरा गया और रोटी उन दोनों में से गाय की तरफ फैंक कर लौट गया। दूसरी तरफ से भागती आ रही भैंस तीव्र स्वर में बोली, “अकेले मत खाना इसमें मेरा भी हिस्सा है।”

गाय ने उत्तर दिया, “यह तेरे लिए नहीं है... सवेरे की पहली रोटी मुझे ही मिलती है।”

“लेकिन क्यूँ?” भैंस ने उसके पास पहुँच कर प्रश्न…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on December 17, 2017 at 2:03pm — 22 Comments

विकल विदा के क्षण

विकल विदा के क्षण

सिहरता सूनापन

संग्रहीत हैं अनायास उमड़ते  अनुभव

पता नहीं अब जीवन के इस छोर पर

प्रलय-पवाह  जो  भीतर  में  है

वह  बाहर  व्याप्त  हो  रहा  है,  या

स्तब्धता जो बाहर है, घुटती-बढ़ती

आकर समा गई है  हृदय  में  आज

मेरी कमज़ोरियों का रूपांकन करती

शोचनीय स्थिति मेंं मूलभूत समस्याएँ

अवसर-अनवसर झुठलाती हैं मुझको

उभरते हैं पुराने जमे दुखों के बुलबुले

दुख  में  छटपटाती  सलवटों …

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Added by vijay nikore on December 17, 2017 at 7:21am — 21 Comments

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