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"एक क़तरा था समंदर हो गया हूँ"

2122 2122 2122

एक क़तरा था समंदर हो गया हूँ।
मैं समय के साथ बेहतर हो गया हूँ।।

कल तलक अपना समझते थे मुझे जो।
उनकी ख़ातिर आज नश्तर हो गया हूँ।।

मैं बयां करता नहीं हूँ दर्द अपना।
सब समझते हैं कि पत्थर हो गया हूँ।।

ज़िन्दगी में हादसे ऐसे हुए कुछ।
मैं जरा सा तल्ख़ तेवर हो गया हूँ।।

जख़्म दिल के तो नहीं अब तक भरे हैं।
हां मगर पहले से बेहतर हो गया हूँ।।


सुरेन्द्र इंसान

मौलिक व अप्रकाशित

Added by surender insan on December 2, 2017 at 1:00pm — 23 Comments

देशभक्त तो पैदा कर

दलगत राजनीति से दूर होना चाहिए,

देशहित करने का सुरूर होना चाहिए,

बेशक विचारों में भेद हो सकता है,

पर राष्ट्रहित हो तो गुरूर होना चाहिए,

सत्ता से प्रेम और विपक्ष से गिला नहीं,

किसी दल से भी मैं कभी मिला नहीं,

पर प्रबलता से देशहित में कहता हूँ,

जो देश का है, मैं उसकी पार्टी में रहता हूँ,

और जो भी विपक्षी हो, उससे कहता हूँ,

मतदाता से नहीं, देश से वायदा कर,

मैं सिर्फ तुझे ही सत्ता में चुनूँगा पहले,

पहले अपनी पार्टी में देशभक्त तो पैदा… Continue

Added by Manoj kumar shrivastava on December 2, 2017 at 8:41am — 8 Comments

तो दोष क्या है

1222 1222 122



(बिना कोई मात्रा गिराए हिंदी ग़ज़ल)



पलायन का वरण तो दोष क्या है ।

प्रगति पर है ग्रहण तो दोष क्या है ।।



न अपनाओ कभी तुम वह प्रसंशा।

पृथक हो अनुकरण तो दोष क्या है ।।



जिन्हें शिक्षा मिली व्यभिचार की ही ।

करें सीता हरण तो दोष क्या है ।।



मरी हो सभ्यता प्रतिदिन जहां पर ।

नया हो उद्धवरण तो दोष क्या है ।



अनावश्यक अहं की तुष्टि से बच ।

करेंगे संवरण तो दोष क्या है ।।



वो भूखों मर रहा है कौन… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on December 2, 2017 at 8:23am — 5 Comments

जिंदगी तुझ पर ये दिल भी, कर गया कुर्बान क्यों?

बेखब़र क्यों हो गया तू?   हो  गया  अनजान  क्यों?

ज़िंदगी तुझ पर ये दिल भी, कर गया कुरबान क्यों?

बेबसी  कुछ  भी  नहीं  थी,  जिंदगी  के   दरमियाँ,

चार दिन का बन गया फिर, तू मिरा महमान क्यों?

पूछती   है  हाल …

Continue

Added by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on December 1, 2017 at 8:30pm — 4 Comments

निशब्द संसार

तुम शब्द हो

और मैं अर्थ

तुम हो तो मैं हुं

शब्द बिन अर्थ बेकार

निशब्द संसार

 

तुम प्रीत हो

और मैं जोगन…

Continue

Added by जयति जैन "नूतन" on December 1, 2017 at 7:30pm — 3 Comments

लघुकथा--रिटर्न गिफ़्ट

" सबसे पहले मैं आप सभी उपस्थित महानुभावों , परम मित्रों , परिजनों , रिश्तेदारों और मीडिया जगत के तमाम साथियों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ । आप सभी ने मेरे छोटे से आग्रह पर उपस्थित होकर मेरा मान बढ़ाया । मैं कोई बहुत बड़ा आदमी नहीं हूँ । साधारण-सा , अदना-सा आपके बीच का आदमी हूँ । कई दिनों से बेचैनी में था । सोच रहा था अपने अट्ठावनवें जन्म दिन पर क्या रिटर्न गिफ्ट दूँ ? तो मैं आप सभी के समक्ष घोषणा करता हूँ आज के अपने अट्ठावनवें जन्म दिन पर रिटर्न गिफ्ट के तौर पर जीते जी अपनी एक किडनी दान करता… Continue

Added by Mohammed Arif on December 1, 2017 at 12:35am — 18 Comments

राजमार्ग का एक हिस्सा(लघुकथा)

राजमार्ग का एक हिस्सा(लघुकथा)



भारी गाड़ियों के आवागमन से कम्पित होता,तो कभी हल्की गाड़ियों के गुजरने से सरर्सराहट महसूस करता हूँ।  घोर कुहरे में  इंसानों की दृष्टि जवाब दे जाती है, मगर मैं दूर से ही दुर्घटना की संभावना  को भांपकर सिहर उठता हूँ।



देखता हूँ नई उम्र को मोटरसाइकिलों पर करतब करते निकलते हुए। बेपरवाही जिसके शौंक में शामिल है।



हाल ही की  तो बात है,ऐसा करते हुए उस किशोर की बाइक गिर कर कचरा हो गई थी। पीछे से आते ट्रक ने दल दिया था उसे। मेरा काला शख्त सीना… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 30, 2017 at 11:42pm — 16 Comments

बदनाम इतिहास

आकाओं की आवाज़
मौनी हो गई है,
इस शहर की सियासत
बौनी हो गई है,
सोच के साथ-साथ,
कर्मों में भी दरख़्त है,
मेरे मसीहा का पेशाना,
पिंडारियों सा सख्त है,
शायद उसे याद नहीं कि
आदमी केवल हाड़-मास है,
कल का चर्चित रहा डाकू,
आज का बदनाम इतिहास है....

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Manoj kumar shrivastava on November 30, 2017 at 11:07pm — 5 Comments

हो भी सकता है

1222 1222 1222 1222

तुम्हारे जश्न से पहले धमाका हो भी सकता है ।

ये हिंदुस्तान है प्यारे तमाशा हो भी सकता है ।।



अभी मत मुस्कुराओ आप इतना मुतमइन होकर ।

चुनावों में कोई लम्बा खुलासा हो भी सकता है ।।



ये माना आप ने हक़ पर लगा रक्खी है पाबन्दी ।

है मुझमें इल्म गर जिंदा गुजारा हो भी सकता है ।।



मिटा देने की कोशिश कर मगर वो जात ऊंची है ।

खुदा को रोक ले उसका सहारा हो भी सकता है ।।



न मारो लात पेटों पर यहां भूखे सवर्णो के ।

कभी सरकार… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on November 30, 2017 at 5:30pm — 4 Comments

कागज़ के घोड़े (लघुकथा)राहिला

कार्यालय में कई दिनों तक बिना सूचना के अनुपस्थित रहने के वाले सुरेश कुमार को कमिश्नर साहब ने निलंबित क्या किया।वह हर कर्मचारी के लिए चर्चा का विषय बन गये।सब उनकी दबंगई और ईमानदारी के कायल हुए बगैर ना रह सके। आखिर उन्होंने मंत्री जी के दामाद के खिलाफ जो कार्यवाही की थी। वहीं निलंबन की खबर पाते ही उसी शाम ,एक मिठाई का डिब्बा लेकर सुरेश कुमार , कमिश्नर साहब के सरकारी बंगले पर पहुँच गए।

"नमस्कार सर!"

"नमस्कार ,नमस्कार कहो कैसे आये।"

"बस सर! आपको धन्यवाद कहना था। और यह एक छोटी सी… Continue

Added by Rahila on November 29, 2017 at 11:49am — 7 Comments

आत्म-संवाद

समय के साँचे में कुछ भभका सहसा

गुन्थन-उलझाव व भार वह भीतर का

चिन्ताग्रस्त, तुमने जो किया सो किया

वह प्रासंगिक कदाचित नहीं था

न था वह स्वार्थ न अह्म से उपजा

किसी नए रिश्ते की मोह-निद्रा से प्रसूत

ज़रूर वह तुम्हारी मजबूरी ही होगी

वरना कैसे सह सकती हो तुम

मेरी अकुलाती फैलती पीड़ा का अनुताप

तुम जो मेरे कँधे पर सिर टिकाए

आँखें बन्द, क्षण भर को भी

मेरा उच्छवास तक न सह सकती थी

और अब…

Continue

Added by vijay nikore on November 29, 2017 at 7:51am — 15 Comments

ग़ज़ल - ज़माना खराब है

मफऊल फाइलात मफाईल फाइलुन



हर सू है मारधाड़ ज़माना ख़राब है।

खोलो नहीं किवाड़ ज़माना ख़राब है।



गुन्डों को सीख दे के मुसीबत न मोल लो,

ये देंगे घर उजाड़ ज़माना ख़राब है।



ले दे के अपना काम कराओ किसी तरह

कर लो कोई जुगाड़ ज़माना ख़राब है।



बच्चे भी तंज कसते हैं मुझ पर अदा के साथ,

हँसते हैं दाँत फाड़ ज़माना ख़राब है।



पहले कभी हमारे भी क्या ठाठ बाट थे,

अब झोंकते हैं भाड़ ज़माना खराब है।



अब दो टके में भी न कोई पूछता मुझे,

मैं… Continue

Added by Ram Awadh VIshwakarma on November 28, 2017 at 10:50pm — 11 Comments

चोर-मन

चोर-मन

कमर खुजाती उस स्त्री पर

पंजे मारकर बैठ गई आँख

मदन-मन खुजाने लगा पांख |

अभी उड़ान भरी ही थी कि

पीठ पर पत्नी ने आके ठोका

रसगुल्लामुँह हो गया चोखा |

जवाब में रख दीं बातें इमरती

छत की धूप और सुहानी सरदी

सचेती स्त्री संभल के चल दी |

बहलाने लगा मूंगफली के बहाने

चोर-मन ढूंढता बचने के ठिकाने

भर चिकोटी पत्नी लगी मुस्कुराने |

सोमेश कुमार (मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by somesh kumar on November 28, 2017 at 9:36am — 4 Comments

अब न कोई जंग हारा कीजिये

2122 2122 212

अब न कोई जंग हारा कीजिये ।।

अब बुलन्दी पर सितारा कीजिये ।



चाहिए गर कामयाबी इश्क़ में ।

रात दिन चेहरा निहारा कीजिये ।।



चाँद को ला दूं जमी पर आज ही ।

आप मुझको इक इशारा कीजिये ।।



बेखुदी में कह दिया होगा कभी ।

बात दिल मे मत उतारा कीजिये ।।



पालिये उम्मीद मत सरकार से ।

जो मिले उसमे गुजारा कीजिये ।।



ले लिए हैं वोट सारे आपने ।

काम भी कुछ तो हमारा कीजिये ।।



अब मुकर जाते हैं अपने, देखकर… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on November 28, 2017 at 2:00am — 13 Comments

बचपन को फिर देख रहा हॅूं,

बचपन को फिर देख रहा हॅूं,

विद्यालय का प्यारा आॅंगन,

साथी-संगियों से वह अनबन,

गुरू के भय का अद्भुत कंपन,

इन्हीं विचारों के घेरे में,

मन को अपने सेंक रहा हूॅं,

बचपन को फिर देख रहा हॅूं,

निष्छल मन का था सागर,

पर्वत-नदियों में था घर,

उछल-कूद कर जाता था मैं,

गलती पर डर जाता था मैं,

लेकिन आज यहाॅं पर फिर से,

गल्तियों का आलेख रहा हूॅं,

बचपन को फिर देख रहा हॅूं,

चिर लक्ष्य का स्वप्न संजोया,

भावों का मैं हार पिरोया,

मेहनत की फिर कड़ी…

Continue

Added by Manoj kumar shrivastava on November 27, 2017 at 9:47pm — 8 Comments

ग़ज़ल- पक्की अभी ज़ुबान नहीं है

22 22 22 22



जिंदा क्या अरमान नहीं है ।

तुझमें शायद जान नहीं है ।।



कतरा कतरा अम्न जला है ।

अब वो हिंदुस्तान नहीं है ।।



एक फरेबी के वादों से ।

ये जनता अनजान नहीं है ।।



कौन सुनेगा तेरी बातें ।

सच की अब पहचान नहीं है।।



जरा भरम से निकलें भाई ।

टैक्स तेरा आसान नहीं है ।।



रोज कमाई गाढ़ी लुटती ।

मत समझो अनुमान नहीं है ।।



पढलिख कर वो बना निठल्ला।

क्या तुमको संज्ञान नहीं है ।।



कुर्सी… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on November 27, 2017 at 9:00pm — 7 Comments

अबोले स्वर

अबोले स्वर ...

कुछ शब्दों को

मौन रहने दो

मौन को भी तो

कुछ कहने दो

कोशिश करके देखना

एकांत पलों में

मौन तुम्हारे कानों में

वो कह जाएगा

जो तुम कह न सके

वो धड़कनों की उलझनें

वो अधरों की सलवटों में छुपी

मिलन के अनुरोध की याचना

वो अंधेरों में

जलती दीपक की लौ में

इकरार से शरमाना

बताओ भला

कैसे शब्दों से व्यक्त कर पाओगी

हाँ मगर

मौन रह कर

तुम सब कह जाओगी

चुप रह कर भी

अपनी साँसों से…

Continue

Added by Sushil Sarna on November 27, 2017 at 8:25pm — 6 Comments

परिवर्तन (सरसी छन्द)

परिवर्तन (सरसी छन्द)



प्रचंड लीला परिवर्तन की, सभी झेलते मार

पुष्प सदा जो खिलते रहते, कम्पित होती डार।1।



भृंग मधुर रव तान सुनाते, करते वे मदहोश

गम में सभी सहन करते हैं, परिवर्तन आक्रोश।2।



हरित पर्ण पर हिमकन शोभित, नर्तन करती रोज

परिवर्तन का तांडव पल में, धूमिल करता ओज ।3।



सदा बाग का माली हँसता, सुषमा देख अपार

पतझड़ में नित रुदन करे वह, दिखता हाहाकार।4।



परिवर्तन की विषम ज्वाल में, जलता राज समाज

चीख पुकार सुनाई देती,… Continue

Added by डॉ छोटेलाल सिंह on November 27, 2017 at 6:57pm — 7 Comments

पेड़ उखड़ते तूफानों में, दूब हँसे हर बार (सरसी छःन्द)

अंधी दौड़ आधुनिकता की, गली नगर या गाँव

ना बरगद के पेड़ दिखें अब, ना पीपल की छाँव।।



संस्कार बिना इंसान यहाँ, चलती फिरती लाश

बिना नींव का हवामहल भी, गिरते जैसे ताश।।



अर्धनग्न अब देह बनी है, फैशन की पहचान

भूल गए सब जड़ें पुरातन, पढ़े लिखे नादान।।



सूर्य उदय पूरब से होता, पर पश्चिम में अस्त

उदय अस्त का सत्य जान लो, वरना होगे त्रस्त।।



दरक रहे हैं नित्य यहाँ पर, संस्कारो के दुर्ग

भूल रहे हैं बात पुरातन, बच्चे युवा… Continue

Added by नाथ सोनांचली on November 27, 2017 at 6:30pm — 4 Comments

रूप घनाक्षरी (8,8,8. 8 ) चरणांत गुरु

(डॉ 0 अनिल मिश्र की अंग्रेजी कविता का हिन्दी रूपांतरण )

सभी जो निरीह हैं वो भ्रूण हों या वयोवृद्ध  

सब के सब जीवित शताधिक जला दिये   

 

गोलियों से भूने गए कितने हजार और

कितने सहस्र को निराश्रित बना दिये   

 

और कई पारावार आंसुओं के बार-बार

बाढ़ की तरह नित्य सहसा उफना दिये    …

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 26, 2017 at 8:30pm — 3 Comments

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