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"एक क़तरा था समंदर हो गया हूँ"

2122 2122 2122

एक क़तरा था समंदर हो गया हूँ।
मैं समय के साथ बेहतर हो गया हूँ।।

कल तलक अपना समझते थे मुझे जो।
उनकी ख़ातिर आज नश्तर हो गया हूँ।।

मैं बयां करता नहीं हूँ दर्द अपना।
सब समझते हैं कि पत्थर हो गया हूँ।।

ज़िन्दगी में हादसे ऐसे हुए कुछ।
मैं जरा सा तल्ख़ तेवर हो गया हूँ।।

जख़्म दिल के तो नहीं अब तक भरे हैं।
हां मगर पहले से बेहतर हो गया हूँ।।


सुरेन्द्र इंसान

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 169

Comment

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Comment by surender insan on January 12, 2018 at 2:09pm

    बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीय बलराम  जी । बहुत बहुत आभार जी।

Comment by surender insan on January 12, 2018 at 2:02pm

 बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीय आमोद जी । बहुत बहुत आभार जी।

Comment by Balram Dhakar on December 25, 2017 at 11:11am

बहुत बढ़िया ग़ज़ल। मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं, आदरणीय सुरेंद्र जी।

Comment by amod srivastav (bindouri) on December 21, 2017 at 6:54pm

WAHHH  

Comment by surender insan on December 18, 2017 at 9:06am

  बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीय जवाहर लाल सिंह जी । बहुत बहुत आभार जी।

Comment by surender insan on December 18, 2017 at 9:05am

  बहुत बहुत शुक्रिया आपका मोहतरम तस्दीक अहमद खां साहब जी । बहुत बहुत आभार जी।

Comment by surender insan on December 18, 2017 at 9:04am

   बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीय अजय तिवारी जी । बहुत बहुत आभार जी।

Comment by surender insan on December 18, 2017 at 9:02am

  बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीय काली प्रसाद जी । बहुत बहुत आभार जी।

Comment by surender insan on December 18, 2017 at 9:01am

  बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीय समर कबीर साहब जी ।जी सुधार कर दिया है जी।

बहुत बहुत आभार जी।

Comment by surender insan on December 18, 2017 at 9:00am

  बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीय मनोज जी । बहुत बहुत आभार जी।

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