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November 2017 Blog Posts


सदस्य कार्यकारिणी
‘गेम’ (लघुकथा 'राज')

 

“तुमने ठीक से शूट किया न?”रियान ने पूछा|

“येस येस ऑफकोर्स बड्डी, पूरा शूट कर  लिया" कैमरा दिखाते हुए डोडो ने कहा |

" लेकिन एक बात बता व्हाई डिड यू चूज हिम ओनली?   इसे ही क्यों चुना तुमने?”डोडो ने आगे पूछा |

“ ही वाज़ एन इन्डियन यार.... क्या फर्क पड़ता है कोई अपना थोड़े ही था  और मेरे इस  लास्ट टास्क में   यही ऑर्डर था  कि विदेशी होना चाहिए  पर  ये शूट करना अब तो बंद कर यार अभी भी क्यूँ ऑन किया हुआ है कैमरा”  रियान बोला|  

ठांय ठांय ठांय...”सॉरी बड्डी मेरा भी…

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Added by rajesh kumari on November 2, 2017 at 11:06am — 8 Comments

गज़ल -अक्सीर दवा भी अभी’ नाकाम बहुत है

काफिया आम, रदीफ़ : बहुत है

बह्र : २२१  १२२१  १२२१  १२२ (१)

अकसीर  दवा भी अभी’ नाकाम बहुत है

बेहोश मुझे करने’ मय-ए-जाम बहुत है |

वादा किया’ देंगे सभी’ को घर, नहीं’ आशा

टूटी है’ कुटी पर मुझे’ आराम बहुत है |

प्रासाद विशाल और सुभीता सभी’ भरपूर   

इंसान हैं’ दागी सभी’, बदनाम बहुत हैं |

है राजनयिक दंड से’ ऊपर, यही’ अभिमान

शासन करे स्वीकार, कि इलज़ाम बहुत है |

साकी की’ इनायत क्या’ कहे,दिल का…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on November 2, 2017 at 8:24am — 2 Comments

क्यूँ है तू बीमार मेरे दिल

(22 22 22 22)

क्यूँ है तू बीमार मेरे दिल

गम से यूँ मत हार मेरे दिल

 

तय है इक दिन मौत का आना

इस सच को स्वीकार मेरे दिल

 

पहले ही से दर्द बहुत हैं

और न ले अब भार मेरे दिल

 

सुनकर भाषण होश न खोना

ये सब है व्यापार मेरे दिल

 

कौन यहाँ पर कब बिक जाए

रहना तू हुशियार मेरे दिल

 

झूठ खड़ा है सीना ताने

सच तो है लाचार मेरे दिल

 

दिल के कोने में रहने दे

प्यार…

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Added by नादिर ख़ान on November 2, 2017 at 12:30am — 7 Comments

फ़रिश्ता (लघु कथा)

 
चार-पांच वर्ष का बच्चा प्रकाश मकान की दूसरी मंजिल पर छत पर खेलते हुए कटकर आई एक पतंग को लूटने के लिए बालकनी से खिड़की में झुका, तभी पाँव फिसलने से खडकी के बाहर छज्जे से लुडककर सडक पर गिरने लगा तभी सड़क पर दूर से देख एक व्यक्ति चिल्लाया “अरे ये बच्चा गिरा” |
उसी समय उस गली से ससुराल के मकान के नीचे से रोज की तरह गुजर…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 1, 2017 at 7:51pm — 4 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
कशिश

उसका बेहद अपनेपन से आना

नज़ाकत से छूना

अपनी सधी हुई उँगलियों से थामना

महसूस करना तपिश को

सुबह शाम जब चाहे...

दूर न रह पाने की

उसकी दीवानगी,

ये चाह कि उसके बिन पुकारे ही

सुन ली जाए उसकी हर उसकी धड़कन,

न न नहीं पसंद उसे अनावश्यक मिठास

न ही कृत्रिमता भरा कोई भी मीठापन

चाहे फीकी हो…

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Added by Dr.Prachi Singh on November 1, 2017 at 2:00pm — 9 Comments

"अभी इक आदमी बाक़ी है जो इंकार कर देगा"

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन



अगर वो मुफ़लिसी को रौनक़-ए-बाज़ार कर देगा

कई महरुमियों को बर सर-ए-पैकार कर देगा



सभी ने कर लिया इक़रार, लेकिन जानता है वो

अभी इक आदमी बाक़ी है जो इंकार कर देगा



किताबों में लिखा है उसको जन्नत की बशारत है

वफ़ा की राह में क़ुर्बान जो घर बार कर देगा



मिलाएगा अगर हर बात में जो हाँ में हाँ उसकी

उसे नीलाम वो इक दिन सर-ए-बाज़ार कर देगा



हमारे इश्क़ का चर्चा अभी सरगोशियों तक है

जो बाक़ी काम है वो सुब्ह का… Continue

Added by Samar kabeer on November 1, 2017 at 11:44am — 61 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
स्त्री (एक शब्द चित्र)

 

सहम कर सिहरने लगता है

धमनियों में दौड़ता रक्त,

काँपने लगती है रूह,

खिंचने लगतीं हैं सब नसें,

मुस्कुराहट कहीं दुबक जाती है,

हर इच्छा कहीं खो जाती है,…

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Added by Dr.Prachi Singh on November 1, 2017 at 11:30am — 10 Comments

वक्त की बात(व्यंग्य के निमित्त)

रात अपनी जवानी पर थी,चाँद अपने शबाब की ऊँचाई पर।साँसों में असहास कायम था।झक शीतल रोशनी में रात सिहरती,शरमाती।चाँद खिलखिलाता,और खिलखिलाता। यह क्रम ज्यादा देर तक नहीं चला।अरे यह क्या!वक्त की निस्तब्धता भंग होती -सी लगी। कहीं से किसी अज्ञात पक्षी ने पंख फड़फड़ाये।शायद अकस्मात् नींद से जगा हो।कहीं नींद में ही सबेरा न हो जाये,इसलिए आकुल हो शायद। रात अपना काला दुपट्टा समेटने लगी।चाँद को यह नागवार लगा।उसकी चाहत अभी परवान चढ़ी ही कहाँ!सबेरा होने की शुरुआत इतनी जल्दी क्यूँ हो जाती है भला?बिलकुल सुख के… Continue

Added by Manan Kumar singh on November 1, 2017 at 9:58am — 4 Comments

जिधर देखो उधर मेहनत कशों की - सलीम रज़ा रीवा

1222 1222 1222 1222

-

जिधर देखो उधर मिहनत  कशों की ऐसी हालत है-

ग़रीबों  की  जमा अत पर अमीरों की क़यादत…

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Added by SALIM RAZA REWA on November 1, 2017 at 9:30am — 15 Comments

लघुकथा---शट अप

शट अप
ओफ्फ हो ! क्या माँ आप हरदम ज़ोर-ज़ोर से बोलती हो । ये गाँव नहीं है ,वीआईपी कॉलोनी है । यहाँ सभी वेल एजुकेटेड लोग रहते हैं ,धीमे स्वर में बोलते है । वेल कल्चर हैं यहाँ , वेल कल्चर समझी ।"
" मगर मुझे एक बात समझ में नहीं आई। जब से यहाँ आई हूँ देख रही हूँ कि कोई किसी से बतियाता है न बातचीत करता है । क्या यहाँ की वेल कल्चर है ?"
" शट अप !!"
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on November 1, 2017 at 8:30am — 24 Comments

एक थी एकता (लघुकथा)

"क्यों नवयुवक, तुम किस के लिए दौड़ रहे हो इस भीड़ में? एकता के लिए, अपने लिए, किसी महापुरुष की प्रतिष्ठा के लिए, सरकार के लिए या किसी को श्रद्धांजलि के लिए?"



एक विशेष अवसर पर आयोजित विशाल दौड़ में एक पत्रकार ने पूछा तो वह नवयुवक अपनी विशेष टी-शर्ट सही करते हुए, मोबाइल से सेल्फ़ी लेते हुए बोला - " ये बढ़िया रहा! लोकप्रिय पत्रकार के साथ यादगार फोटो! .... चलिए आप भी दौड़िए मीडिया कवरेज के लिए, ग्लैमर के लिए, पब्लिसिटी के लिए; 'राष्ट्रीय एकता' के इस बैनर तले!"



सब दौड़ रहे थे।… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 1, 2017 at 1:22am — 12 Comments

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