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उसका बेहद अपनेपन से आना
नज़ाकत से छूना
अपनी सधी हुई उँगलियों से थामना
महसूस करना तपिश को
सुबह शाम जब चाहे...
दूर न रह पाने की
उसकी दीवानगी,
ये चाह कि उसके बिन पुकारे ही
सुन ली जाए उसकी हर उसकी धड़कन,
न न नहीं पसंद उसे अनावश्यक मिठास
न ही कृत्रिमता भरा कोई भी मीठापन
चाहे फीकी हो
पर सहज सादगी ही भाती है उसे...
बिना दो पल भी रुके
उसका लगा लेना अपने लबों से
घुलने देना हर अहसास को
क़तरा क़तरा अपने भीतर,
और डूब जाना इस ताज़गी में,
पलकों से ढाँप लेना
आँखों में उमड़ती तसल्ली को,
फिर लेना सुकून भरी लम्बी साँस...
सच!
बहुत हिफ़ाज़त से सहेजा है उसने
गर्म नाज़ुक एहसासों भरे
चाय और कशिश के इस अटूट साथ को

मौलिक और अप्रकाशित 

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 4, 2017 at 7:18pm

बहुत हिफ़ाज़त से सहेजा है उसने
गर्म नाज़ुक एहसासों भरे
चाय और कशिश के इस अटूट साथ को----------------कविता के रहस्य को खोलती ये अंतिम पंक्तियां  , साधुवाद  आदरणीया

Comment by Gajendra shrotriya on November 4, 2017 at 6:56pm
आदरणीया प्राची सिंह जी सादर अभिवादन!बहुत खूबसूरती से एक सार्थक और सांकेतिक बिम्ब काव्य रचा है आपने। वाह! बहुत बधाई आपको।
Comment by narendrasinh chauhan on November 4, 2017 at 5:48pm

सुंदर रचना 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 4, 2017 at 6:53am
आ. प्राची बहन, सुंदर रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।
Comment by Afroz 'sahr' on November 2, 2017 at 9:07pm
सुंदर रचना नया ज़ाविया, नया फ्लेवर "चाय और कशिश" क्या बात है। बहुत बधाई आपको मोहतरमा डॉ.प्राची साहिबा,,,,
Comment by narendrasinh chauhan on November 2, 2017 at 5:44pm

,बहुत सुंदर रचना

Comment by Samar kabeer on November 2, 2017 at 3:02pm
मोहतरमा प्राची साहिबा आदाब,बहुत सुंदर रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 1, 2017 at 5:18pm
'चाय और कशिश'और अनावश्यक/ कृत्रिम मिठास, सादगी और अहसास... बहुत ही सधे हुए सांकेतिक भावपूर्ण सृजन के लिए सादर हार्दिक बधाई आदरणीया डॉ. प्राची जी।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 1, 2017 at 4:07pm

आदरणीया प्राची जी इस सहजता से ओतप्रोत इस शानदार रचना केलिए ढेर सारी बधाई सादर 

चाय और कशिश .....ये नहीं समझ सका 

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