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December 2016 Blog Posts

दायित्व

पिता की मृत्यु के बारह दिन गुज़र गये थे, नाते-रिश्तेदार सभी लौट गये। आखिरी रिश्तेदार को रेलवे स्टेशन तक छोड़कर आने के बाद, उसने घर का मुख्य द्वार खोला ही था कि उसके कानों में उसके पिता की कड़क आवाज़ गूंजी, "सड़क पार करते समय ध्यान क्यों नहीं देता है, गाड़ियाँ देखी हैं बाहर।"

 

उसकी साँस गहरी हो गयी, लेकिन गहरी सांस दो-तीन बार उखड़ भी गयी। पिता तो रहे नहीं, उसके कान ही बज रहे थे और केवल कान ही नहीं उसकी आँखों ने भी देखा कि मुख्य द्वार के बाहर वह स्वयं खड़ा था, जब वह बच्चा था जो डर के…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on December 3, 2016 at 6:58pm — 9 Comments

गीत(रोला छ्न्द)/सतविन्द्र कुमार राणा

गीत (रोला छ्न्द)

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सबपर उसका नेह,प्रकृति प्यारी है माता

खिलता हरसिंगार,रात में सुन ले भ्राता।



पँखुड़ी निर्मल श्वेत,मोह सबका मन लेती

सुंदरता है नेक,नयन को यह सुख देती

केसरिया है दंड,रंग जिसका चमकीला

हुआ मुग्ध मन देख,प्रकृति की ऐसी लीला

पुलकित होकर आज ,हृदय इसके के गुण गाता

खिलता हरसिंगार रात में सुन ले भ्राता।



देखो ज्यों ही तात, प्रात की बेला आए

अवनी पर तब पुष्प,सभी जाते छितराए

सुन्दर हरसिंगार,उठालो इनको चुनकर

बनते… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 3, 2016 at 6:00pm — 9 Comments

"भोपाल- तीन दिसम्बर" -मेरे सर्वप्रथम हाइकू : अर्पणा शर्मा

गैस त्रासदी,
पीड़ित मानवता,
कराह उठी...!!

भीड़ उन्मादी,
कारखाने बाहर,
देखे बर्बादी,

की है मुनादी
मिलेगा मुआवजा,
क्या है ये काफी???

कैसे भगाया,
एंड़रसन यहाँ,
है अपराधी,

नासूर से ही,
जख़्म यहाँ रिसते
वर्षों बाद भी,

बही थी यहाँ,
भूलेगा नहीं कभी,
मौत की नदी...!!!

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Arpana Sharma on December 3, 2016 at 4:00pm — 5 Comments

तुमको गीतों में ढाला तो ये कागा भी कुहक उठा- पंकज द्वारा गीत

तेरा नाम लिखा जो प्रियतम,पन्ना पन्ना महक उठा।

तुझको गीतों में ढाला तो, ये कागा भी कुहक उठा।।



मेरे शब्दों में खालीपन, एक उदासी छाई थी।

मुर्दों से बिछते कागज़ पर, मरघट सी तन्हाई थी।।



तेरा रूप उकेरा जब तो, कोहेनूर सा दमक उठा।

तुझको गीतों में ढाला तो, ये कागा भी कुहक उठा।।1।।



मैं तो ठहरा एक बावरा, इस उपवन उस उपवन भटका।

ढूँढा तुझको यहाँ वहाँ, पर माया वाले जाल में अटका।।



तेरा रूप सुमन जो महका, मन का पंछी चहक उठा।

तुझको गीतों में ढाला… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on December 2, 2016 at 4:30pm — 17 Comments

ग़ज़ल (साँस को छोड़ना भी मना है)

ग़ज़ल (साँस को छोड़ना भी मना है)

(2122 122 122)

बोलना बात का भी मना है,
साँस को छोड़ना भी मना है।

दहशतों में सभी जी रहे है,
दर्द का अब गिला भी मना है।

ख्वाब देखे कभी जो सभी ने,
आज तो सोचना भी मना है।

जख्म गहरे सभी सड़ गये हैं,
खोलना घाव का भी मना है।

सब्र रोके नहीं रुक रहा अब,
बाँध को तोड़ना भी मना है।

अब नहीं है 'नमन' का ठिकाना,
आशियाँ खोजना भी मना है।


मौलिक व अप्रकाशित

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on December 2, 2016 at 12:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल : उस्तरा हमने दिया है बंदरों के हाथ में

बह्र : 2122 2122 2122 212

 

आदमी की ज़िन्दगी है दफ़्तरों के हाथ में

और दफ़्तर जा फँसे हैं अजगरों के हाथ में

 

आइना जब से लगा है पत्थरों के हाथ में

प्रश्न सारे खेलते हैं उत्तरों के हाथ में

 

जोड़ लूँ रिश्तों के धागे रब मुझे भी बख़्श दे

वो कला तूने जो दी है बुनकरों के हाथ में

 

छोड़िये कपड़े, बदन पर बच न पायेगी त्वचा

उस्तरा हमने दिया है बंदरों के हाथ में

 

ख़ून पीना है ज़रूरत मैं तो ये भी मान लूँ

पर…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 2, 2016 at 10:23am — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - तफ़्सील में गये तो वो ख़ुद से ख़फ़ा मिले ( गिरिराज भंडारी )

221 2121   1221   212 

जो खोजते हैं रोज़ कोई मुद्दआ मिले

तफ़्सील में गये तो वो ख़ुद से ख़फ़ा मिले

 

नफरत मिली है देखिये नफरत से इस तरह  

मजबूरियों में तेल ज्यूँ पानी से जा मिले

 

हारे हुए मिलेंगे जहाँ खार कुछ तुम्हें

मुमकिन है उस जगह से मिरा भी पता मिले"  

 

हम दिल से चाहते हैं उन्हें दाद हो अता 

जो नेवले की जात हो, साँपों से जा मिले

 

बादल बरस के साथ ही ऐलान कर गया

क़िस्मत ही फैसला करे, अब तुझको क्या…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on December 2, 2016 at 9:30am — 28 Comments

ग़ज़ल - अश्क़ आए तो निगाहों को सज़ा क्या दोगे

2122 1122 1122 22



अश्क आए तो निगाहों को सजा क्या दोगे ।

है पता खूब वफाओं को सिला क्या दोगे।।



खत जो आया था मुहब्बत की निशानी लेकर ।

लोग पूछें तो जमाने को बता क्या दोगे ।



सुन लिया मैंने तेरे प्यार के किस्से सारे ।

टूट जाए जो मेरा दिल तो खता क्या दोगे ।।



मेरी किस्मत ने मुझे जब भी पुकारा होगा ।

मुझको मालूम मेरे घर का पता क्या दोगे ।।



आशियाँ जब भी उजाड़ोगे तो मुश्किल होगी ।

तेरी हस्ती ही नही मुझको हटा क्या दोगे…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on December 2, 2016 at 2:30am — 16 Comments

गजल(दाँव पर लगता रहा मैं....)

बंद हुए बैंक नोट का आत्मकथ्य

दाँव पर लगता रहा मैं
आँख में सबकी बसा मैं।1

रूप बदला, रंग बदला,
रात-दिन चंचल चला मैं।2

बन जिगर का पुरशकूं क्षण
घर भरा,कितना सहा मैं।3

फिर चलन से दूर होकर
बे-चलन अब हो गया मैं।4

रो रहा,जगता 'बटोरू',
चैन से अब सो रहा मैं।5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on December 1, 2016 at 4:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल- यूँ निभाते हैं यहाँ फर्ज निभाने वाले

2122 1122 1122 22

मांग इनसे न दुआ जख़्म दिखाने वाले ।

दौलते हुस्न में मगरूर ख़जाने वाले ।।



जो निगाहों की गुजारिश से खफा रहता है ।

कितने जालिम हैं अदाओं से जलाने वाले ।।



एक मुद्दत से तेरी राह पे ठहरी आँखें ।

क्या मिला तुझ को हमे छोड़ के जाने वाले ।।



था रकीबों का करम शाख से टूटा पत्ता ।

यूं निभाते है यहां फर्ज ज़माने वाले ।।



टूट जाते है वो रिश्ते जो कभी थे चन्दन ।

इश्क़ क्यों जुर्म है मजहब को चलाने वाले ।।



मेरी…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on December 1, 2016 at 4:00pm — 13 Comments

कुण्डलिया छंद - लक्ष्मण रामानुज

कुण्डलिया छंद 
=========
तिल हो गोरे गाल पर, निखरे गोरे गाल,
अला बला फटकें नहीं, किसकी गलती दाल
किसकी गलती दाल, पस्त हो सबकी हिम्मत 
रखें फटें में पाँव, कौन की खोटी किस्मत | 
चन्दा के भी दाग, सिन्धु में प्रेम सलिल हो 
सुन्दरता का चिन्ह, अगर गौरी के तिल हो |

- लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 1, 2016 at 3:30pm — 10 Comments

हो गया हूँ बुरा

करता रहा समझौता
सहता रहा चुपचाप सब
जब तक मैं
तब तक
अच्छा था सबकी
नज़रों में बहुत
हाँ, तुम्हारी भी तो
पर आज जब मैंने सच बोला
बोल दिया झूठ को झूठ
तो हो गया हूँ बुरा
सबसे बुरा
गिर गया हूँ गहरे
कहीं बहुत गहरे
सबकी नज़रों से
और हाँ, तुम्हारी भी तो!

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Mahendra Kumar on December 1, 2016 at 1:30pm — 10 Comments

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