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तुम तो कमाल करते हो मिश्रा जी (इस्लाह के लिए ग़ज़ल)

221 2122 2122
सौ सौ सवाल करते हो मिश्रा जी।
कितना बवाल करते हो मिश्रा जी।।

मतलब परस्त युग में प्रीत मिलेगी?
झूठा ख़याल करते हो मिश्रा जी।।

जीवन सदा परीक्षा से है गुज़रा।
किसका मलाल करते हो मिश्रा जी।।

कोई नहीं है यहाँ सुननें वाला।
काहें कराल करते हो मिश्रा जी।।

दुनिया के दर्द खुदमें भर लिया है।
मुझको निहाल करते हो मिश्रा जी।।

औरों के अश्क खुद की आँख भीगी?
तुम तो कमाल करते हो मिश्रा जी।।

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 29, 2015 at 11:40pm — 8 Comments

ज़हर अपने भी उगलते है यहाँ

यूँ भी तक़दीर बदलते हैं यहाँ

लोग गिर गिर के संभलते है यहाँ।



दोस्तों ! इक ज़रा मतलब के लिए

लोग चेहरों को बदलते है यहाँ।



माईले हिर्सो हवस है कितने

देख कर ज़र को फिसलते है यहाँ।



आँख की पुतली फिरे फिर शायद

लोग पल भर में बदलते है यहाँ।



ग़ैर की बात नहीं ऐ लोगों

ज़हर अपने भी उगलते है यहाँ।



क्या बिगाड़ेगी हवाये उनका

वो जो तूफान में पलते है यहाँ।



रोशनी बस वही फैलाते है

जो दीये की तरह जलते है यहाँ।…

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Added by MOHD. RIZWAN (रिज़वान खैराबादी) on October 29, 2015 at 11:30pm — 5 Comments

"पैंतीस का उत्सव" - (लघुकथा) 23 - शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"अंकल जी, बर्थडे का सामान दे दो , ये छोटा वाला केक कितने में मिलेगा ?" - सोनू ने बेकरी वाले से पूछा।

"डेढ़ सौ रुपये का"

जवाब सुनकर सोनू आँखें फाड़े साथियों की तरफ देखने लगा । सभी ने अपनी जेबों से पैसे निकाले। कुछ सिक्के, कुछ पुराने फटे से नोट, कुल जमा पैंतीस रुपये थे। छोटे भाई का बर्थडे तो मनाना ही है।



"लो अंकल जी, पैंतीस रुपये में छोटा सा कोई केक और बाक़ी सामान पैक कर दो !" - सोनू ने निराश हो कर कहा। बेकरी वाले को हँसी आ गई । फटे पुराने से कपड़े पहने हुए बच्चों को देखकर…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 29, 2015 at 11:00pm — 9 Comments

एक घूंट फिर सही।

117

वही !

एक घूंट फिर सही।

निराशा  के गहरे आघातों से,…

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Added by Dr T R Sukul on October 29, 2015 at 10:03pm — No Comments

सच्ची सुहागन (लघुकथा)

पूरे दिन घर में आवागमन लगा था | दरवाज़ा खोलते बंद करते श्यामू परेशान हो गया था | घर की गहमागहमी से वह इतना तो समझ चूका था कि बहूरानी का उपवास हैं | सारे घर के लोग उनकी तीमारदारी में लगें थें | माँजी सरगी की तैयारी के लिय उसे बार-बार आवाज दे रही थी | सारी सामग्री उन्हें देने के बाद वह खाना खिलाने लगा घर के सभी सदस्यों को | फिर फुर्सत हो माँजी से कह अपने घर की ओर चल पड़ा |

बाजार की रौनक देख अपनी…

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Added by savitamishra on October 29, 2015 at 8:30pm — 5 Comments

जाने ये कैसा असर जिन्दगी का। "अज्ञात"

जाने ये कैसा, असर जिन्दगी का,

फूलों की चाहत है होती सभी को,        

काँटों भरा है, सफर जिन्दगी का।

मेहनत मशक्कत सब करते हैं फिर भी,

रस्ता न आता, नज़र जिन्दगी  का।     

बदलती फिजायें , बदलता जमाना,      

अंधेरा है देखो जिधर, जिन्दगी का।        

मन की मुरादें जब पूरी न होतीं,              

तो सपना है जाता, बिखर जिन्दगी का।

गरीबों को मिलती न रोटी कहीं भी,          

ये करते हैं कैसे, बसर जिन्दगी का।

भटकता हर इंसा कुछ पाने की जिद…

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Added by Ajay Kumar Sharma on October 29, 2015 at 7:25pm — 1 Comment

लो अब तुम्हारी राह मे दीवार हम नहीं।

तुमने उठाई राह मे दीवार हम नहीं

फिर भी कह रहे हो गुनहगार हम नहीं।



उम्मीद कर रहा हूँ वफ़ा की उन्ही से मैं

कहते हैं जो किसी के तलबग़ार हम नहीं।



दिल मे नज़र मे तुम हो तो फिर किस तरह कहें

ऐ दोस्त अब भी करते तुम्हें प्यार हम नहीं।



दुनिया की ठोकरों ने गिरा कर ही रख दिया

लो अब तुम्हारी राह मे दीवार हम नहीं।



वो तो शगुन मे आज अंगूठी भी दे गये

हम लाख कह रहे थे की तैयार हम नहीं।



हम उसकी धुन में हैं तो ज़माने की क्या… Continue

Added by MOHD. RIZWAN (रिज़वान खैराबादी) on October 29, 2015 at 7:00pm — 2 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ऐ सुखनवर साथ चल -- (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

2122---2122---2122---212

 

दौर बदला है, बदल जा,   ऐ सुखनवर साथ चल 

सोचता है जिस जबां में, उस जबां में लिख ग़ज़ल

 

जिंदगी बदलाव है...... गर थम गए…

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Added by मिथिलेश वामनकर on October 29, 2015 at 2:44pm — 36 Comments

सरकार पर व्यंग्य बाण " अज्ञात "

काश कि सरकार,                           

अपने चक्षुओं से देख पाती,                  

यदि वोट की खातिर वो,                             

दोनों हाथ से धन न लुटाती।                  

तो देश की सारी व्यवस्था,                       

इस तरह न चरमराती।                                

काश कि सरकार,                           

अपने चक्षुओं से देख पाती।                                            

छोड़ निंदा रस कहीं,                          

गर…

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Added by Ajay Kumar Sharma on October 29, 2015 at 1:42pm — 7 Comments

"जश्न पर जश्न" - (लघुकथा) 22 - शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"जश्न पर जश्न" - (लघुकथा)



"आदरणीय, आज तुम मुझे बार-बार यूँ घूर-घूर कर क्यों देख रहे हो, अपनी इन उँगलियों से मुझे बार-बार यूँ क्यों छू रहे हो ?' - उसने कुछ इतराते हुए पूछा।



"प्रिये, आज तुम पहले से ज़्यादा ख़ूबसूरत लग रही हो, तुम्हारा प्रत्येक अंग, हर एक हिस्सा मुझे सुंदर और मुस्कराता सा लग रहा है !"



"और तुम, तुम भी तो बहुत दिनों बाद बहुत ख़ुश नज़र आ रहे हो, तभी तो तुम मेरे लिए नई श्रंगार सामग्री लाये हो, वरना कब जाते हो तुम बाज़ार। तुम्हें तुम्हारे तरीक़े से जश्न… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 29, 2015 at 11:31am — 7 Comments

उत्सव –( लघुकथा ) -

उत्सव –( लघुकथा ) -

"नाना जी, इस बार दीवाली पर पूरे मकान को बिजली की लडियों से ढक दैंगे, सारा घर जगमग करेगा"!

"नहीं छुट्टू, इस बार दीवाली पर यह सम्भव नहीं होगा"!

"किसलिये नाना जी"!

"छुट्टू, तेरी नानी,तेरे पापा और तेरी मॉ की बरसी होना बाकी है,उसके बाद ही हम कोई उत्सव मना सकते हैं"!

"यह तो और भी अच्छा है, एक साथ ही दौनों काम कर लेते हैं, दीवाली पर ही बरसी मना लेते हैं"!

"छुट्टू, बरसी एक साल पूर्ण होने पर पंडित जी द्वारा दी गयी तिथि पर  ही होती…

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Added by TEJ VEER SINGH on October 29, 2015 at 11:23am — 8 Comments

आता है जीना जिंदगी हूँ मैं

तुम सोचते हो जो नहीं हूँ मैं
जो कुछ भी मैं हूँ वो यही हूँ मैं। 

दुश्वारियाँ करती नहीं व्याकुल
आता है जीना जिंदगी हूँ मैं। 

जो सोचना है सोचिए साहब
मैं जानता हूँ कि सही हूँ मैं। 

साहिल से यारी मैं करूँ कैसे
जाना है आगे इक नदी हूँ मैं। 

अच्छा किसे लगता भला जलना
पर क्या करूँ कि रोशनी हूँ मैं । 

नीरज कुमार नीर / मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neeraj Neer on October 28, 2015 at 11:08pm — 12 Comments

बेरोजगारी / लघुकथा

कमरे में घुसते हुए वह अपनी चाल को संतुलित कर रहा था ,पर बैठते हुए थोडा़ लड़खड़ा गया ।



" आज इतनी देर कैसे कर दी आपने , कहाँ रह गये थे , खाना लगा दूँ ? " बाहर आॅफिस , घर में बेरोजगार पति , दोनों को ही काँच के बर्तन के समान संभालने की जिम्मेदारी भी वह बखूबी निभा रही थी कि आज ऐसे ....!



नजदीक जाकर गौर से देखी तो उनकी आँखें लाल हो रही थी । अचानक वह सोफे पर ही लुढ़क गया । एक पल के लिए उसकी धड़कन जैसे रूक गई ।



" क्या आपने ड्रग लिया है ...? "



" हाँ " अधनींदे… Continue

Added by kanta roy on October 28, 2015 at 8:36pm — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल-- बढ़िया है-- (मिथिलेश वामनकर)

22—22—22—22—22—2

 

गुलशन में फिर भौंरा आया,  बढ़िया है

फूलों से काटों का नाता,  बढ़िया है

 

आज उफ़क तक सरसों देखी, दिल बोला-…

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Added by मिथिलेश वामनकर on October 28, 2015 at 4:03pm — 15 Comments


प्रधान संपादक
एक और पड़ाव (लघुकथा)

बहुत बरसों के बाद वह स्वयं को को बहुत ही हल्का हल्का महसूस कर रहा थाl न तो उसे सुबह जल्दी उठने की चिंता थी, न जिम जाने की हड़बड़ी और न ही अभ्यास सत्र में जाने की फ़िक्रl लगभग ढाई दशक तक अपने खेल के बेताज बादशाह रहे रॉबिन ने जब खेल से संन्यास की घोषणा की थी तो पूरे मीडिया ने उसकी प्रशंसा में क़सीदे पढ़े थेl समूचे खेल जगत से शुभकामनाओं के संदेश आए थेl कोई उस पर किताब लिखने की बात कर रहा था तो कोई वृत्तचित्र बनाने कीl उसकी उपलब्धियों पर गोष्ठियाँ की जा रही थींl किन्तु वह इन सबसे दूर एक शांत…

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Added by योगराज प्रभाकर on October 28, 2015 at 4:00pm — 12 Comments

भारतीय स्त्री और आभूषण

नवरात्र के दिनों में सामने वाले घर में रहने वाली अधेड़ आयु की स्त्री के हाथों में लाल कांच की चूड़ी देखकर बिल्डिंग में रहने वाली सभी महिलाये चौंक गई, " ओह, तो इसका मतलब इनके पति हैं"! वह महिला अपने दो युवा बच्चों के साथ इस फ्लैट में रहने नई नई आई थी! प्रायः वह महिला कोई साज श्रृंगार नहीं करती थी जिससे सभी ने मन ही मन ये विचार बना लिया था वह शायद विधवा हैं लेकिन नवरात्र की पूजा के दिनों में साज श्रृंगार से पूर्ण उस महिला को देखकर अन्य महिलाओं के मन में खलबली मच गयी! आखिर पूछ ही लिया "आपके…

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Added by Rajni Gosain on October 28, 2015 at 12:57pm — 3 Comments

अपराध बोध (लघुकथा )

भरी दोपहरी मई के महीने में वो दरवाज़े पर आया और ज़ोर ज़ोर से आवाज़ लगाने लगा खान साहब…….. खान साहब……..| मेरी आँख खुली मैंने बालकनी से झाँका | एक ५५-६० साल का अधबूढ़ा शख्स, पुराने कपड़ों, बिखरे बाल और खिचड़ी दाढ़ी में सायकल लिए खड़ा है। मुझे देखते ही चिल्ला पड़ा फलाँ साहब का घर यही है| मैंने धीरे से हाँ कहा और गर्दन को हल्की सी जेहमत दी | वो चहक उठा उन्हें बुला दीजिये | मैंने कहा अब्बा सो रहे हैं, आप मुझे बताएं | उसने ज़ोर देकर कहा, नहीं आप उन्हें ही बुला दीजिये , कहियेगा फलाँ शख्स आया है। मुझे बड़ा…

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Added by नादिर ख़ान on October 28, 2015 at 12:30pm — 7 Comments

अधूरी ख्वाहिशें - ( लघुकथा ) -

अधूरी ख्वाहिशें - ( लघुकथा ) -

  कीर्ति के शिखर पर बैठे एक खिलाड़ी ने जब सन्यास ले लिया तो उसके कुछ समय पश्चात. पत्रकार सुधीर  जिज्ञासा वश ढूंढता हुआ, उसका साक्षात्कार लेने, उसके पैत्रिक गॉव जा पहुंचा!गॉव के बाहर ही एक व्यक्ति मैले कुचैले वस्त्रों में सिर पर गोबर का टोकरा ले जाता दिखा!सुधीर ने उससे भूतपूर्व बालीबाल खिलाडी रघुराज सिंह का घर पूछा!

"क्या करोगे भाई उसके घर जाकर"!

“मुझे उनका साक्षात्कार लेना है"!

"एक गुमनाम आदमी का साक्षात्कार,क्यों मज़ाक करते…

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Added by TEJ VEER SINGH on October 28, 2015 at 11:43am — 5 Comments

"दो लावणी छंद व दो मुक्तक " - [काव्य रचना] / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

दो छंद व दो मुक्तक --



दो लावणी छंद--



[30 मात्रा/ 16 व 14 पर यति/ अंत में 21वर्जित

/ मापनी मुक्त]





कराये जब स्तनपान शिशु को,

माँ ममता ही बरसाये,

आधुनिका तो बस तरसाती,

ख़ुद ममता को झुठलाये।

इतरा रही हैं नव- वधुयें,

आधुनिक सोच अपनाकर,

पश्चिमी फैशन की नकल पर,

शरीर अपना ढलवाकर।

[1]



यकीन नहीं तो यकीन करो,

रिश्ते बनते जाएंगे,

यकीन के दम पर सब जीते,

सभी प्रेम बरसायेंगे।

आस्था छोड़ी जिसने… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 28, 2015 at 9:47am — 3 Comments

कंगली (लघुकथा )

साक्षी ने सारी सीमाएं विवाह पूर्व ही तोड़ दी थी ।विवश हो उसके प्रेम विवाह को सहमति देनी पड़ी लेकिन विवाह के मात्र आठ माह बाद तीन माह की पुत्री को लेकर लौट आयी थी । बिटिया तीन वर्ष की हो गयी थी ।साक्षी ने पुनः विवाह कर लिया बेटी ननिहाल में ही पल रही थी।इसी बात से संतोष था की वह ससुराल में रम जाय लेकिन -

" माँ अब मैं उस घर नहीं जाउंगी।"



"क्यों ? अब क्या हो गया ?"



"उसे पत्नी नहीं माँ के लिए नौकरानी चाहिए थी और वह तो पूरा कंगला हैं ,मैंने तो उसकी चमक देख ब्याह किया… Continue

Added by Archana Tripathi on October 27, 2015 at 11:52pm — 13 Comments

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