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पाखण्डी समाज (कहानी)

सांझ का समय था. किसनलाल अपने बेलों को चारा खिलाने में मग्न था. मंद-मंद पूरबा चल रही थी. कुछ पल के लिए वह ठिठक गया और कमर सीधी करते हुए नथुना फूलाकर इधर-उधर सर घुमाते हुए कुछ पयान करने लगा. जोर-जोर से वह सांसें भर रहा था, सीआईडी कुत्ते की तरह जैसे किसी चीज का सुराग खोज रहे हो. हाँ, वह सुराग ही खोज रहा था. बासमती चावल की खीर की सुगंध का सुराग. खीर की सुगंध आ कहां से रही थी इसका अंदाजा लगाने का वह भरसक प्रयास कर रहा था.…

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Added by Govind pandit 'swapnadarshi' on September 6, 2015 at 11:00am — No Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी ,,,,,,,

2122  2122  2122  212

यार मेरे आज फिर से दिल दुखाने आ गए

इस बहाने वो चलो मिलने मिलाने आ गए

जब कभी परदेश में  मुझको सताया यादों ने

साथ देने दादी के किस्से सुहाने आ गए

बोझ से लगते हैं उनको आज बूढ़े माँ-पिता

जेब में  बच्चों के जब भी चार आने आ गए

पढ़ किताबें शहर से जब गाँव आया तो मुझे

बस अना से दूर रहना सब बताने आ गए

कर चुका मैं मय से तौबा फिर हुआ ऐसा यहाँ

हुश्न वाले आँखों से मुझको पिलाने…

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Added by gumnaam pithoragarhi on September 6, 2015 at 9:17am — 5 Comments


प्रधान संपादक
गुरु गोविन्द (लघुकथा) - शिक्षक दिवस पर विशेष

"देख ली अपने चेले की करतूत?" वयोवृद्ध शायर के सामने एक पत्रिका को लगभग फेंकते हुए एक समकालीन ने कहा। 

"क्या हो गया भाई ? इतना भड़क क्यों रहे हो ?"

"इसमें अपने चेले का आलेख पढ़िए ज़रा।" 

"कैसा आलेख है?"

"आपकी ग़ज़लों में नुक्स निकाले हैं उसने इस पत्रिका में, आपकी ग़ज़लों में। मैं कहता था न कि मत सिखाओ ऐसे कृतघ्न लोगों को?" 

समकालीन बोले जा रहे थे, किन्तु वयोवृद्ध शायर बड़ी तल्लीनता से आलेख पढ़ने में व्यस्त थे। 

"देख लिया न? अब बताइए, क्या मिला आपको ऐसे लोगों…

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Added by योगराज प्रभाकर on September 5, 2015 at 5:19pm — 19 Comments

ग़ज़ल

२ १ २ २ १ १ २ २ १ १ २ २ २ २

याद तेरी को ऐसे दिल में छुपा रक्खा है 

राह जिस पे चले उस को भी भूला रक्खा है 

लोग सो जाए हमें नींद न आती है अब ,

रात कैसा तेरा अब साथ निभा रक्खा है 

क्यूँ बता दी हमें उसकी ये कहानी तुमने ,

जो  रहा…

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Added by मोहन बेगोवाल on September 5, 2015 at 4:30pm — 4 Comments

हस्ताक्षर

उकेर दिया है

समय की रेत पर

अपना हस्ताक्षर.

जानता हूँ

ख़त्म हो जाएगा

रेत के बिखराव से

मेरा वज़ूद.

संभावना यह भी

किसी संकुचन क्रियावश

घनीभूत हो रेत

प्रस्तर बन जाय .

तब देख पाओगे

खंडित होने तक

मेरा हस्ताक्षर.

कुच्छ भी तो नहीं है

अनंत.

(विजय प्रकाश)

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on September 5, 2015 at 1:30pm — 12 Comments

शिक्षा का महत्त्व --- डॉo विजय शंकर

"यार , शिक्षा , आई मीन , एजुकेशन , है बड़ी इम्पॉर्टेंट चीज़।"
"अच्छा तुझे भी टीचर्स डे पर ही शिक्षा याद आ रही है "
"हाँ यार , गागर में सागर भर देती है , सागर से मोती निकालना सिखा देती है। "
"ठीक कहते हो यार, पर लगता नहीं यार कि हमारे यहां तो लोग पढ़ कर या तो सागर पार चले जाते हैं ,
या फिर इस पार रेत माफिया जैसे बन कर रह जाते हैं। "
"तुम्हारा मतलब सागर में उतरता कोई नहीं। "

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on September 5, 2015 at 11:30am — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बता क्या होगा?-- ग़ज़ल -- (मिथिलेश वामनकर)

2122—1122—1122—22

 

मेरी नींदों को सताने से बता क्या होगा?

इस तरह ख़ाब में आने से बता क्या होगा?

 

आज अहसास का सागर जो कहीं गुम यारों  …

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Added by मिथिलेश वामनकर on September 5, 2015 at 10:00am — 24 Comments

तो क्या ? (लघुकथा) शिक्षक दिवस पर विशेष

"बहू, पेपर पढ़ा आज का ? एक तरफ द्रोणाचार्य पुरस्कार पाने वाले शिक्षकों के बारे में लिखा है ,वहीँ दूसरी तरफ एक दूसरे गुरूजी  की महिमा मंडिता है I ये महाशय अपने शिष्यों से दूसरों  के खेतों से सब्जी और भुट्टे  चोरी  करवा के मंगवाते हैं " दादाजी भुनभुना रहे थे I

"ये तो कुछ भी नहीं है बाबूजी Iआजकल के टीचर्स के बारे में कितनी बातें पढने में आती हैं ,जिन्हें पढ़कर सिर शर्म से झुक जाता है "बहू ने अपना ज्ञान जोड़ा I

"तो क्या हो गया दादाजी ?"  ये 17..18 वर्ष का पोता थाI

"क्या हो गया…

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Added by pratibha pande on September 5, 2015 at 9:00am — 16 Comments

चलो! दुआ ये अभी बैठकर /श्री सुनील

1212 1122 1212 22/112



चलो! दुआ ये अभी बैठकर ख़ुदा से करें

कुछेक मुश्किलों के हल तो अब दुआ से करें.



वो अम्नो चैन यहाँ यूँ बह़ाल हों शायद

ख़िरद से काम लें गर बात क़ाइदा से करें.



अ़जीब नस्ल के इस दर्द पे कहा ये तबीब

अब ऐसे दर्द का दरमां भी किस दवा से करें.



ख़ुदा है सबपे, अगर सच यही है तो ऐ दिल!

चराग़ तू तो जला, बात क्या हवा से करें.



वो ख़ुशनिहाद है, ख़ुशदिल है, ख़ुशज़बाँ है तो

अब ऐसे शख्स का पैमाई किस उला से…

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Added by shree suneel on September 5, 2015 at 1:00am — 6 Comments

ग़ज़ल :- थक गया मैं

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ा



समझा समझा कर हरजाई थक गया मैं

दुनिया फिर भी समझ न पाई थक गया मैं



मेरे घर में पाँव न रक्खा ख़ुशियों ने

बजा बजा कर ये शहनाई थक गया मैं



पूरा करते करते सात सवालों को

कहता है अब हातिम ताई थक गया मैं



जाहिल आक़िल को तस्लीम नहीं करते

करते करते उनसे लड़ाई थक गया मैं



मेरी बुराई करते करते आज तलक

थक न पाई सारी ख़ुदाई थक गया मैं



मैंने सबसे मिलना जुलना छोड़ दिया

दरवाज़े पर लिख दो भाई थक… Continue

Added by Samar kabeer on September 4, 2015 at 10:00pm — 23 Comments

बचत (लघुकथा)

अन्य  दिनों की अपेक्षा , सुमेर के चेहरे पर तनाव की जगह संतोष झलक रहा था . उनके मन में पत्नी के प्रति क्रतज्ञता के भाव बार - बार उभर कर , शब्दों के माध्यम से निकलना चाहते थे . " बहुत बार तुम जटिल सिचुऐशन को भी बड़े अच्छे से टेकल कर लेती हो . मुझे जरा भी उम्मीद नहीं थी कि इस मामले में इतनी आसानी से सफलता मिल जाएगी .वरना भागीरथ - बाबू ने तो डरा ही दिया था .”  खाने की थाली में चपाती की मांग के साथ उसने  पत्नी की तारीफ़ की . 

 " लो यह क्या बात हुई , जी ! हम उस पुलिसीए को कुछ दे ही रहे…

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Added by सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा on September 4, 2015 at 9:00pm — 5 Comments

यादों के दरीचों में .....

यादों के दरीचों में .....

सच, तुम्हारी कसम

उस वक्त तुम बहुत याद आये थे

जब सावन की पहली बूँद

मेरी ज़ुल्फ़ों से झगड़ा करके

मेरे रुखसारों पर

फिसलने की ज़िद करने लगी

सबा को भी उस वक्त

मेरी ज़ुल्फ़ों से

छेड़खानी करने की ज़िद थी

इस छेड़खानी में कभी बूंदें

रेतीली ज़मीन पर गिर कर

अपना अस्तित्व खो देती थी

तो कभी पलकों की चिलमन पर

सज के बैठ जाती थी

कभी हौले से

रुख़्सार पर फिसलती हुई

मेरी ठोडी पर

किसी को प्यार के…

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Added by Sushil Sarna on September 4, 2015 at 8:13pm — 10 Comments

मित्रता की परिभाषा (लघुकथा)

काम से शहर आते वक्त धीरज ने मोतीचूर के लड्डू भी ले लिए अपने कमिश्नर हो चुके बचपन के मित्र नील के लिए । उत्साह भरे कदमों से जैसे ही बंगले में कदम रखा कि गार्ड ने रोक लिया । गार्ड के रोके जाने के बाद भी उसे उम्मीद थी कि उसका नाम सुनते ही नील दौड़ा आयेगा लेकिन गार्ड की नजरों के गहरे भाव नें मित्र की व्यस्तता की सूचना के साथ ही वो भ्रम भी तोड़ दिया। 

लड्डू के डिब्बे पर नजर गई तो वो सकुचा उठा ।गार्ड मानों उसे ताड़ चुका था ।

"साहब तो काजू कतली के सिवा कोई मिठाई नहीं खाते है । "

"ओह…

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Added by jyotsna Kapil on September 4, 2015 at 4:30pm — 15 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
इसी तरह से ग़ज़ल हुई है -- (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

121-22---121-22---121-22---121-22

 

मेरी पुरानी जो वेदना थी वो आज थोड़ी सबल हुई है

ज़रा सी फिर आँख डबडबाई इसी तरह से ग़ज़ल हुई है

 

खुदा के अपने ये…

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Added by मिथिलेश वामनकर on September 4, 2015 at 10:00am — 30 Comments

ग़ज़ल -- कौन है यह रूबरू.... दिनेश कुमार

2122-2122-2122-212



वक़्त के गुज़रे हुए लम्हात की तफ़्सीर है

मेरी हस्ती मेरी माँ के ख़्वाब की ताबीर है



मुझको दुनिया भर की दौलत से नहीं कुछ वास्ता

मेरे क़दमों में पड़ी अलफ़ाज़ की जागीर है



आइना देखा जो बरसों बाद, मैं हैरान हूँ

कौन है यह रूबरू, किस शख़्स की तस्वीर है



अहले महफ़िल के लिए बेशक मआनी और हो

शाइरी मेरे ग़मों की पुरख़लिश तहरीर है



नित नई परवाज़ केवल ख़्वाब ही रह जाएगा

इन परिन्दों को बताओ बुज़दिली ज़ंजीर है



भूख… Continue

Added by दिनेश कुमार on September 4, 2015 at 7:00am — 7 Comments

आखिरी सलाम (लघुकथा)

आज उस के चेहरे पर ख़ुशी झलक रही थी । परनीत को लगा जैसे सपना पूरा हो रहा हो । परिवार में ख़ुशी और उदासी दोनों एक साथ नजर आई। पहले जब वो बगैर वीज़ा लोटा तो कई दिन वह उदास रहा था,उसे लगा शायद वह जा न पाऐगा, मगर ऐजेंट ने हौसला देते हुए पूरा यकीन दिलाया था कि बैंड भी पूरे और खाते में बनती रकम भी जमा हो गई है । पर इस बार वीज़े के साथ जाने की टिकट मिल गई । जैसी हवा चली हर कोई , अब तो पूरे एवन्यू में कोई ऐसा घर नहीं जिस में परनीत की उम्र का कोई लड़का हो । परनीत के  ज्यादातर साथी भी स्टूडेंट वीज़ा से बाहर…

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Added by मोहन बेगोवाल on September 3, 2015 at 9:00pm — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
इतना तो काम आप को करना पड़ेगा जी -- (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

221—2121—1221-212

 

इतना तो काम आप को करना पड़ेगा जी

जन्नत जो देखना है तो मरना पड़ेगा जी

 

माना कि बादशाहे-आसमां है वो…

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Added by मिथिलेश वामनकर on September 3, 2015 at 2:28pm — 12 Comments

न्यूज़ (लघुकथा) - डॉo विजय शंकर

" अरे यार ये टीo वीo चैनेल वाले भी बस क्या क्या दिखाते रहते हैं , हफ़्तों - महीनों। कभी किसी बाबा को , कभी किसी स्वामिनी को या फिर पारिवारिक रंजिशें।

बस यही देश की न्यूज़ रह गई है ? "

" उनकीं नज़र में यही न्यूज़ है , वो बचपन में पढ़े थे न , कुत्ता आदमी को काटे तो न्यूज़ नहीं होती है , हाँ , आदमी कुत्ते को काटे तो न्यूज़ होती है , किसी बड़े खबरची ने कहा है।"

" पता नहीं , यार , हम तो कभी कुत्ते को काटे नहीं , वो हमारे सामने काट के दिखाता तो पता चलता , उसे भी और हमें भी। "…

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Added by Dr. Vijai Shanker on September 3, 2015 at 11:00am — 23 Comments


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ग़ज़ल - जैसे अपना बयान छोड़ गये ( गिरिराज भंडारी )

2122  1212  112/22

ज़ख़्म  सूखे निशान छोड़ गये

जैसे अपना बयान छोड़ गये

 

लौट के यूँ गये मेरे दिल से

मानो ख़ाली मकान छोड़ गये

 

सारी खुश्बू हवायें ले के गईं  

ये भी सच है कि भान छोड़ गये

 

राग खुशियों के छिन्न भिन्न किये

मित्र, ग़मगीन तान छोड़ गये

 

उड़ गये जब परिंदे बाग़ों से

पीछे सब सून सान छोड़ गये 

 

हाले दिल क्या बयान कर पाते ?

हम से कुछ बे ज़ुबान छोड़ गये

 

खुद चढ़ाई चढ़े…

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Added by गिरिराज भंडारी on September 3, 2015 at 10:54am — 26 Comments

पावस

55
ए पावस!
तू पायेगी यश ,
कुछ मेरी भी सुन ले। 
भीगी, इन पलकों के मोती तू चुन ले।
भीगे वसन को सुखा लूँ,
चार पल पर्ण कुटिया सुधारूं,
तू भी तब तक कुछ आराम लेले, 
साॅंस मेरी भी कुछ चैन पाये,
नींद ये नैन पायें , 
कुछ ऐंसा तू गुन ले।
शीत भी न हुआ मीत मेरा,
ग्रीष्म ने भी न व्रत भीष्म तोड़ा,
उसने ठिठुराया तड़पाया इसने, 
पवन पावन ने कितना…
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Added by Dr T R Sukul on September 3, 2015 at 10:30am — 4 Comments

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