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ग़ज़ल :- थक गया मैं

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ा

समझा समझा कर हरजाई थक गया मैं
दुनिया फिर भी समझ न पाई थक गया मैं

मेरे घर में पाँव न रक्खा ख़ुशियों ने
बजा बजा कर ये शहनाई थक गया मैं

पूरा करते करते सात सवालों को
कहता है अब हातिम ताई थक गया मैं

जाहिल आक़िल को तस्लीम नहीं करते
करते करते उनसे लड़ाई थक गया मैं

मेरी बुराई करते करते आज तलक
थक न पाई सारी ख़ुदाई थक गया मैं

मैंने सबसे मिलना जुलना छोड़ दिया
दरवाज़े पर लिख दो भाई थक गया मैं

मिहनत मज़दूरी से पेट नहीं भरता
सहते सहते ये मँहगाई थक गया मैं

देखो मेरा हाथ "समर" के सर पर है
सच कहता हूँ 'सौरभ' भाई थक गया मैं

"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 9, 2015 at 10:17am

आदरणीय समर साहब, आपकी मुहब्बतों और आत्मीयता के लिए हृदयतल से धन्यवाद. 

सादर

Comment by Samar kabeer on September 8, 2015 at 10:46pm
जनाब श्री सुनील जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on September 8, 2015 at 10:45pm
आली जनाब डॉ विजय शंकर जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on September 8, 2015 at 10:44pm
जनाब राहुल डांगी जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on September 8, 2015 at 10:43pm
जनाब रवि शुक्ल जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ,आपकी तहरीर के लहजे से जनाब सौरभ पांडे जी की याद आती है,क्या आप इलाहबाद से हैं ?
Comment by Samar kabeer on September 8, 2015 at 10:38pm
जानब गिरिराज भंडारी जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on September 8, 2015 at 10:37pm
जनाब दिनेश कुमार जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on September 8, 2015 at 10:36pm
जनाब मिथिलेश वामनकर जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on September 8, 2015 at 10:36pm
जनाब मनोज कुमार अहसास जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on September 8, 2015 at 10:33pm
जनाब सौरभ पांडे जी,आदाब,ग़ज़ल आपको पसंद आ गई,लिखना सार्थक हुवा,इस ग़ज़ल को ज़िंदा रखने में आपका योगदान मैं कभी नहीं भूलूँगा,अब रही मक़्ते की बात ,मक़्ता पहले मैंने इस तरह कहा था :-

"देखो मेरा हाथ "समर" के सर पर है
सच कहता हूँ मेरे भाई थक गया मैं"

फिर आपके योगदान को याद रखते हुए इसमें आपका नाम शामिल किया और अब ये इसी तरह रहेगा ,मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि मक़्ता तनाफ़ुर का शिकार है लेकिन मेरे दोस्त इस मक़ूले को याद करते हुए कि "मोहब्बत और जंग में सब जाइज़ है",हा हा हा.... ।

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