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हालात .....

नियम/अनुशासन

सब आम लोगों के लिए है

जो खास हैं

इन सब से परे हैं

उन पर लागू  नहीं होते

ये सब

ख़ास लोग तो तय करते हैं

कब /कौन/ कितना बोलेगा

कौन सा मोहरा

कब / कितने घर चलेगा

यहाँ शह भी वे ही देते हैं  

और मात भी

आम लोग मनोरंजन करते हैं   

आम लोगों का रेमोट

ख़ास लोगों के हाथों में होता है  

वे नचाते हैं

आम लोग नाचते हैं.....

मगर हालात

हमेशा एक जैसे नहीं होते

और न ही…

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Added by नादिर ख़ान on January 8, 2014 at 12:00pm — 11 Comments

घनाक्षरी छंद - मन हरण

गीत भी लिखे कलम भारती के गान के तो,
कागज भी नाच के ही आन करने लगा

वंदन हजार माँ को छंद ने किये है और 
पंक्ति पंक्ति लिख के ही गान करने लगा 

स्याही शूर वीरता के मंत्र लिखती गयी तो  
अक्षर भी अक्षर का मान करने लगा 

देशप्रेम वाला भाव मन में बसा लिया तो   
शब्द शब्द राष्ट्र को सलाम करने लगा 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

आशीष ( सागर सुमन)  

Added by Ashish Srivastava on January 8, 2014 at 11:00am — 12 Comments

क़द बढ़े लेकिन, वो बौरे हो गए.........

जब कभी भी भोर के मालिक अँधेरे हो गए

क़ाफ़िलें लुटते रहे , रहबर लुटेरे हो गए

कुछ हुयी इंसान में भी इस तरह तब्दीलियाँ

क़द बढ़े लेकिन , वो बौरे हो गए

हो गयी खुशबू ज़हर इस दौर में

बाग़ में , साँपों के डेरे हो गए

ग़र बँटी धरती कहाँ तेरा चमन रह जायेगा

भूल है तेरी अलग तेरे बसेरे हो गए

झूठ तो देखो इधर किस क़दर धनवान है

और उधर नीलाम सच के घर बसेरे हो गए



आदमी डरता था पहले , रात में ही "अजय" …

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Added by ajay sharma on January 7, 2014 at 11:00pm — 7 Comments

साथ (अखंड गहमरी)

अपनो से दूर

अपने पराये

पराये अपने

चुटकी भर

सिंदूर से

पास मेरे

तन मन

अर्पण

मैं सुखी

उसकी खुशी

हर चाहते

सपने उमंग

चेहरे पर तेज

हर पल साथ

साँसो के साथ

मेरे अपने

उसके अपने

निर्स्‍वाथ सेवा

हम दो शब्‍द

प्‍यार के नहीं

जज्‍बातो से खेलते

हर सपने तोड़ते

शिव है हम

मगर वह सीता

सह गयी जुल्‍म

मगर ना मिला

राम को…

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Added by Akhand Gahmari on January 7, 2014 at 11:00pm — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
छन्द कुण्डलिया

१.      “ मैं ”

 

मैं-मैं तू करके हुआ, भौतिक सुख में लीन

अहम् भाव और देह की, रहा बजाता बीन

रहा बजाता बीन , नहीं  ‘मैं’ को पहचाना  

परम तत्व को  भूल ,जोड़ता रहा खजाना    

क्या  दिखलाकर दाँत,  करेगा केवल हैं हैं ?

जब पूछें यमराज, कहाँ बतला  तेरा  मैं ||

 

२.      “ तुम “

 

तुम-मैं मैं-तुम एक है , परम ब्रम्ह का अंश  

जाति- धर्म  इसका नहीं , और न कोई वंश

और न कोई वंश ,यही तो अजर - अमर…

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Added by अरुण कुमार निगम on January 7, 2014 at 10:57pm — 12 Comments

आने वाले साल का हर दिन हो शुभ !

मुट्ठी से रेत की तरह

फिसल गया ये साल भी

पिछले साल की तरह,

वही तल्खियाँ, रुसवाइयाँ,

आरोप, प्रत्यारोप,बिलबिलाते दिन

लिजलिजाती रातें, दर्द, कराहें

दे गया सौगात में |



सोचा था पिछले साल भी

होगा खुशहाल, बेमिशाल

लाजवाब आने वाला साल,

भर लूँगी खुशियों से दामन

महकेगा फूलों से घर आँगन

खुले केशों से बूँदें टपकेंगी

दूँगी तुलसी के चौरा में पानी

बन के रहूँगी राजा की रानी |



हो गया फिर से आत्मा का चीरहरण…

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Added by Meena Pathak on January 7, 2014 at 1:15pm — 31 Comments

विरोध

सुन्दर दृश्य उत्पन्न करती हैं

एक साथ जलती ढेरों मोमबत्तियाँ

 

भीड़ से घिरी उनकी रोशनी

कसमसाकर दम तोड़ देती है

 

वातावरण में घुले नारे

खंडहर में पैदा हुई अनुगूँज की तरह

कम्पन पैदा करते हैं

 

सर्द हवाएँ

काँटों की तरह चुभती हैं

 

अँधेरा गहराता जा रहा है 

___

बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by बृजेश नीरज on January 7, 2014 at 1:00pm — 34 Comments

!!! नवगीत !!!

!!! नवगीत !!!

अंधेरों सी घुटन में, जमीं के टूटते तारे।

सहम कर बुदबुदाते, बिफर कर रो रहे सारे।।

उजालों ने दिए हैं, घोटालों की निशानी।

दिए हैं झूठ के रिश्ते, फरेबी तेल की घानी।

जली है अस्मिता बाती, हुए हैं ताख भी कारे।

नजर की ओट में रहकर, नजर की कोर भी पारे।।1

सलोना  चॉद सा मुखड़ा,  चॉदनी पाश के पट में।

छले जनतन्त्र अक्सर अब, नदी तरूणी लुटे पथ में।

तड़फती रेत सी समता, पवन में खोट है सारे।

जमे हैं पाव…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on January 7, 2014 at 11:37am — 6 Comments

दुर्मिल सवैया !! मां शारदे !!

दुर्मिल सवैया !! मां शारदे !!

सहसा प्रतिभा समभाष करें, तुम आदि-अनादि अनन्त गुणी।
तप से, वर से नित धन्य करें, कवि-लेखक संग महन्त गुणी।।
गुण-दोष समान विचार रखें, नित नूतन कल्प भनन्त गुणी।
भव सागर में जब याद करें, पतवार लिए तुम सन्त गुणी।।

के0पी0सत्यम मौलिक व अप्रकाशित

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on January 7, 2014 at 11:00am — 7 Comments

पतंगबाजी उर्फ तमन्नाओं की ऊँची उड़ान

पतंगबाजी उर्फ तमन्नाओं की ऊँची उड़ान

तमन्नाओं की ऊँची उड़ान

का आभास हुआ

जब कुछ बच्चों को

घर की मुंडेर

पर चढ़कर

पतंग उड़ाते देखा

अलग अलग रंगों की

छटा बिखेरती,

ऊँची और ऊँची

चढ़ रही थी

आसमान में

परिंदे उड़ते हैं जैसे ।

मेरी पतंग ही रानी है

शायद यही सोचकर

लड़ाया पेंच एक बच्चे ने

दूसरी पतंग…

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Added by mohinichordia on January 7, 2014 at 10:30am — 8 Comments

यादों का वो इक सफ़र है नाम दे गया [सरिता भाटिया]

जाने वाला साल सब सुख चैन ले गया

नयनों में है नीर दिल में दर्द दे गया /



क्या मनाएं साल उस बिन अब लगे न दिल

एक झटके में सभी अरमान ले गया /



मुस्कराएँ हम क्या तेरे बिन ओ साथी अब

खुशिओ का तू सारा ही सामान ले गया /



उसकी हर आहट का होता है मुझे गुमाँ

खुद को समझायें क्या वो संसार से गया /



याद आती उसकी है अब रात रात भर

यादों का वो इक सफ़र है नाम दे गया /



काटना है अब अकेले उस बिना सफ़र

जिन्दगी भर का गमे…

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Added by Sarita Bhatia on January 7, 2014 at 10:00am — 17 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
कुण्डलिया : मैं-तुम-हम // --सौरभ

'मैं-तुम’ के शुभ योग से, 'हम’ का आविर्भाव

यही व्यष्टि विस्तार है, यही व्यष्टि अनुभाव

यही व्यष्टि अनुभाव, ’अपर-पर’ का संचेतक    

’अस्मि ब्रह्म’ उद्घोष, ’अहं’ का धुर उत्प्रेरक

’ध्यान-धारणा’  योग, सतत…

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Added by Saurabh Pandey on January 7, 2014 at 1:00am — 24 Comments

प्रण...

अचानक एक दिन

हुई उसके बचपन की हत्या

विवाह की वेदी ने दिया

एक नया घर-आँगन

एक नया रोल

एक नया अभिनय

एक नया डर...

अचानक एक दिन

ख़त्म हुई नादानियां

दफन हुईं लापरवाहियां

स्याह हुए स्वप्न

भोथरा गईं कल्पनाएँ....

अचानक एक दिन

उठाना पडा भारी-भरकम

संस्कारों का पिटारा

जिम्मेदारियों का बोझ

मानसिक-शारीरिक तब्दीलियाँ

और शिथिल हुए स्नायु-तंत्र...

दीखता नही दूर-दूर तक

इस मायाजाल से…

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Added by anwar suhail on January 6, 2014 at 11:40pm — 7 Comments

ग़ज़ल - सच को अपनाने का जब ऐलान किया !

ग़ज़ल –

फैलुन फैलुन फैलुन फैलुन फैलुन फा

२२ २२ २२ २२ २२ २



सच को अपनाने का जब ऐलान किया ,

सबने मुझ पर बाणों का संधान किया |



जागो रण में नींदें भारी पड़ती हैं ,

अभिमन्यू ने प्राणों का बलिदान किया |



आंसू की दो बूँदें टपकी पन्नो पर ,

मैंने अपने किस्से का उन्वान किया |



सोने की अपनी अपनी लंकाएं गढ़ ,

हमने ख़ुद में रावण को मेहमान किया |



देश निकाला देकर सारे पेड़ों को ,

हमने अपने शहरों को वीरान किया |



भूख… Continue

Added by Abhinav Arun on January 6, 2014 at 7:47pm — 33 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
एक तरही ग़ज़ल- शिज्जु

मिसरा-तरह //आखिर तुमने अपना ही नुकसान किया // पर आधारित एक तरही ग़ज़ल

22- 22- 22- 22- 22- 2

सच्चाई को जब अपना ईमान किया

सारी दुनिया को उसने हैरान किया

 

मुल्क़परस्ती का जज़्बा अब आम नहीं

किसने अपना सब यूँ ही क़ुर्बान किया

 

चुन-चुन के ग़ज़लों को बाँधा तुमने यूँ

बिखरे औराक़ सहेजे, दीवान किया

 

छोटी- छोटी बातों में खुशियाँ ढूँढी

अपने छोटे से घर को ऐवान किया

 

मायूस हुआ तेरी तीखी…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on January 6, 2014 at 9:00am — 34 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बाप के जूते - अतुकांत (गिरिराज भंडारी)

बाप के जूते

***********

जब से

बाप के जूते

बच्चों के पैरों  में

आने लगे हैं ,

वो सही ग़लत

बाप को ही

समझाने लगे हैं  ।…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on January 6, 2014 at 8:00am — 42 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल- पर सुगम होगा सफ़र, लगता है // --सौरभ

दिन उगे का तो पहर लगता है

यों अभी थोड़ी कसर, लगता है..



साँस लेना भी दूभर लगता है

क्या ये मौसम का असर लगता है



क्या हुआ साथ चलें या न चलें…

Continue

Added by Saurabh Pandey on January 6, 2014 at 3:00am — 22 Comments

गुरुकुल बहुत याद आता है

गुरुकुल बहुत याद आता है

.

नटखट बचपन छूटा मेरा

गुरुकुल के पावन आँगन मे ,

वो अतीत अब भी पलता है

बंजारे अंजाने मन मे ।

निधि जो गुरुकुल से ले आया, छटा नयी नित बिखराता है

गुरुकुल बहुत याद आता है !

अब भी क्या गुरुकुल प्रांगण मे

गूँजे मंत्रों की प्रतिध्वनियाँ ?

निर्मल हो पावन हो जाए

परम ब्रह्म की सारी दुनिया ।

चन्दन सी खुशबू इस जग मे, पावन गुरुकुल बरसाता है

गुरुकुल बहुत याद आता है ।…

Continue

Added by S. C. Brahmachari on January 5, 2014 at 10:30pm — 13 Comments

खुदा तुम्हारे ही खो जाने में मिलता है

जो पीने को दिल के पैमाने में मिलता है ।

वो जाम मोहब्बत के मैखाने में मिलता है ।

ना होश न खबर कोई मस्ती है खुमारी है ,

ये इल्म फकीरों के अफ़साने में मिलता है ।

सब झूठ ही कहते हैं कि शम्मा जलती है ,

जलने का हुनर फकत परवाने में मिलता है ।

कुछ मज़ा दीवाने को आता है तड़पने में ,

कुछ लुत्फ़ उन्हें भी तो तड़पाने में मिलता है ।

ये समझ ले जो तूने दिल में ही नही पाया ,

वो मन्दिर मस्जिद ना बुतखाने में मिलता है…

Continue

Added by Neeraj Nishchal on January 5, 2014 at 9:00pm — 7 Comments

कभी जीवन में अपने कुछ दुखद से पल भी आते हैं

1 2 2 2   1 2 2 2   1 2 2 2   1 2 2 2



कभी जीवन में अपने कुछ दुखद से पल भी आते हैं

सभी अपने हमेशा के लिए तब छोड़ जाते हैं /



समय अपना बुरा आया,तमस भी साथ ले आया 

करीबी जो रहे अपने वही नजरें चुराते हैं /



किसे फुर्सत हमें देखे हमारा हाल वो जानें 

हमें रुसवाइओं में तन्हा अक्सर छोड़ जाते हैं /



मिले ढूंढे नहीं कोई सहारा बन सके जो तब

मुसीबत में कहाँ अब लोग यूँ रिश्ते निभाते हैं /



भला कर तू भला होगा बुरा मत सोचना मन…

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Added by Sarita Bhatia on January 5, 2014 at 8:30pm — 20 Comments

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