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चीख -- (लघुकथा)

हॉस्पिटल से आने के बाद दिया ने आज माँ से आईना माँगा | माँ आँखों में आँसू भर कर बोली “ना देख बेटा आईना, देख न सकेगी तू |” पर दिया की जिद के आगे उसकी एक न चली और उसने आईना ला कर धड़कते दिल से दिया के हाथ में थमा दिया और खुद उसके पास बैठ गई | दिया ने भी धड़कते दिल से आईना अपने चेहरे के सामने किया और एक तेज चीख पूरे घर में गूँज गई, माँ की गोद में चेहरा छुपा कर फूट-फूट कर रो पड़ी दिया | माँ ने अपने आँसू पोंछे और उसके सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए बोली कि “मैंने तो पहले ही तुझसे बोला था कि मत देख…

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Added by Meena Pathak on December 9, 2013 at 3:11pm — 25 Comments

ग़ज़ल - (रवि प्रकाश)

बहर-ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ (8 गुरु)

.

गलियों-गलियों गाना भी है।

रस्ते में मैख़ाना भी है॥

.

नफ़रत की मारामारी में,

चाहत का पैमाना भी है।

.

अपनी कुटिया के पीछे ही,

उनका दौलतख़ाना भी है।

.

लाखों हैं कनबतियाँ लेकिन,

नैनों का टकराना भी है।

.

दोपहरें अलसाएँ तो क्या,

भोरों का इठलाना भी है।

.

कितने बल हैं पेशानी पर,

परियों का शरमाना भी है।

.

झूठों की हाँडी के नीचे,

सच का आतिशख़ाना भी है।

.

आने वाले… Continue

Added by Ravi Prakash on December 9, 2013 at 2:27pm — 19 Comments

मेरे कुछ दोहे

१.

मात पिता तो बोझ सम, आपन पूत सुहाय ।

जियबे पर ...पानी नही, मरे गया लइ जाय ॥

२.

धूल संस्कृति फाँकती, ....संस्कार हैं रोय ।

अंधी दौड़ विकास की, मानो सबकुछ होय॥

३.

है विवेक तो तनिक नहिं, शब्दन की भरमार।

अधकचरा से ज्ञान पर,...... हिला रहे संसार॥

४.

ज्ञान समुन्दर उर बसै, फिर भी भटकय जीव।

मन ना बस में करि सकै, ..तन जैसे निर्जीव॥

५.

देख मनुष का गर्व यों, ..सोच रहे भगवान ।

धरा नरक बन जाय जो, सारे होयँ समान…

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Added by Kiran Arya on December 9, 2013 at 1:00pm — 17 Comments

मौत की रात मेरी रूह भी रो जायेगी

२१२२       १२१२       १२२      २२२

रोज आदत जो तुमसे मिल ने की हो जायेगी 

मौत की रात मेरी रूह भी रो जायेगी 

आखिरी पल क़ज़ा जो सामने होगी मेरे 

जिन्दगी इक हसीन  ख्वाब में खो जायेगी 

आज साकी बनी ग़ज़ल खडी है महफ़िल में 

रिंद जब देंगे मशविरा  सँवर  वो  जायेगी 

हार उल्फत का देख मौत होगी शर्मिंदा 

मौत खुद जिन्दगी ही हार में पो जायेगी 

बात गुल से हसीं हो खार सी कड़वी चाहे 

बीज जेहन मे ये  ग़ज़ल के ही बो…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on December 9, 2013 at 11:30am — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
वह अलौकिक हेडलाईट – आँखों देखी 6

वह अलौकिक हेडलाईट – आँखों देखी 6

 

      शीतकालीन अंटार्कटिका का अनंत रहस्य हर रोज़ अपने विचित्र रंग-रूप में हमारे सामने उन्मोचित हो रहा था. बर्फ़ के तूफ़ान चल रहे थे जो एक बार शुरु होने पर लगातार घन्टों चला करते. कभी-कभी तो छह सात दिन तक हम पूरी तरह स्टेशन के अंदर बंदी हो जाते थे. 80 से 100 किलोमीटर प्रति घंटा की गति से हवा चलती जो झटके से, जिसे तकनीकी भाषा में Gusting कहते हैं, प्राय: 140 कि.मी.प्र.घ. हो जाती थी. तूफ़ान के आने का…

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Added by sharadindu mukerji on December 9, 2013 at 12:14am — 20 Comments

ग़ज़ल-चल दिया है छोड़, क्या जुल्म ये काफी नहीं

2122     2122      1222       12

चल दिया है छोड़, क्या जुल्म ये काफी नहीं

==============================

अब हमारी याद भी क्यूँ तुम्हें आती नहीं

चल दिया है छोड़,क्या जुल्म ये काफी नहीं //१//

तू हमारे दिल बसा , इसमें है कैसी खता

हो गया हमसे जुदा याद क्यूँ जाती नहीं  //२//

वो हवायें वो फिजायें बुलाती हैं तुम्हें

आ तो जाओ फिर कोई बात यूँ भाती नहीं //३//

मुडके भी देखा नहीं तुम गये जाने…

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Added by Atendra Kumar Singh "Ravi" on December 8, 2013 at 9:30pm — 7 Comments

सब कुछ वैसा ही हो जाये

सब कुछ वैसा ही हो जाये

जैसा हमने चाहा था

जैसा हमने सोचा था

जैसा सपना देखा था

सब कुछ वैसा ही हो जाये

लेकिन वैसा कब होता है

कुछ पाते हैं, कुछ खोता है

ठगा-ठगा निर्धन रोता है

थका-हारा, भूखा सोता है

तुम हम सबको बहलाते हो

नाहक सपने दिखलाते हो

अपने पीछे दौडाते हो

गुर्राते हो, धमकाते हो

और हमारे गिरवी दिल में

बात यही भरते रहते हो

सब कुछ वैसा हो जायेगा

जैसा हम सोचा करते हैं

जैसा हम…

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Added by anwar suhail on December 8, 2013 at 9:00pm — 5 Comments

वही जी रहा हूँ

तुमने खीची थी जो

सादे पन्ने पर

आड़ी तिरछी रेखाएं

वही मेरी जिंदगी की

तस्वीर  है

वही जी रहा हूँ.

 

रस भरी के फल

जिसे छोड़ दिया था

तुमने कड़वा कहकर

वही मेरी जिंदगी की

मिठास  है .

वही जी रहा हूँ ..

 

मंजिल पाने की जल्दी में

जिस राह को छोड़ कर

तुमने लिया था शोर्ट कट

वही मेरी जिंदगी की

राह है .

वही जी रहा हूँ .

 

तुम हो गये मुझसे दूर

तुम्हे अंक के…

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Added by Neeraj Neer on December 8, 2013 at 7:00pm — 14 Comments

'प्रेम' अतुकान्त

प्रेम करो प्रकृति द्वारा
सृजित जीवन से
तो ही जान सकोगे
जीवन के गर्भ में
छुपे अनगिनत रहस्यों को
प्रेम से खुलेंगे
जीवन के वो द्वार
जिनके लिए जन्मों जन्मों
से भटकते रहे तुम
जिनसे अब तक
अन्जान रहे तुम
प्रेम से होगी यह प्रकृति
तुम्हे समर्पित
खोल कर रख देगी
सारे राज तुम्हारे सामने
जैसे गिरा देती है प्रेयसी
परदे अपने प्रेमी के सामने ।

मौलिक व अप्रकाशित
नीरज 'प्रेम '

Added by Neeraj Nishchal on December 8, 2013 at 12:51pm — 19 Comments

ग़ज़ल : अरुन शर्मा 'अनन्त'

बहरे रमल मुसमन महजूफ

2122 2122 2122 212



फूल जो मैं बन गया निश्चित सताया जाऊँगा,

राह का काँटा हुआ तब भी हटाया जाऊँगा,



इम्तिहान-ऐ-इश्क ने अब तोड़ डाला है मुझे,

आह यूँ ही कब तलक मैं आजमाया जाऊँगा,



लाख कोशिश कर मुझे दिल से मिटाने की मगर,

मैं सदा दिल के तेरे भीतर ही पाया जाऊँगा,



एक मैं इंसान सीधा और उसपे मुफलिसी,

काठ की पुतली बनाकर मैं नचाया जाऊँगा,



जख्म भीतर जिस्म में अँगडाइयाँ लेने लगे,

मैं बली फिर से किसी…

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Added by अरुन 'अनन्त' on December 8, 2013 at 12:00pm — 26 Comments

जब रोज मरा करते थे ...

बातें खत्म हो गई जिसका 

जिक्र हम किया करते थे ...

वो गलियाँ कहीं 

खो गईं जिनपे हम 

चला करते थे ... 

न शाम रही न धुआँ 

किसी एक भी 

चराग में... 

वो चले गए जिन्हे

हम देखा करते थे... 

हमको क्या हक़ है

अब, किसी को कुछ कहने का ,,, 

रास्ता वो सब छूट गए 

जिनपे हम मिला करते थे ... 

अब हमको क्या मारेगी 

क्या, ये दुनियाँ की विरनिया 

वो अंदाज और था जीने का 

जब रोज मरा करते थे…

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Added by Amod Kumar Srivastava on December 8, 2013 at 10:55am — 6 Comments

लघुकथा : बल्ब और सीएफ़एल

सीएफ़एल बोली, "हे बल्ब महोदय! आप ऊर्जा बहुत ज्यादा खर्च करते हैं और रोशनी बहुत कम देते हैं। मैं आपकी तुलना में बहुत कम ऊर्जा खर्च करके आपसे कई गुना ज्यादा रोशनी दे सकती हूँ।"

 

बल्ब महोदय ने चुपचाप सीएफ़एल के लिए कुर्सी खाली कर दी। रोशनी फैलाने वालों के इतिहास में बल्ब महोदय का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा गया।

 

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 7, 2013 at 11:30pm — 12 Comments

ग़ज़ल -सिर हमारे इल्ज़ाम क्यों

2 1 2 2          2 2 1 2

.

दफ़्तरों में आराम क्यों

फाइलों में है काम क्यों

 

सुरमयी सी इक शाम है

फिर उदासी के नाम क्यों

 

कर गया वो करतूत…

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Added by अमित वागर्थ on December 7, 2013 at 11:00pm — 11 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
त्रिभंगी छंद पर एक प्रयास........................डॉ० प्राची

छंद त्रिभंगी

विधान : चार पद, दो दो पदों में सम्तुकांतता,

            प्रति पद १०,८,८,६ पर यति,

            पदांत में गुरु अनिवार्य 

            प्रत्येक पद के प्रथम दो चरणों में तुक मिलान

            जगण निषिद्ध 

यह जीवन मृण्मय ,  बंधन तृणमय , भास हिरण्मय ,  भरमाए 

इन्द्रिय बहिगामी , कृत…

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Added by Dr.Prachi Singh on December 7, 2013 at 10:10pm — 12 Comments

ग़ज़ल- मौसम की आसमान में जाहिर हुई खुशी।

ग़ज़ल- 

.

मौसम की आसमान में जाहिर हुई खुशी।

खुश्बू है आम की, और कोयल है कूकती।।

बाहर निकल के घर से जरा खेत में चलें,

फ़सलों की खुश्बुओं से निखरती है जिन्दगी...

सूरज को प्रातः काल नमस्कार कीजिये,

अंधकार वो भगाये है, देता है रोशनी....

है आज मेरी और सितारों की ग़फतगू,

ऐ-चाँद पास आओ जरूरत है आपकी...

बरसों गुजर गये हैं मुलाक़ात भी हुये,

अब भी ख़याल आता है मुझको…

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Added by सूबे सिंह सुजान on December 7, 2013 at 10:00pm — 12 Comments

कुछ हाइकू

जीवन का क्या 

कब झड़े ज्यूँ सूखे

पेड़ के पत्ते

माँ का दुलार

कितना भी हो, लगे

ओस की बूँद

मन बावरा

कभी जो मान जाता

मन की बात

नदी डालती

भले ही मीठा जल

सागर खारा

.

(मौलिक-अप्रकाशित)

Added by Neelam Upadhyaya on December 7, 2013 at 6:00pm — 6 Comments

तुम्हारे बाहुपाश के लिए …

तुम्हारे बाहुपाश के लिए …….



कितने

वज्र हृदय हो तुम

इक बार भी तुमने

मुड़कर नहीं देखा

तुम्हारी एक कंकरी ने

शांत झील में

वेदना की

कितनी लहरें बना दी

और तुम इसे एक खेल समझ

होठों पर

हल्की सी मुस्कान के साथ

मेरे हाथों को

अपने हाथों से

थपथपाते हुए

फिर आने का आश्वासन देकर

मुझे

किसी गहरी खाई सा

तनहा छोड़कर

कोहरे में

स्वप्न से खो गए

और मैं

तुम्हें जाते हुए

यूँ निहारती रही…

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Added by Sushil Sarna on December 7, 2013 at 5:30pm — 11 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 2122 2121

ख़म नहीं ज़ुल्फ़ों के ये जिनको कि सुलझायेंगे आप 

उलझने हैं इश्क़ की फिर से उलझ जायेंगे आप

कौन कहता है मुहब्बत अक्स है तन्हाइयों का

हम न होंगे साथ जब साये से घबराएंगे आप

दे तो दोगे इस ज़माने के सवालो का जवाब

दिल नहीं सुनता किसी की कैसे समझायेंगे आप

जा रहे हो बे-रुखी से जान लो इतना ज़रूर

क़द्र जब होगी मुहब्बत कि…

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Added by Ayub Khan "BismiL" on December 7, 2013 at 2:30pm — 11 Comments

ग़ज़ल- सारथी || तुम हो कली कश्मीर की ||

तुम हो कली कश्मीर की , कोई फ़ना हो जाएगा 

रब देख ले तुझको अगर , वो भी फ़िदा हो जाएगा /१

कोरा दुपट्टा बांध लो, पतली कमर के खूंट से 

सरकी अगर ये नाज़ से , मौसम खफ़ा हो जाएगा/२

साहिब बहाने से गया, मैं बारहा उसकी गली 

दिख जाये गर शोला बदन , कुछ तो नफा हो जाएगा /३ 

शीशे से नाजुक हुस्न पर, जालिम बड़ी मगरूर है 

दो पल की है ये नाजुकी, फिर सब हवा हो जाएगा /४ 

मुझको सज़ा-ए-मौत दो , शामिल रहा हूँ क़त्ल में 

उनको सुकूँ मिल जाएगी, हक़ भी…

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Added by Saarthi Baidyanath on December 7, 2013 at 12:30pm — 12 Comments

अतुकांत कविता .... लड़ूँगी प्रभु से

सोच रही हूँ
लड़ूँगी प्रभु से
जब मिलूँगी पर वह भी
डर से
छुपा बैठा है , आता ही नहीं
बुलाने पर हमारे हमारी जिन्दगी को
तबाह किये बैठा है , जिस दिन भी
मिलेगा सुनाउँगी
उसे बहुत जानता हैं
वह भी शायद
इसी लिए मेरी जिन्दगी
की डोर को
ढील दिए
बैठा है ....
.
सविता मिश्रा
"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by savitamishra on December 7, 2013 at 12:00pm — 22 Comments

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