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September 2013 Blog Posts

नारी अब अबला नहीं, कहने लगा समाज-रविकर

कुण्डलियाँ-


नारी अब अबला नहीं, कहने लगा समाज ।
है घातक हथियार से, नारि सुशोभित आज ।


नारि सुशोभित आज, सुरक्षा करना जाने ।
रविकर पुरुष समाज, नहीं जाए उकसाने ।


लेकिन अब भी नारि, पड़े अबला पर भारी |
इक ढाती है जुल्म, तड़पती दूजी नारी ।|


मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on September 24, 2013 at 11:53am — 12 Comments

मत्तगयंद (मालती) सवैया

प्रेम दुलार जगावत मानवता मन भावत भारत प्यारा ।
गीत खुशी सब गावत नाचत मंगल थाल सजावत न्यारा ।
बंधु सभी मिल बैठ करे नित चिंतन सुंदर हो जग प्यारा ।
ये सपना मन भावन देख ‘‘रमेश‘‘ खुशी मन गावत न्यारा ।
.........................................................
मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on September 24, 2013 at 10:34am — 8 Comments

सफर में चलते रहना ही हमारी कामयाबी है (गज़ल)

अरकान : १२२२/ १२२२/ १२२२/ १२२२

गिरें  तो  फिर  सम्हलना  ही  हमारी  कामयाबी है !

सफर  में  चलते  रहना  ही  हमारी  कामयाबी  है !

 

नही  ये कामयाबी  है  कि  मंजिल  पा  लिया हमने…

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Added by पीयूष द्विवेदी भारत on September 24, 2013 at 8:24am — 26 Comments

किसी दिन - (रवि प्रकाश)

किसी दिन अचानक

रौँदे गए सपने

बवाल तो करेंगे।

जिन्हें हाशिए पर

धकेला है ज़बरन

सवाल तो करेंगे।



धमनी में जम कर

हुआ है जो पत्थर

बहेगा धमाके से।

सड़ी अर्गला से

उकताई खिड़कियाँ

खुलेंगी धड़ाके से।



जिस्म की रेत से

हज़ार बाँह वाले

निकलेंगे आबशार।

भरेंगे किनारे

मन की मरुभूमि पे

झूलेंगे देवदार।



कसकेगी कविता

जब पीड़ा व पीड़ित

रहेंगे एकाकार।

रचेगा नवगीत

अनुष्टुप भी अभीत

छाती का… Continue

Added by Ravi Prakash on September 24, 2013 at 7:30am — 14 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : मिठाई (गणेश जी बागी)

काम बेहद मामूली था पर बड़े बाबू फाइल पर कुंडली मारे बैठे थे । मित्रों ने बताया कि बिना हजार-डेढ़ हजार का चढ़ावा लिए वो काम करने वाले नही हैं । गुप्ताजी यह सुन कर चुप रह गये । 



"बड़े बाबू एक छोटा सा काम आपके पास पेंडिंग है, यदि कर देते तो बड़ी मेहरबानी होती"

"हाँ-हाँ, गुप्ताजी हो जाएगा, थोड़ा खर्च-वर्च कर दीजिएगा", बड़े बाबू बगैर लाग-लपेट बोल उठे ।

"देखिए बड़े बाबू मैं खर्च करने की स्थिति मे तो नही…

Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 23, 2013 at 8:59pm — 60 Comments

उडो तुम

उडो तुम व्योम के वितान में

पसारो पंख निर्भय .

अश्रु धार  से

नहीं हटेगी चट्टान                                                                                                                    …

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Added by Neeraj Neer on September 23, 2013 at 8:30pm — 25 Comments

सावन संग होड़ ( कुण्डलिया )

कुण्डलिया 

सावन संग आज लगी, सखी नैन की होड़|

मान हार कौन अपनी, देत बरसना छोड़||

देत बरसना छोड़, नैन परनार बहे हैं |

कंचुकि पट भी भीज , विरह की गाथ कहे हैं ||

पड़े विरह की धूप, जले है विरहन का मन|

हिय से उठे उसाँस, बरसे नैन…

Continue

Added by shalini rastogi on September 23, 2013 at 6:29pm — 14 Comments

खिलखिला के आई जवानी ..............कविता

कामनाओ ने ली अंगडाई

होने लगी रुत मस्तानी,

बचपन बिता जागी उमंगें

खिलखिला के आई जवानी |…

Continue

Added by डॉ. अनुराग सैनी on September 23, 2013 at 5:48pm — 6 Comments

आइना सबको दिखाया जाये

२१२२/११२२/२२

झूठ अब सामने लाया जाये

आइना सबको दिखाया जाये

तीरगी है तो उदासी कैसी

दीप फ़ौरन ही जलाया जाये

आज दिल में है बड़ी बेचैनी

साक़िया  भर के पिलाया जाये

लाडली वो भी किसी मा की है

फिर बहू  को न सताया जाये

तोड़ डाला जो खिलौना उसने

उसको इतना न रुलाया जाये

बात गर करनी मोहब्बत की तो 

दिल से नफरत को मिटाया…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on September 23, 2013 at 5:30pm — 25 Comments

फासलों का यह किनारा और है। ……… गजल

आज से रस्ता हमारा और है
साथ चलने का इशारा और है
.
चल रही ऐसी यहाँ पर आंधियाँ
घर का बिखरा ये नजारा और है
.
या खुदा रहमत नहीं अब चाहिए
फासलों का ये किनारा और है
.
ख्वाहिशों को तोडा था तुमने कभी
फिर भी दिल ने हाँ पुकारा और है
.
हर ख़ुशी मिलती नहीं टकराव से
हार जाने का इजारा और है

.

भूल जायेंगे चलो दुख की निशा

प्यार के सुख…
Continue

Added by shashi purwar on September 23, 2013 at 3:30pm — 20 Comments

पथिक - कविता

पथिक !!!

चल दिये कहाँ ?

क्या कंटक पथ देख

विचलित हो उठे तुम

चिलचिलाती धूप की तपन मे

सुलग उठे तुम

ढूँढने छाँव, तड़प कर

चल दिये कहाँ ?

स्वप्नों की टूटी गागर

व्यथित आकुल मन

हारी हुईं अभिलाषायेँ

बिखरा कर तुम

ढूँढने नव उजास

चल दिये कहाँ ?

रेतीले !!!!

ये गर्द भरे रास्ते

मरुथल मे जल की बूंद 

मृग मरीचिका मे कस्तूरी

ढूँढने नन्दन वन

चल दिये कहाँ ?

 

अप्रकाशित…

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Added by annapurna bajpai on September 23, 2013 at 1:45pm — 21 Comments

तुमको देखे

तुमको देखे

बरसों बीते

सूखे फूल

किताबों में

अहिवाती बस

एक छुअन ही

रही महकती

हाथों में

मन के कोरे

काग़ज भी तो

क्षत को गिरे

प्रपातों में

अनगिन पारिजात

मगर तुम

रख गए

कलम-दावातों में

आओ ना

इस इंद्रधनुष पर

दो पल बैठें

बात करें

शावक जैसी

कोमल राते

उतर रही

आहातों में

(सर्वथा मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by राजेश 'मृदु' on September 23, 2013 at 1:06pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दर्द क्या इक नया फिर कोई बो रहा ( गज़ल - गिरिराज भंडारी )

212    212    212     212 

.

छांव में धूप का क्यों गुमाँ हो रहा

दर्द क्या इक नया फिर कोई बो रहा

 

सड़ चुकी मान्यता सांस फिर ले रही

दिन चढ़े तक कोई शख़्स ज्यों सो रहा  

 

ज़ाहिरन बात ये कह रहा है करम

बढ़ गया पाप जब तो कोई धो…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on September 23, 2013 at 12:00pm — 38 Comments

मसले पड़े ज्वलंत, शब्दश: रविकर मसले-

मसले पर जब बलबला, शब्द मनाते जीत |
भाव मौन रहकर मरे, यही पुरातन रीत |

यही पुरातन रीत, तीर शब्दों के घातक |
दे दे गहरी पीर, ढूँढ़ ले खुशियाँ पातक |

बड़े विकारी शब्द, मचलती इनकी नस्लें |
मसले पड़े ज्वलंत, शब्दश: रविकर मसले ||

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on September 23, 2013 at 11:32am — 9 Comments

शर्म से हम आँख मीचे क्यूँ रहें

शर्म से हम आँख मीचे क्यूँ रहें

दौड़ है सोहरत की पीछे क्यूँ रहें

 

तब हुए पैदा जमीं पे अब मगर

हौसलों के पर हैं नीचे क्यूँ रहें

 

सच का लज्जत चख चुके हैं हम यहाँ

फिर बता दो हम भी तीखे क्यूँ रहें

 

जानते हैं फल में कीड़े कब लगे

इस कदर फिर हम भी मीठे क्यूँ रहें

 

जिन लकीरों ने कराई जंग है

“दीप” अब तक उनको खींचे क्यूँ रहें

 

संदीप कुमार पटेल “दीप”

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on September 22, 2013 at 8:13pm — 32 Comments

भारत माँ की बिंदी प्यारी अपनी हिन्दी

--------------------------------------------

मस्तक राजे ताज सभी भाषा की हिन्दी

ज्ञान दायिनी कोष बड़ा समृद्ध विशाल है

संस्कृत उर्दू सभी समेटे अजब ताल है

दूजी भाषा घुलती हिंदी दिल विशाल है

लिए हजारों भाषा करती कदम ताल है

जन - मन जोड़े भौगोलिक सीमा को बांधे

पवन सरीखी परचम लहराती है हिंदी

भारत माँ की बिंदी  प्यारी अपनी हिन्दी  ...........

============================

१ १  स्वर तो ३ ३ व्यंजन 52 अक्षर अजब व्याकरण

गिरना…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on September 22, 2013 at 7:30pm — 14 Comments

ग़ज़ल - सितम सारे सहें कुछ यूँ

1222. 1222

चलो चल कर कहें कुछ यूँ
सितम सारे सहें कुछ यूँ

रियावत ओढ़ लें थोड़ा
जुदाई को सहें कुछ यूँ

सफीना कागजों का था
लहर से हम कहें कुछ यूँ

नशेमन नम न हो कोई
नयन अपने बहें कुछ यूँ

सितारें खोज लें हमको
अँधेरों में रहें कुछ यूँ

रियावत - परंपरा
सफीना - नाव
नशेमन - घोंसला

पूनम शुक्ला
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Poonam Shukla on September 22, 2013 at 10:20am — 20 Comments

सवैया

मोर दशा वह देखत सोचत अविरल प्रेम अश्रु जल ढारे ।
पागल जो बन घूम रहा दर बे दर प्यार छुपा मन मारे ।
दोष रहा किसका वह बन चातक ढूंढ रहा दिल हारे ।
मै वरती उसको पर ये दुनिया भई प्रेम दुश्मन हमारे ।

मोर - मेरा/मेरी
..................................
मोलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on September 22, 2013 at 10:00am — 7 Comments

अब न मैं भयभीत तुझसे, मेघ माघी..!!

अब न मैं भयभीत तुझसे, मेघ माघी..!!

मैं पड़ी थी,

एक युग से चिर निशा की कालिमा में कैद कल तक,

रश्मि से अनजान, रवि की लालिमा से भी अपरिचित,

दृष्टि में संकोच का संचार, भय से प्राण सिमटे,

दृग झुके से, अश्रु प्लावित, अधर भी अधिकार वंचित,…

Continue

Added by अजय कुमार सिंह on September 22, 2013 at 12:33am — 8 Comments

ग़ज़ल- सारथी || कोई अच्छा बहाना देख लेना ||

कोई अच्छा बहाना देख लेना

कहीं दिलकश ठिकाना देख लेना /१ 

अगर मिलना हो तुमको हमनशीं से 

तो फिर मौसम सुहाना देख लेना/२  

भले ही मुश्किलों में हम पले हैं

हमारा मुस्कुराना देख लेना/३  

मजा लेना अगर है दुश्मनी का

कोई  दुश्मन पुराना देख लेना /४  

किसी की आबरू यूँ मत उछालो

कभी इज्ज़त गंवाना देख लेना/५  

सितारों की कबड्डी में मजा क्या 

कभी परदा हटाना देख लेना /६  

हमारा ‘सारथी’ है नाम समझे

मिज़ाजे - शाइराना देख…

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Added by Saarthi Baidyanath on September 21, 2013 at 5:00pm — 32 Comments

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