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पथिक !!!

चल दिये कहाँ ?

क्या कंटक पथ देख

विचलित हो उठे तुम

चिलचिलाती धूप की तपन मे

सुलग उठे तुम

ढूँढने छाँव, तड़प कर

चल दिये कहाँ ?

स्वप्नों की टूटी गागर

व्यथित आकुल मन

हारी हुईं अभिलाषायेँ

बिखरा कर तुम

ढूँढने नव उजास

चल दिये कहाँ ?

रेतीले !!!!

ये गर्द भरे रास्ते

मरुथल मे जल की बूंद 

मृग मरीचिका मे कस्तूरी

ढूँढने नन्दन वन

चल दिये कहाँ ?

 

अप्रकाशित एवं मौलिक

 

 

 

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Comment

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Comment by annapurna bajpai on September 28, 2013 at 12:33pm

आदरणीय सौरभ जी आपकी टिप्पणी से मनोबल दूना हुआ है , आपका हार्दिक आभार । 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 27, 2013 at 11:39pm

सचेत करती मनोदशा से उभरी रचना के लिए बधाई, आदरणीया..

Comment by annapurna bajpai on September 26, 2013 at 5:21pm

आपका हार्दिक आभार आदरनीय कुशवाहा जी । 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on September 26, 2013 at 3:42pm

स्वप्नों की टूटी गागर

व्यथित आकुल मन

हारी हुईं अभिलाषायेँ

बिखरा कर तुम

ढूँढने नव उजास

चल दिये कहाँ ?

सुन्दर भाव, बधाई सादर 

Comment by annapurna bajpai on September 25, 2013 at 3:09pm

आदरणीया वंदना जी आपका हार्दिक आभार । 

Comment by Vindu Babu on September 24, 2013 at 4:12pm
क्या बात है आदरणीया!
बहुत ही अच्छी सार्थक कविता बन पड़ी है।
सादर बधाई स्वीकारें!
Comment by annapurna bajpai on September 24, 2013 at 3:25pm

आदरणीया प्रवीन मलिक जी आपका हार्दिक आभार ।

Comment by annapurna bajpai on September 24, 2013 at 3:24pm

आदरणीय अरुण शर्मा जी आपको कविता पसंद आई मेरा लिखना सार्थक रहा , आपका आभार ।

Comment by Parveen Malik on September 24, 2013 at 11:58am
रेतीले !!!!
ये गर्द भरे रास्ते
मरुथल मे जल की बूंद
मृग मरीचिका मे कस्तूरी
ढूँढने नन्दन वन
चल दिये कहाँ ?
आदरणीय अन्नपूर्णा जी बहुत सुन्दर प्रस्तुति ... बधाई !!!
Comment by अरुन 'अनन्त' on September 24, 2013 at 11:30am

बहुत ही सुन्दर खूबसूरत प्रस्तुति अच्छा प्रश्न किया है आपने बहुत बहुत बधाई स्वीकारें.

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