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बिन तुम्हारे मैं अधूरा

अश्रु गण साथी रहे

मेरे ह्रदय की पीर बनकर !

रात चुभ जाती हमेशा तीर बनकर !

मैं भटकता नीर बनकर !

तुम सुनहरे स्वप्न सी हो

मैं नयन हूँ !

बिन तुम्हारे मैं अधूरा

और मेरे बिन तुम्हारा अर्थ कैसा !

जीत की उम्मीद से प्रारंभ होकर

निज अहम के हार तक का ,

प्रथम चितवन से शुरू हो प्यार तक का ,

प्यार से उद्धार तक का

मार्ग हो तुम !

मै पथिक हूँ !

निहित हैं तुझमे सदा से

कर्म मेरे

भाग्य…

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Added by Arun Sri on February 22, 2012 at 1:00pm — 7 Comments

अंतर



अक्सर सोचता हूँ…
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Added by Rana Navin on February 19, 2012 at 1:32am — 1 Comment

सीखा है

सूखे पेड़ों से मैंने डटकर के जीना सीखा है,

हरे-भरे पेड़ों से मैंने झुककर जीना सीखा है,

मस्त घूमते मेघों ने सिखलाया मुझको देशाटन,

और बरसते मेघों से सब कुछ दे देना सीखा है।

 

हर दम बहती लहरों से सीखा है सतत्‍ कर्म करना,

रुके हुए पानी से मैंने थम कर जीना सीखा है,

जलती हुई आग से सीखा है जलकर गर्मी देना,

जल की बूंदों से औरों की आग बुझाना सीखा है।

 

सागर से सीखा है सागर जितना बड़ा हृदय रखना,

धरती से सब की पीड़ा का भार उठाना…

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Added by Prof. Saran Ghai on February 18, 2012 at 10:06pm — 4 Comments

बलात्कार: उद्भव, विकास एवं निदान

शुरू में सब ठीक था

जब धरती पर

प्रारम्भिक स्तनधारियों का विकास हुआ

नर मादा में कुछ ज्यादा अन्तर नहीं था

मादा भी नर की तरह शक्तिशाली थी

वह भी भोजन की तलाश करती थी

शत्रुओं से युद्ध करती थी

अपनी मर्जी से जिसके साथ जी चाहा

सहवास करती थी

बस एक ही अन्तर था दोनों में

वह गर्भ धारण करती थी

पर उन दिनों गर्भावस्था में

इतना समय नहीं लगता था

कुछ दिनों की ही बात होती थी।



फिर क्रमिक विकास में बन्दरों का उद्भव हुआ

तब जब हम…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 18, 2012 at 8:04pm — 2 Comments

हाइकु

१. मनमीत रे 

    धोरे हो गए केश 
    मन रंगीला 
२. मनमीत रे 
    जग ने बिसराया
    तू ही संग है 
३. मनमीत रे 
    छोटी सी ये दुकान 
    जग अपना 
४. मनमीत रे 
    उम्र का है ढलान 
    नेह बढ़ाएं 
५. मनमीत रे 
    धन की नहीं आस 
    प्रीत है धन 
६. प्रियतमा री 
    मीठा लागे चुम्बन 
    भिगोया मन 
७.…
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Added by दुष्यंत सेवक on February 18, 2012 at 5:30pm — 5 Comments

आरोग्य दोहावली

आरोग्य दोहावली 

दही मथें माखन मिले, केसर संग मिलाय.

होठों पर लेपित करें, रंग गुलाबी आय..

बहती यदि जो नाक हो, बहुत बुरा हो हाल.…

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Added by Er. Ambarish Srivastava on February 18, 2012 at 2:30pm — 11 Comments

मेरे मन





मेरे मन ,

बसंत के गाँव चल तो सही

सब कुछ है वहीं

उमंग उल्लास का गाँव है, रे 

प्रीत की डोर थामे ,चल तो सही | सब कुछ…

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Added by mohinichordia on February 18, 2012 at 11:16am — 3 Comments

सरकारी नौकरी ( लघुकथा )

'' घर नहीं चलना , टाइम हो चुका है .'' - मेरे साथी ने मुझसे कहा . मैंने इस कार्यालय में आज ही ज्वाइन किया था .शायद इसीलिए उसने मुझे याद दिलाना चाहा था .
'' मेरी घड़ी पर तो अभी दस मिनट बाकी हैं .'' - मैंने घड़ी दिखाते हुए कहा .
'' वो तो मेरी घड़ी पर भी हैं…
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Added by dilbag virk on February 16, 2012 at 8:00pm — 9 Comments

सहअस्तित्व

सुस्त वृक्ष का जीवन बोला

क्या होगा अब मेरा ?

खिर गए सब पान पल्लव

सूख गया रस मेरा |

खडा रहा वह ठूँठ सा

कुछ मुरझाया कुछ सुस्ताया

समय गुजरा, पास की मिटटी में उग आयी

एक बेल ने,…

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Added by mohinichordia on February 16, 2012 at 4:00pm — 2 Comments

सरहद पर जाते वक्त

सरहद पर जाते वक्त 

वो  जो नज़र झुका कर कहा तुमने 
प्रिया! लौट कर न आ पाऊं  शायद
फिर से तेरी बांहों में 
जम्भूमि के कर्ज  चुकाने हैं 
नहीं निभा पाउँगा तुम्हारे प्रति अपना फर्ज 
हो सके तो माफ़ कर देना मुझे 
सच कंहूँ तो  तेरी इस शपथ  से  
डबडबाये   जरुर थे मेरे नयन  
पर यकीं कर  साथी 
मेरा माथा गर्व से तन गया था उस वक्त 
कितनी खुश नसीब होती हैं 
वो…
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Added by asha pandey ojha on February 16, 2012 at 4:00pm — 14 Comments

मंजिलें अपनी-अपनी

रास्ते प्यार के अब ह़ो चुके दुश्मन साथी

अब चलो बाँट लें हम मंजिलें अपनी-अपनी

वर्ना ये गर्द उठेगी अभी तूफां बनकर

ख्वाब आँखों के सभी चुभने लगेंगे तुमको

बनके आंसू अभी टपकेंगे तपते रस्ते पर

मगर ये पाँव के छालों को न राहत देंगे !



तपिश तो और अभी और बढ़ेगी साथी

तब भी क्या प्यार में जल पाओगी शमां बनकर ?

पाँव रक्खोगी जब जलते हुए अंगारों  पर

शक्लें आँखों में ही रह जाएंगी धुआं बनकर !



मैं जानता हूँ कि अब कुछ नही होने वाला

वक्त को…

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Added by Arun Sri on February 16, 2012 at 12:05pm — 2 Comments

चले गये

बहुत सताया हमको अब वो दिन अंधियारे चले गये,

हमको गाली देने वाले गाली खाकर चले गये।

 

बहुत मचाई गुंडागर्दी तुमने शहरों-गावों में,

बहुत चुभाए कांटे तुमने धूप से जलते पांवों में,

आंधी जब हम लेकर आए तिनके जैसे चले गये।

 

जाने कितनों को रौंदा-कुचला था अपने पैरों में,

कितनों की इज्जत लूटी थी सामने अपने-गैरों में,

जब हमने हुंकार भरी तो पूंछ दबाकर चले गये।

 

बहुत विनतियां कीं थीं हमने लाख दुहाई दी तुमको,

रो रो कर…

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Added by Prof. Saran Ghai on February 15, 2012 at 7:55pm — 1 Comment

आंखें

इन आंखों की गहराई में,

डूबा दिल दीवाना है.

मस्ती को छलकाती आंखें,

मय से भरा पैमाना हैं.



ये आंखें केवल आंख नहीं हैं ,

ये तो मन का दर्पण हैं .

दिल में उमड़ी भावनाओं का,

करती हर पल वर्णन हैं.



ये आंखे जगमग दीपशिखा सी ,

जीवन में ज्योति भरती हैं.

भटके मन को राह दिखाती,

पथ आलोकित करती हैं.



इन आंखों में डूब के प्यारे,

कौन भला निकलना चाहे.

ये आंखे तो वो आंखे हैं ,

जिनमें हर कोई बसना चाहे.

.…

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Added by Pradeep Bahuguna Darpan on February 15, 2012 at 5:00pm — 8 Comments

मन

पता नहीं क्यों मेरा मन॥ फ़िदा हुआ है आप पे॥

कर सिंगार मै कड़ी सामने॥ आप क्यों नहीं ताकते॥

देखो कलियाँ खिल रही है॥ ताक रही है आप को॥

बातो को कैसे सुन रही है॥ समझ रही है बात को॥

अब तुम भी तो समझ गए हो॥ क्यों नहीं फिर भापते॥

आँखों में अब तुम बसे हो॥ तुम ही मेरी जुबान हो॥

तुम तमन्ना हो मेरी॥ तुम ही मेरी शान हो॥

पा के मौसम की आहट॥ दिल को नहीं रोकते॥

Added by shambhu nath on February 15, 2012 at 12:30pm — No Comments

चमत्कार बेच के...

राह में खड़े हो यूँ घर-बार बेच के,

अपना बसा-बसाया ये संसार बेच के.
किसने तुम्हे सताया के करते हो ख़ुदकुशी,
लड़  रहे हो म्यान से,  तलवार बेच के!
बख्शेंगी तुम्हे क्यों ये समंदर की मछलियाँ!
खे   रहे  हो   नाव  यूँ  पतवार   बेच   के.
कैसी रवायतें   हैं ये  कैसा   समाज है?
दुल्हन खड़ी है हाट  में सिंगार बेच के!!
आवाज़ तेरी गूँज के रह जाएगी यहाँ,
तू फिरेगा यूँ तेरे अधिकार बेच…
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Added by AVINASH S BAGDE on February 15, 2012 at 11:00am — 4 Comments

एक लड़की ( हास्य)

 
मुझे देख के एक लड़की, बस हौले -हौले हंसती है.
प्रेम - जाल मैं डाल के थक गया, पर कुड़ी नहीं फंसती है .
मुझे देख के एक लड़की, बस हौले -हौले हंसती है.
रहती है मेरे पड़ोस में वो, कुछ चंचल - कुछ शोख है वो.
ना गोरी - ना काली है,…
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Added by satish mapatpuri on February 15, 2012 at 1:08am — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
प्रेम दिवस

प्रेम दिवस 

ख़त्म हो दिलो की कड़वाहट 
हर शख्स के चेहरे पे…
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Added by rajesh kumari on February 14, 2012 at 10:00am — 3 Comments

चले गये

आये थे हमसे लड़ने को पर शरमा कर चले गये,

जरा हाथ ही पकड़ा और वो हाथ छुड़ा कर चले गये।

 

छिप-छिप कर चिलमन से तुमने बहुत इशारे किये प्रिये,

ज़ख्म दिये हर बार जो तुमने सहा किये और सिया किये,

कस कर जरा कलाई थामी दैया कह कर चले गये।

 

बहुत किया बदनाम ’सरन’ को, सबसे मेरी बातें कीं,

एक एक का हाल बताया हमने जो मुलाकातें कीं,

हमने जब कुछ कहना चाहा, हया दिखा कर चले गये।

 

खूब पिटाया तुमने हमको यारों-रिश्तेदारों से,

खूब…

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Added by Prof. Saran Ghai on February 14, 2012 at 5:57am — No Comments

लघु कथा माँ

माँ

    आज फिर घर पर बहुत झगड़ा हुआ। “अब मैं घर वापिस नहीं आउंगा, नदी में डूब कर मर जाउंगा।” गुस्से से अपनी माँ को बोलकर वो घर से निकल पड़ा।
    “माँ, मुझे माफ कर दे, उठ माँ! आंखे खोल। तू आंखे क्यों नहीं खोलती” दोपहर को जब वो गुस्सा शांत होने के बाद घर वापिस आया तो आंगन में पड़ी अपनी माँ से लिपट कर जोर जोर से बोल रहा था।

Added by Ravi Prabhakar on February 13, 2012 at 6:32pm — 2 Comments

वैलेंटाईन दिवस पर कुछ दोहे......

प्रेम तो है परमात्मा, पावन अमर विचार.
इसको तुम समझो नहीं , महज देह व्यापार.

प्रेम गली कंटक भरी, रखो संभलकर पांव.
जीवन भर भरते नहीं, मिलते ऐसे घाव.

'दर्पण' हमसे लीजिए, बड़े काम की सीख.
दे दो, पर मांगो नहीं, कभी प्यार की भीख.

मन से मन का हो मिलन, तो ही सच्चा प्यार.
मन के बिना जो तन मिले, बड़ा अधम व्यवहार . ... दर्पण

Added by Pradeep Bahuguna Darpan on February 13, 2012 at 5:08pm — 8 Comments

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