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२१२२ १२१२ २२

फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ैलुन

******************************

रंग ख़ुशियों के कल बदलते ही,

ग़म ने थामा मुझे फिसलते ही,

मैं जो सूरज के ख़्वाब लिखती थी,

ढल गयी हूँ मैं शाम ढलते ही,

राह सच की बहुत ही मुश्किल है,

पाँव थकने लगे हैं चलते ही

वो मुहब्बत पे ख़ाक डाल गया

बुझ गया इक चराग़ जलते ही,

ख़्वाब नाज़ुक हैं काँच के जैसे,

टूट जाते हैं आँख मलते ही ...!!अनुश्री!!

स्वरचित व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Ajay Tiwari on October 31, 2017 at 11:40am

आदरणीया अनीता जी,

बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक शुभकामनाएं.

ख़्वाब नाज़ुक हैं काँच के जैसे,

टूट जाते हैं आँख मलते ही 

विशेषतः यह शेर बहुत खूबसूरत है.

सादर  

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 30, 2017 at 8:48pm

बहुत प्यारी ग़ज़ल कही है आपने आदरणीया अनीता जी | हार्दिक बधाई |

Comment by Anita Maurya on October 30, 2017 at 8:35pm

आप सबकी टिप्पणियों के लिए बहुत बहुत आभार, समर कबीर सर, यूँ ही मार्गदर्शन करते रहिएगा 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 29, 2017 at 11:47am
इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकार करें आदरणीया..सदर
Comment by Samar kabeer on October 26, 2017 at 5:39pm
मोहतरमा अनीता जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।
मतले और दूसरे शैर पर जनाब निलेश जी से सहमत हूँ,दूसरे शैर का ऊला मिसरा यूँ कर लें,तक़ाबुल-ए-रदीफ़ का दोष निकल जायेगा :-
'मैं जो लिखती थी ख़्वाब सूरज के'
Comment by SALIM RAZA REWA on October 26, 2017 at 3:16pm
आo ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए मुबारक़बाद
Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 26, 2017 at 12:02pm

आ. अनीता जी,
अच्छी ग़ज़ल हुई है ..
मतला थोडा कमज़ोर  लगा जिसपर और काम किया जा सकता है...
दूसरे शेर में तकाबुले-रदीफ़ की सूरत बन रही है ..
.

राह सच की बहुत ही मुश्किल है,

पाँव थकने लगे हैं चलते ही
.

ख़्वाब नाज़ुक हैं काँच के जैसे,

टूट जाते हैं आँख मलते ही ... इन दो अशआर के लिए विशेष बधाई आपको 



Comment by Afroz 'sahr' on October 26, 2017 at 9:58am
मोहतरमा अनीता मौर्य साहिबा बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल कही आपने मेंरी और से आपको बहुत बहुत मुबारकबाद,,
Comment by Mohammed Arif on October 26, 2017 at 7:28am
आदरणीया अनीता मौर्य जी आदाब,बहुत ही ख़ूबसूरत अहसासों का स्फुटन । हर शे'र उम्दा । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।
Comment by Dr. Vijai Shanker on October 26, 2017 at 12:51am
ख़्वाब नाज़ुक हैं काँच के जैसे,
टूट जाते हैं आँख मलते ही ...!!
बहुत खूब , बधाई इस शानदार प्रस्तुति के लिए , आदरणीय सुश्री अनिता मौर्या जी , सादर।

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