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पिछले कई दिनों से घर में एक अजीब सी हलचल थीI कभी नन्हे दीपू को डॉक्टर के पास ले जाया जाता तो कभी डॉक्टर उसे देखने घर आ जाताI दीपू स्कूल भी नहीं जा रहा थाI घर के सभी सदस्यों के चेहरों से ख़ुशी अचानक गायब हो गई थीI घर की नौकरानी इस सब को चुपचाप देखती रहतीI कई बार उसने पूछना भी चाहा  किन्तु दबंग स्वाभाव मालकिन से बात करने की हिम्मत ही नहीं हुईI आज जब फिर दीपू को डॉक्टर के पास ले वापिस घर लाया गया तो मालकिन की आँखों में आँसू थेI रसोई घर के सामने से गुज़र रही मालकिन से नौकरानी ने हिम्मत जुटा कर पूछ ही लिया:
"बीबी जी! क्या हुआ है छोटे बाबू को ?"
"देखती नहीं कितने दिनों से तबीयत ठीक नहीं है उसकी?" मालकिन ने बेहद रूखे स्वर में कहा I
"मगर हुआ क्या है उसको जो ठीक होने का नाम ही नहीं ले रहा?" 
"बहुत भयंकर रोग है!" एक गहरी सांस लेते हुए मालिकन ने कहा I
"हाय राम! कैसा भयंकर रोग बीबी जी?" नौकरानी पूछे बिना रह न सकी I 
मालकिन ने अपने कमरे की तरफ मुड़ते हुए एक गहरी साँस लेते हुए उत्तर दिया:
"उसको भूख नहीं लगती रीI"  
मालकिन के जाते ही अपनी फटी हुई धोती से हाथ पोंछती हुई नौकरानी बुदबुदाई:               
"मेरे बच्चों के सिर पर भी अपने बेटे का हाथ फिरवा दो बीबी जी I"
----------------------------------------

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by Mahendra Kumar on June 9, 2018 at 10:39am

वाह! किसी के पास खाने को है तो उसे भूख नहीं लगती और किसी को भूख लगती है तो उसके पास खाने को नहीं है. इस लाजवाब लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए सर. सादर.

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on June 4, 2016 at 9:11pm
इस रचना को पढ़कर गूगल के माध्यम से अपनी अत्यल्प जानकारी में 'बीबी' और 'बीवी' शब्दों के अंतर व प्रयोग समझने का मुझे सुअवसर मिला है।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on June 4, 2016 at 9:05pm
नौकरानी द्वारा दबंग मालकिन से उनके बेटे दीपू संबंधित सवाल पूछने की हिम्मत कर पाना और फिर जाती हुई मालकिन के पीछे धीरे से वह तीखी पंचपंक्ति बुदबुदाना आम तौर पर घरों में यह परिदृश्य देखा गया है और मैंने भी बुदबुदाते नहीं, मालकिन के सामने ही ऐसी ततैया-डंक वाली बात स्पष्ट कहते हुए देखा है। इस बात को लघुकथा में कहने के लिए चुनना और इतनी बेहतरीन शिल्पबद्ध लघुकथा कहना एक लघुकथा-विशेषज्ञ की लेखनी द्वारा ही हो सकता है। तहे दिल से बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय श्री योगराज प्रभाकर जी।
Comment by pratibha pande on June 4, 2016 at 8:23pm

पेट  की भूख के चलते ही सारे प्रपंच हैं  लगे तो भी मुश्किल ,ना लगे तो भी ,  लघु कथा कैसे कही जाए ,ये आपकी हर रचना सिखाती है हार्दिक बधाई और धन्यवाद आपको इस रचना के लिए आदरणीय योगराज प्रभाकर जी ,


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Comment by rajesh kumari on June 4, 2016 at 6:30pm

बहुत बेहतरीन लघु कथा हुई जहाँ एक और भूख न लगना भयंकर बीमारी समझकर सब परेशान हैं वहीँ दूसरी और एक गरीब बच्चों की भूख से परेशान है अंतिम पंच्च लाइन अन्दर तक झकझोरती है |हार्दिक बधाई आपको आ० योगराज जी 

Comment by Janki wahie on June 4, 2016 at 5:09pm
भूख पर बेहतरीन कथा।पञ्च पंक्ति लाज़वाब ।बहुत कुछ सिखा गई ।हार्दिक बधाईसर जी।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on June 2, 2016 at 3:13pm

वाह सर | ऐसी  सोच भी हो सकती है लोगों की ! आपका जवाब नहीं | सादर |

Comment by Omprakash Kshatriya on June 2, 2016 at 12:41pm
आदरणीय भाई साहब, आप की अंतिम पंक्ति यानि पञ्च लाइन ने लघुकथा का कहा और अनकहा , सब कुछ व्यक्त कर दिया. सादर. बधाई इस जोरदार लघुकथा के लिए.
Comment by TEJ VEER SINGH on June 2, 2016 at 12:18pm

हार्दिक बधाई आदरणीय योगराज भाई जी! एक परिवार के साधारण से मसले में से लघुकथा का इतना बेहतरीन अंकुरण! वाह, बहुत ही खूबसूरत अंदाज! आपकी सृजनशीलता को सलाम!

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 2, 2016 at 8:47am
किसी किसी को भूख न लगने की बीमारी और करोड़ों को भूख लगने की। करोड़ों की चिंता कौन करे।
आज के आस-पास की एक जीती जागती कथा। सरल और सहज मगर गम्भीर प्रश्न उठाती हुई प्रस्तुति, बधाई आदरणीय योगराज प्रभाकर जी , सादर।

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