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ग़म-ज़दा होंट मुस्कुराते हैं

2122 1212 22

.

ग़म-ज़दा होंट मुस्कुराते हैं
तेरा जब नाम गुनगुनाते हैं[1]

नींद वो दर है जिसके खुलने से
ख़्वाब आँखों में जगमगाते हैैं[2]

अब उदासी में है परिंदे क्यूँ?
लोग पेड़ों से घर बनाते हैं[3]

तेरे गालों पे बिखरी वो ख़ुशबू
अपने होंटों से हम चुराते हैं

अब तो होता है अपना यूँ मिलना
अब्र सावन में जैसे आते हैंं[5]

तेरी सूरत पे लिक्खा वो नग़मा
तेरी तस्वीर को सुनाते हैं[6]

रूपम कुमार 'मीत'

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on June 13, 2020 at 2:45pm

जनाब रूपम कुमार जी, कोई बात नहीं, उस्ताद मुहतरम ने बता दिया है कि "जब शाइरी में आँखें वीरान हो सकती हैं,उदास हो सकती हैं,जैसा कि उर्दू शाइरी में अक्सर देखा गया है,तो होंट ग़मज़दा क्यों नहीं हो सकते?" यहांँ मैं ग़लत था तो आप वही मिसरा "ग़म-ज़दा होंट मुस्कुराते हैं" मतले में रहने दें। धन्यवाद। 

Comment by Rupam kumar -'मीत' on June 13, 2020 at 2:34pm

मुहतरम समीर कबीर साहब आपकी उपस्थिति से दिल खुश होता है, आपने अपने विचार दिए अच्छा लगा, और आपके दिल में नए सीखने वालों के लोए काफी जहग है, आपकी टिप्पणी से मालूम होता है, मेरा हौसला कम नहीं हुआ, मैं आगे और बेहतर लिखूँगा, मैं यह समझता हूँ इस मंच पर सब मुझसे प्यार करने वाले है जो अपना कीमती वक़्त देके मेरी बे जाँ ग़ज़ल पढ़कर अपनी टिप्पणी देते है इस बालक के लिए यही काफी है। साहब आपका स्नेह बना रहे और क्या कुछ  नहीं चाहिए, बड़ो के आशिर्वाद में ताकत होती है मैं यह मानता हूँ। आपका दिन शुभ हो सरकार।।

Comment by Rupam kumar -'मीत' on June 13, 2020 at 2:28pm

बहुत देर से जवाब देने के लिए माफ़ी चाहता हूँ, साहब अमरुद्दीन अमीर जी, आपने बताया होंट ग़म-ज़दा नहीं हो सकते, मैं मान लेता हूँ, मगर ये होंट जो भूल गए है मुस्कुराना, जो उदास है, उसको बयां कैसे करता, सिर्फ एक नाम ही है उसका जो मैं गुनगुना सकता हूँ और मुस्कुरा सकता हूँ, मगर आप को लगता है होंट उदास नहीं हो सकते तो, इस शेर को यूँ किया जा सकता है? हर पहर होंट मुस्कुराते हैं! कृपा मार्ग दर्शन कीजिए। और अपना स्नेह बनाए रखिये, मैं चाहता हूँ आप अपनी उपस्थिति जरूर दिया कीजिए। आपका दिन शुह हो।

Comment by Rupam kumar -'मीत' on June 13, 2020 at 2:16pm

चेतन प्रकाश साहब, आदाब क़बूल कीजिए, मैं कोशिश करता हूँ, अपनी ग़ज़ल में सिर्फ हक़ीक़त बयाँ करू, और वही शेर होते है जो मुझ से जुड़े हो, तेरे गालों पे बिखरी वो ख़ुशबू यह शेर तो दिल के बेहद करीब है, मोहब्बत के कुछ दिन बाद एक आशिक़ इसी सीढ़ी पर चढ़ता है, बात बहुत गहरी भी नहीं है बस एक प्यार का हल्का सा एहसास है,जो मैंने अपने हिसाब से बयाँ किया, हाँ वो आपके मयार तक नहीं था, कोई बात नहीं आगे कोशिश करूंगा कुछ बेहतर लिखूं, आपका स्नेह बना रहे इस बालक पर बड़ी मेहरबानी होगी। आपका दिन शुभ हो।

Comment by Chetan Prakash on June 13, 2020 at 1:05pm

एक नव-हस्ताक्षर से उसकी ग़ज़ल के सम्पूर्ण होने की अपेक्षा नहीं की जा सकती, इस दृष्टि से ऱुप कुमार मीत की प्रस्तुति असाधारण नहीं तो उपेक्षा के योग्य भी नहीं है। हाँ, लिखने अथवा कहने से पहले, आप अहसास जी चुके हों तो बेहतर होता है। ग़ज़ल की सच्चाई भी इसी में छुपी है। इस दृष्टि से य़े शेऱ मुझे अखरा, " तेरे गालों पे बिखरी वो खुशबू / अपने होटों से हम चुराते हैं।"

Comment by Chetan Prakash on June 13, 2020 at 1:03pm

एक नव-हस्ताक्षर से उसकी ग़ज़ल के सम्पूर्ण होने की अपेक्षा नहीं की जा सकती, इस दृष्टि से ऱुप कुमार मीत की प्रस्तुति असाधारण नहीं तो उपेक्षा के योग्य भी नहीं है। हाँ, लिखने अथवा कहने से पहले, आप अहसास जी चुके हों तो बेहतर होता है। ग़ज़ल की सच्चाई भी इसी में छुपी है। इस दृष्टि से य़े शेऱ मुझे अखरा, " तेरे गालों पे बिखरी / वो खुशबू अपने होटों से हम चुराते हैं।"

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on June 13, 2020 at 12:30pm

मुहतरम, आदाब। मैं अपनी ग़लती पहले ही क़ुबूल कर चुका हूँ। और आपकी बात मुझे बिल्कुल भी बुरी नहीं लगी है इसलिए माज़रत की कोई वज्ह या ज़रूरत ही नहीं है। ख़ुदारा मुझे ख़ुद से नज़रें मिलाने लायक़ तो रहने दें, और अपनी बेरुख़ी को छोड़ दें। मैंने एक ग़ज़ल (जो नज़र से पी रहे हैं ) पोस्ट की है जिस पर आपकी नज़र ए करम की सख़्त ज़रूरत है, इल्तिजा है कि वक़्त निकाल कर देख लें। सादर। 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on June 13, 2020 at 12:29pm

मुहतरम, आदाब। मैं अपनी ग़लती पहले ही क़ुबूल कर चुका हूँ। और आपकी बात मुझे बिल्कुल भी बुरी नहीं लगी है इसलिए माज़रत की कोई वज्ह या ज़रूरत ही नहीं है। ख़ुदारा मुझे ख़ुद से नज़रें मिलाने लायक़ तो रहने दें, और अपनी बेरुख़ी को छोड़ दें। मैंने एक ग़ज़ल (जो नज़र से पी रहे हैं ) पोस्ट की है जिस पर आपकी नज़र ए करम की सख़्त ज़रूरत है, इल्तिजा है कि वक़्त निकाल कर देख लें। सादर। 

Comment by Samar kabeer on June 13, 2020 at 11:36am

जनाब मैंने आपको टिप्पणी देने से नहीं रोका, और रोक भी नहीं सकता,क्योंकि इस मंच  पर सभी को समान अधिकार है,लेकिन :-

//जनाब रूपम कुमार 'मीत' जी। ये क्या किया ?

/ग़म-ज़दा होंट मुस्कुराते हैं/ इतने कमज़ोर मिसरे के आग़ाज़ के साथ एक शानदार ग़ज़ल का बन्टा-धार हो गया है। //

इस तरह की टिप्पणी मुनासिब नहीं और वो भी एक नए सीखने वाले को,यही बात आप दूसरे अंदाज़ में भी कह सकते थे,मेरी बात आपको बुरी लगी हो तो माज़रत ख़्वाह हूँ ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on June 12, 2020 at 10:06pm

//जनाब अमीरुद्दीन 'अमीर' जी, आपकी ये टिप्पणी उचित नहीं है ।,

'जो पूछा कि वीरान आँखें हैं क्यों

तो कहते हैं तेरी नज़र हो गई'

जब शाइरी में आँखें वीरान हो सकती हैं,उदास हो सकती हैं,जैसा कि उर्दू शाइरी में अक्सर देखा गया है,तो होंट ग़मज़दा क्यों नहीं हो सकते?

दूसरी बात ये कि अगर कोई ग़ज़लकार अपने मिसरे को ख़ुद सुधारने का प्रयास करे तो इसमें क्या बुराई है?//

उस्ताद मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब, सलाम अर्ज़ है। जी हुज़ूर होने को तो कुछ भी हो सकता है। इस पर लम्बी बहस हो सकती है, मगर मैं आपका वक़्त ज़ाया नहीं करूँगा। अगर आप चाहते हैं कि मैं किसी की रचना पर कोई टिप्पणी न करूँ तो नहीं करूँगा। और हाँ अगर मेरी टिप्पणी से किसी की भी भावनाएँ आहत हुई हों तो दस्तबस्ता मुआ़फ़ी चाहता हूँ। फक़्त वस्सलाम। 

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