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ग़ज़ल नूर की - मुक़ाबिल ज़ुल्म के लश्कर खड़े हैं

मुक़ाबिल ज़ुल्म के लश्कर खड़े हैं
मगर पाण्डव हैं मुट्ठी भर, खड़े हैं.
.

हम इतनी बार जो गिर कर खड़े हैं
मुख़ालिफ़ हार कर शश्दर खड़े हैं.      शश्दर-आश्चर्यचकित, स्तब्ध
.
कभी कोई बसेगा दिल-मकां में
हम इस उम्मीद में जर्जर खड़े हैं.
.
ऐ रावण! अब तेरा बचना है मुश्किल
तेरे द्वारे पे कुछ बंदर खड़े हैं.
.
उसे लगता है हम को मार देगा
हम अपने जिस्म से बाहर खड़े हैं.
.
मुझे क़तरा समझ बैठा है नादाँ
मेरे पीछे महासागर खड़े हैं.
.
ख़ुदा दुनिया से कब का जा चुका है
ख़ुदा के नाम के पत्थर खड़े हैं.
.
नए रब के नए पैग़ाम लेकर
हर इक नुक्कड़ पे पैग़म्बर खड़े हैं.
.
मौलिक/ अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on July 7, 2025 at 11:07am

धन्यवाद आ. लक्ष्मण जी 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 2, 2025 at 2:44pm

आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 11, 2025 at 10:39am

आ. रवि जी ,

मिसरा यूँ पढ़ें 
.
सुन ऐ रावण! तेरा बचना है मुश्किल..
अलिफ़ वस्ल से काम हो गया 
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 11, 2025 at 10:31am

धन्यवाद आ. रवि जी,
ग़ज़ल तक आने और उत्साह वर्धन का धन्यवाद ..
ऐ पर आपसे सहमत हूँ ..कुछ सोचता हूँ .. 
सादर  

Comment by Ravi Shukla on June 9, 2025 at 12:49pm

आदरणीय नीलेश जी, अच्छी  ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें. अपनी टिप्पणी से पहले  इस पर आई हुई टिप्पणियां  पढ़ी अच्छा लगा । तीसरा शेर बहुत अच्छा लगा । ऐ का वज़्न गिराना हमें व्यक्तिगत रूप से असहज लगता  है तो चौथे शेर में  भी लगा  एक विनम्र सुझाव है  दशानन अब तिरा बचना है मुश्किल

कहूँ क्या शेर की तासीर पर मैँ 

तिरी डी पी में राहत सर खड़े है 

भाव में तिरी को आपकी पढ़ियेगा बहर की मजबूरी है :-)

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 4, 2025 at 3:05pm

धन्यवाद आ. बृजेश जी 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 4, 2025 at 11:58am

आदरणीय नीलेश जी एक और खूबसूरत ग़ज़ल से रूबरू करवाने के लिए आपका आभार।    
हरेक शेर बेमिसाल....

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 31, 2025 at 3:11pm

धन्यवाद आ. अजय जी 

Comment by अजय गुप्ता 'अजेय on May 31, 2025 at 1:26pm

अच्छी ग़ज़ल हुई है नीलेश जी। बधाई स्वीकार करें।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 31, 2025 at 11:28am

धन्यवाद आ. सौरभ सर,
मतले से बात शुरुअ करता हूँ.. 
मुट्ठी भर का अर्थ बहुत थोड़े या लिटरल- 5 (क्यूँ कि इन्ही से मुट्ठी बंधती है ) और पाण्डव भी इतने ही थे;  से लिया है.
ज़ुल्म के लश्कर ११ अक्षौहणी सेना से है जो कौरवों का संख्याबल था.
.
 //भाई, खुदा के नाम कहीं पत्थर दिखा भी है क्या ?//  
जी .. मेरे घर भी मूर्ति पूजा होती है. कई मूर्तियाँ पत्थर की हैं. 
मेरे अशआर का ख़ुदा किसी एक संस्कृति का अमूर्त अथवा मूर्त ख़ुदा नहीं है. मेरे अशआर का ख़ुदा वह है जिसे तमाम धर्मिक जन अपना अपना और एकमात्र सच्चा ईश्वर बताते हैं. एथीस्ट होने का यह लाभ भी है कि आप सब को इग्नोर कर सकते हैं.
.
आपको अन्य शेर पसंद आए इसके लिए आभार.
बहुत बहुत धन्यवाद  

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