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ग़ज़ल : ग़ज़ल कहनी पड़ेगी झुग्गियों पर कारखानों पर

बहर : १२२२ १२२२ १२२२ १२२२

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ग़ज़ल कहनी पड़ेगी झुग्गियों पर कारखानों पर

ये फन वरना मिलेगा जल्द रद्दी की दुकानों पर

 

कलन कहता रहा संभावना सब पर बराबर है

हमेशा बिजलियाँ गिरती रहीं कच्चे मकानों पर

 

लड़ाकू जेट उड़ाये खूब हमने रातदिन लेकिन

कभी पहरा लगा पाये न गिद्धों की उड़ानों पर

 

सभी का हक है जंगल पे कहा खरगोश ने जबसे

तभी से शेर, चीते, लोमड़ी बैठे मचानों पर

 

कहा सबने बनेगा एक दिन…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 12, 2013 at 11:46pm — 21 Comments

कुछ दोहे भोर के ~~

मन सिहरा ,ठहरा तनिक ,देखा अप्रतिम रूप ,

भोर सुहानी ,सहचरी ,पसर गई लो, धूप !

रश्मि-रश्मि मे ऊर्जा और सुनहरा घाम,

बिखर गया है स्वर्ण-सुख लो समेट बिन दाम !

सुन किलकारी भोर की विहंसी निशि की कोख ,

तिमिर गया ,मुखरित हुआ जीवन में आलोक !

उगा भाल पर बिंदु सा लो सूरज अरुणाभ ,

अब निंदिया की गोद में रहा कौन सा लाभ !

_______________प्रो.विश्वम्भर शुक्ल ,लखनऊ 

(मौलिक और अप्रकाशित )

Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on July 12, 2013 at 11:00pm — 11 Comments

!!! प्रकृति अमरता लाए !!!

अन्तर्मन की लौ अति उज्ज्वल

निश-दिन प्रेम बढ़ाए, प्रकृति अमरता लाए।

गुलमोहर की चुनरी ओढ़ी

पटका अमलतास पीताम्बर

लचकारा लटकाए, झूम-झूम हरषाए।

धानी वाली साड़ी झिल-मिल

घूंघट में आभा छवि पाकर

गाल गुलाल उड़ाए, आंचल किरन सजाए।

सुन्दर सूरत प्यारी मूरत

माथे की बिन्दी चन्द्राकर

घुंघर केश मुख छाए, शबनम भाल थिराए।

अंधड़-लू से कांवरि दौड़े

सांय-सांय शहनाई संजर

डोली जिय धड़काए, मछली मन…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 12, 2013 at 10:00pm — 15 Comments

लेकिन मेरी बिटिया

बेशक तुमने देखी नही दुनिया 

बेशक तुम अभी नादान हो 

बेशक तुम आसानी से

हो जाती हो प्रभावित अनजानों से भी 

बेशक तुम कर लेती हो विश्वास किसी पर…

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Added by anwar suhail on July 12, 2013 at 9:00pm — 9 Comments

पीढ़ियों का अंतर

पीढ़ियों का अंतर

पीढियों के अंतर में कसक भरी तड़पन है

इनकी अंतरव्यथा में गहरी चुभन है

जिंदगी की सांस् सिसकियों में सिमटी जा रही है

जिसमें खुशनुमा सी सुबह धुंधली होती जा रही है

दादा दादी, नाना नानी ,पोते पोती ,नाती नातिनें

मिलजुल कर प्यार से रहने के वो रिवाज़औरस्में

क्यूँ आ गई है दीवारें इनमें

कैसे पाटा जायेगा ये अंतर हमसे

ये अंतर घर परिवार की खुशियों को खा रहा है

ऐसा पहले तो नहीं था अब कहाँ से आ रहा…

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Added by vijayashree on July 12, 2013 at 4:00pm — 8 Comments

भोर

ये भोर

काली रात के बाद



अब भी सिसकती है

यादों के ताजे निशाँ

सूखे ज़ख़्मों को

एक टक ताकती  



उसे नहीं पता

आने वाली शाम और

रात कैसी होगी



पता है तो बस

बीता हुआ कल

वो बीता हुआ कल  

जो निकला था

उसकी कसी हुई मुठ्ठी से

रेत की तरह

देखते देखते

रेत की तरह

भरी दोपहर में

तपते रेगिस्तान में

ज्यों छलती है रेत

मृग मारीचिका की तरह



मृग मारीचिका

जिससे भान होता है

पानी का

हाँ…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 12, 2013 at 1:54pm — 9 Comments

******* बेवफाई ********

    

******* बेवफाई  ********

 दोस्ती का हक़ तो मैंने अदा किया 

 पर उसने मुझे कुछ दगा सा दिया 

जाने किस बात पे वो था रुका 

किस बात पे जाने भुला वो दिया 

दोस्ती…

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Added by Atendra Kumar Singh "Ravi" on July 12, 2013 at 12:30pm — 6 Comments

प्रचंड गंग धार यूँ बढ़ी बहे बड़े बड़े

प्रचंड गंग धार यूँ बढ़ी बहे बड़े बड़े

बहे विशाल वृक्ष जो थे उंघते खड़े खड़े  



बड़ी बड़ी शिलाओं के निशान आज मिट गये

न छत रही न घर रहा मचान आज मिट गये

हुआ प्रलय बड़ा विकट किसान आज मिट गये

सुने किसी की कौन के प्रधान आज मिट गये



पुजारियों के होश भी लगे हमें उड़े उड़े

प्रचंड गंग धार यूँ बढ़ी बहे बड़े बड़े



मदद के नाम पे वो अपने कद महज बढ़ा रहे

खबर की सुर्ख़ियों का वो यूँ लुत्फ़ भी उड़ा रहे

वहीं घनेरे मेघ काले छा के फिर चिढ़ा…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 12, 2013 at 12:28pm — 9 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
अनगिन बातें ...//डॉ० प्राची

अनाद्यानंत  आकाश में तैरते 

पारदर्शी गोलाकार 
अविरल निर्विकार 
असंख्य सूक्ष्म कण ...
स्पर्श कर सम्पूर्ण सृष्टि 
चले आते हैं मेरे पास
प्रति क्षण -
मेरे संस्पर्श को ...
और लिए जाते हैं, गुपचुप 
मुझमे से 
मेरा ही सुरभित नेह अंश,
पूरे ब्रह्माण्ड में बिखराने ...
और मैं 
पारदर्शी निगाहों में प्रेमाश्रु…
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Added by Dr.Prachi Singh on July 12, 2013 at 12:00pm — 30 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
फिर घूँघट की शान बढाता है पल्लू

जीवन में हर रंग दिखाता ये  पल्लू 

सर पर तो पूरित हो जाता है पल्लू 

 गर्मी  में  चेहरे का  पसीना  पौंछता   

सावन में छतरी बन जाता है पल्लू 

 

जब- तब शादी में गठबंधन करवाता  

दो जीवन को एक बनाता ये पल्लू 

झोली बन कर आखत अर्पण करवाता   

फिर घूँघट की शान बढाता है पल्लू  

 

कभी कभी नव शिशु का झूला बन जाता    

आँखों से…

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Added by rajesh kumari on July 12, 2013 at 12:00pm — 26 Comments

दीवाने तो दीवाने हैं [सूफी गीत]

रचना ओ बी ओ नियमानुसार न होने और लेखक के अनुरोध पर हटा दी गई है |

एडमिन

2013071407

Added by Neeraj Nishchal on July 12, 2013 at 11:30am — 12 Comments

ऊब गया मैं ऊब गया रोज किताबों को पढ़कर !

ऊब गया मैं ऊब गया

रोज किताबों को पढ़कर !

भाषा की सरल किताबों में

जब व्याकरण की मार पड़ी

छंद विधानों में उलझा

तब जोड़ न पाया कोई लड़ी…

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Added by Satyanarayan Singh on July 12, 2013 at 11:00am — 8 Comments

ऐ प्रकृति तू धर शरीर

ऐ प्रकृति तू धर शरीर

ले जन्म किसी माँ की कोख से !!

.

जब तुझे लगेगी चोट

बहेगा लहू तेरे शरीर से

या बीच राह में कोई

दाग लगेगा आबरू पे कोई

जब जागेगा ये मानव कही

रक्षा को तेरी तभी

ऐ प्रकृति तू धर शरीर !!

.

वैसे तो कुछ दिनों का होगा जोश

मानव का मानव के लिए

मगर इस बहाने ऐ प्रकृति

तेरा ख्याल तो आयेगा

वरना ये शातिन प्राणी

अपने स्वार्थ के लिए

तुझको ही ये लूटता जायेगा

ऐ प्रकृति तू धर शरीर

ले…

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Added by Sumit Naithani on July 12, 2013 at 9:30am — 10 Comments

तुम कुछ बोल दो

आज मन उदास है ,

तुम कुछ बोल दो !

अर्न्तमन की आँखों से मुस्कुरा,

प्रेम शब्द उकेर दो !

खिलते गुलाब की पंखुड़ी से,

गुलाबी अधर खोल दो !

आज मन उदास है , तुम कुछ बोल दो !

.

तुम्हारे स्वप्निल ख्यालों में ,

मन कहीं खो जाये !

तन स्पर्श ना सही ,

मन स्पर्श हो पायें !

स्वर कोकिला रूप में ,

श्वासों की सुगन्ध धोल दो !

आज मन उदास है तुम कुछ बोल दो !



प्रेम का मधुपान करूं ,

अपना सा अहसास करूं !

मोहपाश में बाँध कर ,…

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Added by D P Mathur on July 12, 2013 at 7:30am — 10 Comments

प्रकृति ने दिया अपना जबाब ......

प्रकृति की

नैसर्गिक चित्रकारी पर

मानव ने खींच दी है

विनाशकारी लकीरे

सूखने लगे है

जलप्रताप, नदियाँ

फिर

एक सा जलजला आया 

समुद्र  की गहराईयों में

और  प्रलय का नाग

निगलने लगा

मानवनिर्मित कृतियों को,

धीरे  धीरे

चित्त्कार उठी धरती

फटने  लगे बादल

बदल गए मौसम

बिगड़ गया  संतुलन

हम

किसे दोष दे ?

प्रकृति  को ?

या मानव को ?

जिसने अपनी

महत्वकांशाओ…

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Added by shashi purwar on July 12, 2013 at 12:30am — 18 Comments

संबंध ....

संबंध
बेमतलब , बेमानी ...
भाई चारे की तरह
ढोते हैं रिश्तों की लाश को
आफ्नो को
अपने ही देते कंधे
चलते जाते हैं
नाकों मे फैलती
अपनों की सड़ांध
आसान नहीं है चलना
और फिर
जला आते है अपनों की लाश को
अपने ही , मगर
ढ़ोना तो पड़ता है
छाँव की तलाश मे
रिश्तों की आस मे
संबंध
बेमानी , बेमतलब
भाई चारे की तरह ...

"मालिक व अप्रकाशित"

Added by Amod Kumar Srivastava on July 11, 2013 at 10:00pm — 11 Comments

प्रातः

मंद हवा की

लहरों पर बैठ

आकाश ने

हाथों में लिया

सितारों का अक्षत,

अरूणोदय का कुमकुम,

ओस की बूंदें,

बाग से

पुष्प, घास

और तिरोहित कर दी

रात

क्षितिज में।

              - बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

 

Added by बृजेश नीरज on July 11, 2013 at 6:30pm — 30 Comments

खूब लड़ाते गप्प (दोहे)

देश में फल-फूल रहा, सट्टे का बाजार,

कुछ लोगो के बिक रहे,देखो सब घर बार |

 

सट्टा गर सरकार का, नियमो में वह वैध

जनता गर सट्टा करे, उसको कहे अवैध |

 

राजनीति व्यवसाय है,दीमक जैसी चाट

घोटाले करते रहे,  कुर्सी के है  ठाट |

 

राजनीति में जो सफल,घोटालो में लिप्त, 

इस धंधे में देख लो,नेता सब संलिप्त |

 

बहुत संपदा पास में, कल तक तो थे रिक्त  

नित्य संपदा…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 11, 2013 at 6:30pm — 22 Comments

बंजर बादल चूम रहे हैं/फिर से प्रेत शिलाएं

बंजर बादल चूम रहे हैं

फिर से प्रेत शिलाएं

लोकतंत्र की

लाश फूलती

गंध भरे

गलियारों में

यहां-वहां बस

काग मचलते

तुष्‍ट-पुष्‍ट

ज्‍योनारों में

नित्‍य बिकाउ नारे लेकर

चलती तल्‍ख हवाएं

गंगा का भी

संयम टूटा

वक्र बही

शत धारों में

क्षुब्‍ध, कुपित

पर्वत, हिमनद भी

कह गए बहुत

ईशारों में

पछताते चरणों से लौटी

कितनी विकल…

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Added by राजेश 'मृदु' on July 11, 2013 at 4:52pm — 16 Comments

राह के वो हाशिये थे.....

राह के वो हाशिये थे एक पल में हट गये 

रास्ते चौड़े हुए तो पेड़ सारे कट गये 



एक है चेहरा हमारा और खूं का रंग भी 

क्या रही मज़बूरी जो हम मज़हबों में बंट गये 



ग़मज़दा हूँ मैं कि मेरे पैर में जूते नहीं 

क्या गुज़रती होगी उसपे पांव जिसके कट गये 



न रहे दादा न दादी जो रटाये राम- राम 

देखकर माहौल घर का, तोते गाली रट गये 



रिज्क़ की तंगी कुछ ऐसी हो गई अब गाँव में 

औरतें तो रह गईं पर मर्द काफी घट गये 



ज़िन्दगी के…

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Added by Sushil Thakur on July 11, 2013 at 4:00pm — 6 Comments

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